नवाज़ शरीफ़ भी हैं धर्मेंद्र के मुरीद

  • 30 सितंबर 2014
धर्मेंद्र

पचपन सालों से फ़िल्मी मैदान में जमे हुए धर्मेंद्र के दीवाने भारत ही नहीं पाकिस्तान में भी हैं. ख़ुद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़, धर्मेंद्र के मुरीद हैं.

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में जब नवाज़ शरीफ़ भारत आए थे तब उन्होंने धर्मेंद्र से मुलाक़ात की थी.

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Image caption धर्मेंद्र और अमिताभ बच्चन ने 'शोले', 'चुपके-चुपके' समेत कई सुपरहिट फ़िल्में दीं.

बीबीसी से ख़ास बात करते हुए धर्मेंद्र ने बताया, " जब नवाज़ शरीफ़ हाल ही में दिल्ली आए थे उनसे मुलाक़ात हुई थी. नवाज़ शरीफ़ ने बताया कि उनका परिवार भारत में था और सड़क मार्ग से जा रहा था तो रास्ते में मेरे घर के सामने कार रुकवाई गई. उन्होंने अपनी पत्नी और बच्चों को बताया था - देखो, ये है धर्मेंद्र का घर."

ग़लती हो जाती है.....

पंजाब के एक गाँव साहनेवाल से हीरो बनने का सपना लिए धर्मेंद्र ने 50 के दशक में फ़िल्मफ़ेयर की प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था.

गाँव में तो फ़ोटो स्टूडियो था नहीं तो पास के कस्बे में जाकर एक छोटे से स्टूडियो से फ़ोटो खिंचवाई और फ़िल्मफ़ेयर में चुने गए. फिर शुरु हुआ फ़िल्मों का सिलसिला.

धर्मेंद्र ने बताया कि पूरी दुनिया में फैले उनके प्रशंसकों का प्यार उन्हें इस उम्र में भी उर्जावान बनाए रखता है. उन्होंने कहा, "मुझे पाकिस्तान से लेकर नाइजीरिया तक से लोगों के ख़त आते हैं. मैं आज भी अपने आपको युवा महसूस करता हूं."

फ़िल्मों और अभिनय से अपने रिश्ते को धर्मेंद्र कुछ यूँ बयां करते हैं, "एक्टिंग मेरे लिए मेरी महबूबा है. जैसे आशिक़ और माशूक में लड़ाई हो जाती है वैसे ही कभी ये रूठ जाती है तो मैं मना लेता हूँ, कभी मैं रूठ जाता हूँ तो ये मना लेती है. लेकिन हमने एक दूसरे को छोड़ा नहीं."

क्या कुछ ऐसी फ़िल्में हैं, जिन्हें करने का धर्मेंद्र को अफ़सोस है ?

उन्होंने कहा, "मुझे तो फ़िल्म करते वक़्त ही पता चल जाता है कि ये चलेगी या नहीं. लेकिन कई कारणों से फ़िल्म करनी पड़ती है."

धर्मेंद्र मानते हैं कि उनके बेटों सनी और बॉबी देओल के साथ बनाई गई फ़िल्म 'यमला, पगला, दीवाना-2' की कहानी पर मेहनत नहीं की गई थी और वो फ़िल्म बनाना एक ग़लती थी.

उर्दू ज़बान से धर्मेंद्र को ख़ासा लगाव है, उनकी पढ़ाई लिखाई भी इसी ज़बान में हुई और वे ख़ुद भी शायरी करना पसंद करते हैं. उर्दू पर उनका कहना था

एहसानमंद हूँ ज़बाने उर्दू तेरा, तेरी ज़बान में बयाने एहसासे दिल आ गया

इंटरव्यू का अंत धर्मेंद्र ने अपने ही शायराना अंदाज़ में किया

होती है तारीफ़ अहमियत की,

इंसानियत की मगर कद्र होती है

तरजीह ओहदे को न दे इंसानियत पे

बंदे पे ख़ुदा की तब नज़र होती है.

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