सेफ़ फ़िल्म बनाने का क्या फ़ायदा: नागेश

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बात साल 1998 की है. बॉक्स ऑफ़िस पर कुछ कुछ होता है, दूल्हे राजा, बड़े मियाँ छोटे मियाँ जैसी फ़िल्मों का बोलबाला था. ऐसे में एक फ़िल्म आई 'हैदराबाद ब्लूज़' जिसके निर्देशक नागेश कुकुनूर का नाम पहले किसी ने सुना था.

हैदराबाद ब्लूज़ से नाम कमाने बनाने नागेश ने इक़बाल, डोर जैसी फ़िल्में बनाई हैं. हाल में हुए लंदन एशियन फ़िल्म फ़ेस्टिवल में बीबीसी ने नागेश कुकुनूर से बात की.

आपकी फ़िल्म लक्ष्मी 14 साल की बच्ची की असल कहानी है जिसकी तस्करी कर उससे वेश्यावृत्ति करवाई गई. इसे लंदन एशियन फ़िल्म फ़ेस्टिवल में भी दिखाया गया. क्या आप सामाजिक मुद्दों पर फ़िल्म बनाना ज़्यादा पसंद करते हैं ?

इस बात को लेकर मैं स्पष्ट रहता हूँ कि बतौर फ़िल्मकार मैं अचानक किसी भी मुद्दे पर जाकर फ़िल्म नहीं शुरू सकता और फिर उसमें कहानी बाद में ढूँढूँ. ये ग़लत तरीका है. मैं पहले कहानी ढूँढता हूँ और फिर सोचता हूँ कि इससे जुड़े मुद्दे पर क्या कर सकता हूँ.

फ़िल्में आपके लिए मनोरंजन हैं या लोगों तक संदेश पहुँचाने का ज़रिया ?

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फ़िल्में ऐसे मुद्दों को बाहर भी ला सकती हैं जिनके बारे में आपने सोचा न हो या बात न करते हों. मैं जब फ़िल्म बनाता हूँ तो पहले मनोरंजन के नज़रिए से देखता हूँ. मैं ख़ुद को एक स्टोरीटेलर मानता हूँ पर इन कहानियों के ज़रिए मैं सामाजिक संदेश भी देने की कोशिश करता रहता हूँ.

फ़िल्म लक्ष्मी में यौन हिंसा से जुड़े दृश्य कुछ लोगों को काफ़ी परेशान कर देने वाले लगे. पहले भी ये बहस होती रही है कि हिंसा को किस हद तक पर्दे पर उतारा जाए.

मुझे भी ये दृश्य दिखाने में दिक्कत हुई. मैं बार बार ख़ुद से सवाल करता हूँ कि मैं जो पर्दे पर दिखा रहा हूँ वो ज़रूरत से ज़्यादा है क्या. पर मैं ख़ुद से ये भी कहता हूँ कि नागेश तुम्हें 'सेफ़ फ़िल्म' नहीं बनानी है, उसका क्या फ़ायदा.

आपने केमिकल इंजीनियरिंग की, अमरीका में नौकरी भी की और फिर फ़िल्मकार बन गए. ये कैसे हुआ ?

मिडिल क्लास इंडिया में आप इंजीनियर, डॉक्टर बनने से ज़्यादा कुछ देख सोच ही नहीं पाते. मेरा सपना था कि मैं फ़िल्मों के साथ कुछ करुँ. जब मैने अमरीका में कुछ पैसे कमाए तो सोचा कि खुद को परखा जाए कि मुझमें फ़िल्ममेकर है या नहीं. सोचा कि अगर फ़िल्म फ्लॉप हो गई तो वापस केमिकल इंजीनियर का काम कर लूँगा.

मैंने निर्देशन में कोई ट्रेनिंग नहीं ली है लेकिन बतौर एक्टर मैंने तीन साल तक ट्रेनिंग ली है. जब मुझे लगता है कि किसी फ़िल्म में मैं रोल में फ़िट बैठता हूँ तो मैं रोल कर लेता हूँ. फिर लोग परखते हैं कि मैंने कैसा काम किया.

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