फ़िल्म रिव्यू: 'रंगरसिया' कितनी रंगीन

  • 7 नवंबर 2014
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रेटिंग: ***

'रंगरसिया' रंजीत देसाई की नॉवेल 'राजा रवि वर्मा' पर आधारित है.

इस फ़िल्म को केतन मेहता ने बखूबी परदे पर उतारा है.

फ़िल्म 'कला' और 'नैतिकता' के संबंध को दर्शाती है.

'कला' और 'नैतिकता' का संबंध कभी साफ़ नहीं रह पाया है. पीढ़ी दर पीढ़ी ये विवाद कहीं न कहीं सामने आ ही जाता है.

फ़िल्म का केंद्र

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फ़िल्म का केंद्र एक कोर्ट सीन है जहां राजा रवि वर्मा पर हिंदू धर्म का एक 'संगठन' मुकदमा दायर करता है क्योंकि राजा रवि वर्मा ने एक पौराणिक चरित्र की नग्न तस्वीर बना दी है.

ये 'संगठन' 18000 मंदिरों का लेख जोखा देखता है. रवि वर्मा अपना मुक़दमा ख़ुद लड़ते हैं.

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दांव पर लगी है 5000 साल पुरानी सभ्यता. फ़िल्म की कहानी मुख्यतः अठारहवीं सदी के ब्रितानी भारत में रची बसी है.

रवि वर्मा के कई चाहने वाले भी होते हैं. उनमें से एक होते हैं त्रावणकोर के राजा (आशीष विद्यार्थी) और बड़ौदा के राजा माधवराव.

ये लुभावनी सी दिखने वाली कहानी असल में बहुत डरावनी है.

कम बजट

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रंगरसिया में 18वीं सदी के मध्य से 19वीं सदी के शुरुआती दौर के केरल, बॉम्बे और बनारस जैसे शहरों को दिखाया गया है. फ़िल्म के इतिहास को देखकर और कम बजट के चलते ये थोड़ा अजीब लगता है.

फ़िल्म में कुछ अधूरी कड़ियां भी हैं जिनमें से एक है राजा रवि वर्मा की प्रेमिका नंदना सेन की कहानी.

दिलचस्प फ़िल्म

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अगर इस फ़िल्म के तथ्य सच हैं तो मैंने इस फ़िल्म से काफ़ी कुछ सीखा है.

उनमें से एक ये है कि राजा रवि वर्मा ने अपनी 'ब्लॉक प्रिंटिंग' (नई तकनीक) से हिंदू देवी देवताओं के दो आयामी चित्र बनाकर उन्हें घरों तक पहुंचाया.

रवि वर्मा ने भारत की पहली फ़ीचर फ़िल्म में पैसे लगाए थे और मैं रवि वर्मा के बारे में लगातार बातें कर सकता हूं.

राजा रवि वर्मा के बारे में मैं आपको 'विकिपीडिया' के पेज की तरफ़ धकेल सकता था अगर 'रंगरसिया' उतनी मज़ेदार और महत्वपूर्ण ना होती तो.

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