बॉलीवुड में काम के तरीके से दिक्कत: आमिर

  • 14 नवंबर 2014
आमिर ख़ान, अनुष्का शर्मा

आमिर ख़ान अपनी आने वाली फ़िल्म 'पीके' के साथ-साथ हाल ही में समाप्त हुए अपने टीवी शो सत्यमेव जयते को लेकर भी ख़ासी चर्चा में हैं.

उन्हें अपने इस शो में उठाए गए सामाजिक मुद्दों के लिए ख़ासी सराहना भी मिली तो वहीं कुछ लोगों से उन्हें आलोचना भी झेलनी पड़ी.

शो का प्रसारण अपनी फ़िल्म पीके की रिलीज़ के आस-पास कराने को लेकर लोगों ने इसे मार्केटिंग का हथकंडा भी कहा.

फ़िल्म, टीवी और राजनीतिक मुद्दों पर आमिर से हुई विस्तार बातचीत के मुख्य अंश.

आमिर से बातचीत

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आमिर. 'पीके ' क्या है ?

आमिर : जी देखिए आप जानते हैं कि मैं अपनी फ़िल्म से पहले कभी भी उसकी कहानी या प्लॉट के बारे में बात नहीं करता. ये एक सस्पेंस है जो 19 दिसंबर को ही खुलेगा.

ये सिर्फ आपके साथ है कि फ़िल्म से पहले ना तो आप अपनी फ़िल्म के बारे में बात करते हैं न कहानी के बारे में न चरित्र के बारे में. आखिर ऐसा सस्पेंस क्यों?

आमिर: मार्केटिंग का एक सिद्धांत है- क्रिएट द डिज़ायर. अपने प्रोडक्ट के प्रति चाहत पैदा करनी पड़ती है. मैं अभी आपको पूरी कहानी सुना दूं तो बहुत मुमकिन है कि आप मेरी फ़िल्म देखने ना जाओ.

मेरा मकसद है लोगों को थिएटर तक लाना और ये काम कहानी के प्रति सस्पेंस करेगा.

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चलिए फ़िल्म की बात समझ में आती है लेकिन आप तो अपने टेलीविज़न धारावाहिक 'सत्यमेव जयते' के टॉपिक भी सस्पेंस रखते हैं?

आमिर: इसका कारण है हमारे शो की प्रकृति. अगर मैं किसी दर्शक को पहले ही बता दूंगा कि इस रविवार हम कन्या भ्रूण हत्या पर बात करेंगे तो आधे से ज़्यादा लोग टीवी बंद कर देंगे कि हां हमें पता है ऐसा होता है.

कोई भी आदमी कन्या भ्रूण हत्या पर बात करने के लिए अपनी छुट्टी ख़राब नहीं करेगा.

हमारा शो गंभीर मुद्दों पर बना है और इसे पहले से ही खोल देने से लोग इससे अलग हो सकते हैं.

'मक़सद ढूंढना ग़लत'

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आमिर कई लोगों को लगता है कि आपका ये शो आपकी राजनीति में आने की कोशिश है. ये बात कहां तक सही है?

आमिर: न तो मेरा राजनीति में आने का कोई इरादा है और न ही मैं भविष्य में ऐसा करने वाला हूं.

हमारे यहां लोगों की सबसे ख़राब आदत है कि वे हर चीज़ के पीछे कोई मकसद ढूंढ़ने लग जाते हैं.

अगर आमिर सामाजिक बुराइयों पर बात करता है तो वो राजनीति में आना चाहता है. अगर वो चैरिटी करता है तो अपना वोटिंग ग्राउंड बना रहा है.

लेकिन ऐसा नहीं है और शायद आज से पांच साल बाद भी जब आप मुझे यही करते देखेंगे तो आपको यकीन हो जाएगा कि नहीं ये राजनीति के लिए नहीं बल्कि समाज के लिए काम कर रहा है.

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सवाल: लेकिन आप राजनीतिक मंच पर तो नज़र आते हैं. चाहे वो अन्ना का अनशन रहा हो या हाल ही में मोदी का स्वच्छ भारत अभियान?

आमिर: मैं जिस चीज़ के लिए महसूस करता हूं चाहता हूं कि वह लोगों तक पहुंचे.

ये जो दोनों बातें आपने गिनाईं उनके लिए मैं बेहद आशावादी हूं और चाहता हूं कि मेरा देश भ्रष्टाचार से मुक्त हो. साफ सुथरा बने.

इसके लिए मुझे किसी के साथ भी मंच साझा करना हो मैं करूंगा.

मोदी जी की रैली में जाने का मकसद था कि मैं अपने फैंस तक ये बात पहुंचा सकूं कि वे भी इस मुद्दे को गंभीरता से लें.

वेलफेयर हीरो!

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लेकिन उन फ़िल्मों के लिए क्या कहेंगे जिनमें आप सामाजिक संदेश देते नज़र आते हैं. क्या आमिर ख़ान बॉलीवुड के वेलफेयर हीरो हैं?

आमिर: देखिए. ये इत्तेफ़ाक़ है कि सामाजिक संदेश वाली फ़िल्में मुझ तक आती हैं और मैं एक इंसान के तौर पर ऐसी फ़िल्मों का समर्थन भी करता हूं. लेकिन मैं ऐसी ही फ़िल्में चुनता हूं ऐसा भी नहीं है.

गजनी और डेल्ही बेली, इसके उदाहरण हैं.

'ख़ान' दबदबे पर आमिर

आमिर, बॉलीवुड में ख़ान हीरोज़ के दबदबे पर आपका क्या कहना है?

आमिर: अगर आप में टैलेंट नहीं है तो आप खुद को आगे नहीं ले जा पाएंगे. इसलिए मुझे लगता है कि बॉलीवुड में ख़ान होना कोई अजूबा नहीं है.

मैं ये ज़रूर मानता हूं कि शाहरुख़, सलमान और मुझे पिछले 25 सालों में जितना प्यार मिला है वो अपने आप में एक रिकॉर्ड है क्योंकि हम तीनों ही एक साथ एक समय पर मौजूद हैं लेकिन किसी की भी लोकप्रियता कम या ज्यादा आंकना मुश्किल है.

आमिर की शिक़ायत

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क्या ये सच है कि निर्देशकों को आपके साथ काम करने में तकलीफ़ होती है क्योंकि आप बहुत नुख्स निकालते हैं?

आमिर: मुझे बॉलीवुड के काम करने के तरीके से दिक्कत है. मुझे लगता है कि यहां हम जानबूझकर फ़िल्म बनाने की प्रक्रिया को लंबा कर देते हैं.

मैं स्क्रिप्ट सुने बिना काम नहीं करता और शायद यही वजह है कि लोगों को मेरे साथ काम करने में दिक्कत पेश आती है.

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मैं जानता हूं कि यहाँ हम सितारों की तारीखों के हिसाब से काम करते हैं.

अगर आज किसी स्टार ने आउटडोर के लिए वक़्त दिया है तो पहले वो हो जाएगा फिर बाकी की फ़िल्म बाद में शूट करेंगे. ये तरीका सही नहीं और यही मुझे परेशान करता है.

मेरे हिसाब से फ़िल्म को एक शेड्यूल में निपटाया जाना चाहिए.

आमिर को मीडिया से भी शिकायत थी कि वो बेहद 'जजमेंटल' होता जा रहा है लेकिन फिर वह रुक जाते हैं ये कहते हुए कि अरे आप भी तो मीडिया वाले हो.

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