सबकी कल्पनाओं में है एक राक्षस...

कथाकार

एक था राजा, एक थी रानी...दादी मां की कहानियाँ सुनना और दूसरी दुनिया में चले जाना या कहानी सुनते हुए सो जाना.

कहानी सुनने-सुनाने के शौकीनों के लिए दिल्ली में हुआ एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय महोत्सव, जिसमें दुनिया भर के कहानी सुनने और सुनाने वाले इकट्ठा हुए.

इस महोत्सव में ब्रिटेन से आई एमिली पॅरिश और सारा रंडल ने मंगोलियाई कहानियां, हंगरी के डॅनियल हॉल और ब्रिटेन के गॉड्फ्री डंकन ने अफ्रीकी लोककथाएं सुनाईं.

यहाँ तमिलनाडु के प्रोफ़ेसर वेट्टावरायण और उनके साथी, गुजरात के नायक बलदेव भाई और उनके साथी, और मणिपुर से पद्मश्री नमेरक्पम ओंग्बी आइबेम्नई देवी जैसों ने भी भारत की विभिन्न कथा शैलियों का प्रदर्शन किया.

सबसे बड़ा कहानीकार

एमिली पॅरिश कहती हैं, "जब नानी या दादी कहानी सुनाती तो सुनने वाले अपनी कल्पनाओं में राजा, रानी और राक्षस बनाते. वक़्त बदला मनोरंजन के साधन बदले. अब जो पीढ़ी आई है, वो ज़्यादातर मोबाइल, इंटरनेट पर आँखें गड़ाए बैठी रहती है. उसके पास मनोरंजन के कई विकल्प, टीवी, रेडियो और किताबें हैं."

पॅरिश कहती हैं, "अब सब कहानी सुनते हैं, देखते हैं, कोई कहानी सोचता नहीं. कहानी की किताबों में बहुत से लोग कहानी पढ़ते हैं, लेकिन किस्सागो आपको जो कहानी सुनाता है आप उसमें पूरी तरह शामिल होते हैं."

हंगरी से आए डॅनियल हॉल कहते हैं, "अगर आप चाहते हैं कि बच्चों की रचनात्मकता बढ़े और वो नई चीज़ों की कल्पना करना सीखें तो आपको उन्हें ऐसे ही कहानियाँ सुनानी चाहिए."

परंपरा को बचाने की कोशिश

महोत्सव में गुजरात की रंगमंच शैली 'भवाई' का भी लोगों ने लुत्फ़ उठाया. उन्होंने गुजराती लोक कथाएँ सुनीं जो पाँच सौ साल से ज़्यादा पुरानी हैं.

भवाई के किस्सागो नायक बलदेव भाई बताते हैं, "इस तरह की कहानियों की वजह से संस्कृति और परंपराओं की रक्षा होती है. जब ना टीवी था, ना रेडियो था तो कहानियाँ थीं. हम अपने इतिहास को कहानियों के ज़रिए ही जानते हैं."

महोत्सव का आयोजन इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला एवं संस्कृति केन्द्र (आईजीएनसीए) और 'घुमक्कड़ नारायण' नामक एक सांस्कृतिक संस्था ने किया था.

'घुमक्कड़ नारायण' की अध्यक्ष ऋचा बिष्ट कहती हैं, "जहाँ मनोरंजन के साधन नहीं पहुँचते, जहाँ स्कूलों में किताबें नहीं होती, वहाँ कहानियाँ होती हैं. और जब लोग किताबों से बोर हो जाते हैं तब बारी आती है कहानियों की. सबका अपना-अपना महत्व है."

आईजीएनसीए की मंगलम स्वामीनाथन कहती हैं, "जो बच्चे हैं वो अपनी कल्पना को बढ़ावा देने के लिए आए हैं और बड़े लोग इसलिए आए हैं कि वो अपने खोए हुए वक़्त को, बचपन को फिर से ढूँढ सकें."

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