फ़िल्म रिव्यू: 'कटियाबाज़'

  • 22 अगस्त 2014
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रेटिंग: ****

हम पूर्वी भारत पर आधारित कई 'रियलिस्टिक' फ़िल्में देख चुके हैं. इस इलाके को 'काउ बेल्ट' कहा जाता है.

इनमें से कई फ़िल्में प्रकाश झा, विशाल भारद्वाज, तिग्मांशु धूलिया और अनुराग कश्यप (जो इस कटियाबाज़ के प्रेजेंटर भी हैं) जैसे बेहतरीन फ़िल्मकारों ने बनाई हैं.

लेकिन कोई भी इस फ़िल्म के क़रीब नहीं पहुंच पाया है. क्योंकि ये 'रियलिस्टिक' फ़िल्म नहीं बल्कि सब असल ही है. इसलिए ये उन तमाम फ़िल्मों से कहीं ज़्यादा 'हार्ड हिटिंग' है.

बिजली चोरी की कहानी

ये एक डॉक्यूमेंट्री है जो औद्योगिक शहर कानपुर में बिजली के संघर्ष को दिखाती है.

ये एक ऐसे शहर की दास्तां बयां करती है, जहां सूरज अपना भरपूर प्यार दिखाता है और गर्मियों में तापमान 47 डिग्री तक पहुंच जाता है.

शहर के लोगों को 16-16 घंटे बिना बिजली के, तपते हुए, सुलगते हुए दिन बिताना पड़ता है.

लेकिन ये कहानी कानपुर ही क्या भारत के किसी भी शहर की हो सकती है. जैसे फ़िल्म की ओपनिंग लाइन में लिखा होता है कि भारत के 40 करोड़ लोगों को रोज़ाना बिजली तक मुहैया नहीं है.

ये फ़िल्म अदभुत इसलिए नहीं है कि इसका विषय बड़ा ज़बरदस्त है. लेकिन जिस तरीके से इसे प्रस्तुत किया गया है वो लाजवाब है.

कसा हुआ ड्रामा

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फ़िल्म में नरेशन के ज़रिए एक बेहतरीन और कसा हुआ ड्रामा रचा गया है.

फ़िल्म का मुख्य किरदार (लोहा सिंह) एक एंटी हीरो है जिससे लोहा लेती है एक ईमानदार नौकरशाह ऋतु माहेश्वरी.

लोहा और ऋतु की वही समस्या है जो कानपुर शहर के 30 लाख लोगों की है. बिजली की ज़बरदस्त कमी.

लोहा सिंह एक बहादुर, जांबाज़ कटियाबाज़ या यूं कहें कि फ़नकार है, जो बिजली के खंभों से तारों को जोड़-तोड़कर बिजली चोरी करता है.

ऋतु, शहर को बिजली सप्लाई करने वाली ऐसी सरकारी संस्था की प्रमुख है जो हमेशा वित्तीय घाटे से जूझ रही होती है.

शहर की जनता बिजली का बिल नहीं देना चाहती क्योंकि उसे लगता है कि मुफ़्त या सस्ती बिजली हासिल करना उनका लोकतांत्रिक अधिकार है.

असल किरदार

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हाल के दिनों में ऐसी कई बेहतरीन डॉक्यूमेंट्री आई हैं और अच्छी बात ये है कि सिनेमा हॉल्स में उन्हें आम मसाला फ़िल्मों के शौक़ीन दर्शक भी मिल रहे हैं.

लेकिन दुर्भाग्य ये है कि टीवी चैनल इनमें ज़्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाते.

इस फ़िल्म में किरदार ऐक्टिंग नहीं कर रहे हैं बल्कि अपनी निजी ज़िंदगी सबके सामने (दर्शकों के सामने) जी रहे होते हैं.

ये असल किरदार हैं. फ़िल्म ख़त्म होने के बाद हम थिएटर छोड़ देते हैं लेकिन उनकी ज़िंदगी उसी तरह से जारी रहती है. और ये किरदार हमारे ज़ेहन में लंबे समय तक बने रहते हैं.

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