जब चितचोर बना चित्रकार

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सत्तर के दशक का फ़िल्मी 'आम आदमी' अब चित्रकार बन गया है.

गोलमाल, चितचोर और छोटी सी बात जैसी फ़िल्मों में आम मध्यमवर्गीय आदमी का किरदार निभाकर लोगों का दिल जीतने वाले अभिनेता अमोल पालेकर ने अब पेंट और ब्रश थाम लिया है.

हाल ही में 70 साल के हुए अमोल पालेकर की पेंटिग्स की प्रदर्शनी मुंबई में लगाई गई. उसी मौक़े पर उनसे थोड़ी देर गुफ़्तगू करने का मौक़ा मिला.

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अमोल पालेकर से बातचीत

चार दशक के फ़िल्मी सफ़र के बाद अब चित्रकार बनने का क्यों सोचा?

आदमी इधर-उधर घूम के घर वापस आ जाता है. चित्रकला की परिभाषा में कह सकते हैं कि एक सर्कल कंपलीट हुआ.

मेरी खोज हमेशा चित्रकार की नज़र से ही थी. जब थिएटर या सिनेमा किया तब भी चित्रकार के दृष्टिकोण से ही काम किया.

बदलते माध्यमों में काम करने का अनुभव कैसा रहा?

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मैं जब कैनवास के सामने खड़ा होता हूं तो मेरी कोशिश होती है उसके खालीपन से जीतने की.

मेरे अंदर एक पेंटर है जो अपने ब्रश से अपने अंदर के खाली स्थानों को भर देना चाहता है और मैं चाहे रंगमंच पर रहूं, कैमरे के सामने या कैमरे के पीछे, काम यही पेंटर करता है.

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सिनेमा में मैं बासु चटर्जी और ऋषिकेश मुखर्जी जैसे फ़िल्मकारों फ़िल्मों का एक छोटा हिस्सा था.

आगे जाकर मैंने जब फ़िल्में बनाना शुरू किया तब मैं भी उनके काम की तरह काम कर रहा हूं और यही मेरा अनुभव है.

आज आम आदमी फ़िल्मों में क्यों नज़र नहीं आता?

पहले राजेश खन्ना हमें रोमांस दे रहे थे. जीतेंद्र नाच गाना दे रहे थे धरम जी माचो इमेज दे रहे थे, अमिताभ बच्चन एंग्री यंग मैन ले कर आए.

इन सबके बीच एक और नायक था जो बस और ट्रेन में सफर करके ऑफ़िस में काम करता था, रोमांस नहीं करता.

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यह असलियत लोगों को पसंद आई क्योंकि उसमें कुछ भी स्वप्नत्व नहीं था. इसलिए अमोल पालेकर और इस किस्म का सिनेमा लोकप्रिय हो गया.

दर्शकों को विकल्प देने से नुक़सान नहीं हो रहा था लेकिन फिर भी ये आम आदमी हटा दिया गया. क्यों हटाया गया यह अलग विषय है.

‘पहेली’ के बाद आपने निर्देशक के तौर पर कोई हिंदी फ़िल्म क्यों नहीं बनाई?

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मेन स्ट्रीम में मुझे दिलचस्पी नहीं है. ग्लैमर की तलाश में मुझे रुचि नहीं रही. लोग सोचते हैं कि ‘पहेली’ बनाई शाहरुख़ ख़ान के साथ तो अगली फ़िल्म आमिर ख़ान के साथ बनाएंगे.

लेकिन सच बात ये है कि मुझे विजयदान देथा की कहानी पसंद थी इसलिए ‘पहेली’ बनी, न कि शाहरुख़ के लिए.

उसके बाद भी जो कहानी मुझे अच्छी लगी वह जिस भाषा में बताना मुझे योग्य लगा उस भाषा में मैंने काम किया, कभी मराठी तो कभी अंग्रेज़ी.

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