न्यूमरोलॉजी के हिट-फ़्लॉप फ़िल्मी टोटके

  • 7 अगस्त 2014
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ज्योतिष-व्योतिष तक तो ठीक था लेकिन बाद में एक और चीज़ ज़्यादा चलन में आ गई, जिसे कहते हैं न्यूमरोलॉजी, मतलब अंक विज्ञान. इस 'लॉजी' का तर्क है गुणा-भाग करो, नाम छोटा-बड़ा करो, इस नंबर से परहेज़ और उस नंबर से प्यार करो.

इस कुचक्र में फंसकर अनगिनत फिल्मों और न जाने कितने सितारों ने अपने नामों की स्पेलिंग्स बदल डालीं, फिर उसका उच्चारण भले ही चाहे कुछ और हो जाए.

मसलन 1973 में राज खोसला की एक फिल्म आई थी 'कच्चे धागे.' किसी 'न्यूमरोलाजिस्ट' की सलाह पर अंगेज़ी में उसकी स्पेलिंग कर दी 'Kuchhe Dhaage'.

तब मीडिया में इस पर ख़ासा हल्ला मचा था. कुछ ने इसे 'कछे धागे' तो कुछ ने इसे 'कुछे धागे' लिखा.

ख़ैर अब तो यह बीमारी बहुत आम हो गई है. अभी हाल ही में रिलीज़ हुई सैफ़ अली ख़ान की सुपर फ़्लॉप पिक्चर 'बुलेट राजा' के 'बुलेट' में एक की जगह दो 'टी' घुसेड़ दी थीं. क्यों? न्यूमरोलॉजिस्ट ने कहा था फिल्म सुपरहिट हो जाएगी.

'क' का करिश्मा

पिछले कुछ सालों में एकता कपूर की सफलता में उनके अंधविश्वास और टोने-टोटके की हिस्सेदारी की काफ़ी चर्चा रही है.

कहा जाता है कि उनके दरवाज़े पर घोड़े की नाल लगी है, कि वह अपने हर सीरियल का नाम 'क' से ही रखती है.

सही है, लेकिन हक़ीक़त यह है कि ऐसे टोटके एकता की पैदाइश से भी पहले से जारी हैं.

अर्जुन हिंगोरानी आपको याद होंगे, जिनकी फिल्म 'कब क्यूं और कहां' (1970) हिट हो गई तो भाई ने टोटके के हिसाब से एक नहीं 3 'के' वाली फिल्में 'कहानी किस्मत की' (1973), 'खेल खिलाड़ी का'' (1977), 'क़ातिलों के क़ातिल' (1981), 'करिश्मा क़ुदरत का' (1985) जैसी सफल और असफल फिल्में बना डालीं.

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साल 1991 में धर्मेंद्र, गोविंदा, बिस्वजीत जैसे कलाकारों के साथ उन्होंने फ़िल्म बनाई 'कौन करेगा क़ुर्बानी' तो पब्लिक ने कहा अब तो तेरी ही क़ुर्बानी होगी.

'अ' का अंजाम

उसी दौर में निर्माता-निदेशक जे ओमप्रकाश (राकेश रोशन के ससुर) ने 'आ' को पकड़कर फिल्मों के नाम रखे. 'आस का पंछी', 'आई मिलन की बेला', 'आए दिन बहार के' हिट हो गई लेकिन 1974 में 'आंखों-आंखों में' 'आ' के बावजूद आई-गई हो गई.

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निर्माता-निदेशक सुभाष घई, महान निर्देशक अल्फ़्रेड हिचकॉक की नकल करते हुए अपनी हर फ़िल्म के किसी न किसी सीन में अपना चेहरा ज़रूर दिखाते हैं लेकिन अफ़सोस इस टोटके के बावजूद 'त्रिमूर्ति' (1995) और 'यादें' (2001) को फ़्लॉप होने से नहीं बचा सके.

और हां, अपने बासु दा, मतलब 'पिया का घर', 'रजनीगंधा', 'चितचोर' और 'छोटी सी बात' जैसी सुंदर फिल्में बनाने वाले बासु चटर्जी भी अपनी फिल्मों में अपना मुखड़ा पब्लिक को एक बार ज़रूर दिखाते रहे हैं.

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