मयंक शेखर का रिव्यू: 'मेरी कॉम' में कितना दम?

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फ़िल्म: मेरी कॉम

मुख्य कलाकार: प्रियंका चोपड़ा

निर्देशक: ओमंग कुमार

रेटिंग: ***

किसी भी विषय पर दर्शकों का 'मनोरंजन' करने के लिए नाच-गाने और मार-धाड़ से भरपूर फ़िल्म बनाना, मेरे लिए तो बॉलीवुड शब्द का यही मतलब है.

और जब मैं निर्माता संजय लीला भंसाली की ये फ़िल्म देखने जा रहा था तब मेरे दिमाग़ में यही डर था कि पांच बार की विश्व चैंपियन मुक्केबाज़ मेरी कॉम के जीवन पर भी कुछ इसी तरह की फ़िल्म ना बना दी गई हो.

लेकिन ख़ुशकिस्मती से मेरा डर ग़लत साबित हुआ.

वास्तविक प्रस्तुतीकरण

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फ़िल्म की लोकेशंस बिलकुल वास्तविक लगीं. कलाकारों का अभिनय 'ओवर द टॉप' नहीं बल्कि संयत था.

फ़िल्म के बैकग्राउंड स्कोर में पूर्वोत्तर भारत के लोकसंगीत की झलक मिलती है.

मुझे याद नहीं पड़ता कि इससे पहले कब बॉलीवुड की किसी फ़िल्म के मुख्य किरदार पूर्वोत्तर भारतीय थे.

'3 इडियट्स' में आमिर ख़ान ने फुनसुक वांगड़ू का किरदार निभाया था इसके अलावा मुझे कोई पूर्वोत्तर भारतीय किरदार याद नहीं आ रहा है.

अभिनय

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ईमानदारी से कहूं तो पंजाब दी कुड़ी प्रियंका चोपड़ा, मेक अप आर्टिस्ट की अथक मेहनत के बावजूद पूर्वोत्तर भारत की मेरी कॉम नहीं लगतीं.

लेकिन फ़िल्म की ये कमी आपको कतई परेशान नहीं करेगी. और मुझे नहीं लगता कि फ़िल्मकार का आयडिया मेरी कॉम जैसी दिखने वाली कलाकार को लीड रोल में लेना था.

उद्देश्य था मेरी कॉम की शख़्सियत को पर्दे पर हूबहू उतारना और ये काम प्रियंका और निर्देशक ओमंग कुमार ने बखूबी किया है.

दर्शक फ़िल्म से जुड़ते हैं. इस पहलू से देखें तो प्रियंका ने मेरी कॉम के किरदार को बेहतरीन तरीके से अंजाम दिया है. हालांकि तमाम फ़िल्म अवॉर्ड्स अपनी अहमियत खो चुके हैं लेकिन फिर भी प्रियंका को इस रोल के लिए कई अवॉर्ड मिलने तय हैं.

मेरी कॉम एक ऐसे राज्य मणिपुर से आती हैं जहां पिछले 50 सालों से अलगाववादी आंदोलन चल रहा है. वो और इरोम शर्मिला, राज्य के दो सबसे चर्चित चेहरे हैं. लेकिन फ़िल्म मणिपुर से जुड़े राजनीतिक मुद्दे को नहीं छूती.

कहानी

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मेरी कॉम ग़रीब परिवार में पैदा हुई. उसके पिता नहीं चाहते कि वो बॉक्सिंग में करियर बनाए क्योंकि उन्हें लगता है कि बॉक्सिंग से उसका चेहरा ख़राब हो जाएगा जिससे उसकी शादी में दिक़्क़तें पेश आएंगी.

लेकिन एक कोच मेरी को विश्व चैंपियन बना कर ही दम लेता है. अपने करियर के शिखर पर उसकी शादी हो जाती है. बच्चे हो जाते हैं. गृहस्थी की परेशानियों के बावजूद वो एक बार फिर कमर कस लेती है और दोबारा चैंपियन बनकर दिखाती है.

हालांकि फ़िल्म में मेरी के बारे में ऐसी कुछ बातें पेश की गई हैं जो मैंने नहीं सुनी लेकिन शायद क्रिएटिव लिबर्टी के चलते ऐसा किया गया है.

प्रेरणादायक फ़िल्म

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फ़िल्म तक़रीबन दो घंटे की है जो बॉलीवुड की पिछली बायोपिक 'भाग मिल्खा भाग' से आधा घंटे कम है.

हम प्रेरणा के लिए फ़िल्में देखते हैं क्योंकि हमारी रोज़ मर्रा की ज़िंदगी में प्रेरणा स्त्रोत के किरदार बहुत कम होते हैं. मेरी कॉम की ज़िंदगी में ऐसे कई लम्हे हैं.

फ़िल्मकार ने उनकी असल कहानी में ज़्यादा फेरबदल करने की कोशिश नहीं की है.

हालांकि मेरी कॉम की ज़िंदगी में अब भी बहुत कुछ ऐसा है जिससे आगे भी फ़िल्म बनाई जा सकती है. वो अगले ओलंपिक में स्वर्ण को लक्ष्य बना रही हैं. लेकिन उनकी अब तक की ज़िंदकी को पेश करती ये फ़िल्म देखने लायक है.

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