अब हिंदी में आए चैट स्टीकर्स

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फ़ेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सएप जैसी सोशल चैटिंग साईट्स और ऐप्लीकेशंस पर चैटिंग करना अब एक रोज़मर्रा की आदत में शुमार हो गया है.

पहले ये सिर्फ़ लिखे हुए शब्दों के माध्यम से की जाती थी लेकिन धीरे धीरे इनमें स्टिकर्स का भी इस्तेमाल होने लगा है.

ये स्टिकर्स हर हाव भाव, बात चीत को सामने लाते हैं लेकिन ग्राफ़िक की मदद से बनाए इन स्टिकर्स में अगर किसी टेक्सट का इस्तेमाल किया जाता है तो वो रोमन लिपि में लिखा जाता है जैसे 'ओ तेरी' के लिए लिखा होगा 'Oh teri!'.

लेकिन स्टिकर्स की इस कमी को भी पूरा कर लिया गया है क्योंकि अब चैट स्टिकर्स देवनागरी में आ चुके हैं और इसे लाने वाले कोई कंप्यूटर ग्राफ़िक जीनियस नहीं एक भारतीय चित्रकार हैं जिन्होनें 100 से भी ज्यादा स्टिकर देवनागरी में बनाए हैं और वो भी हाथ से.

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स्टिकर्स का है ज़माना

चैट एप्लीकेशंस में स्टिकर का दौर बहुत पुराना नहीं है. 90 के दशक में जब याहू ने मैसेंजर एप्लीकेशन को लोगों के लिए खोला था तो इसमें उन्होनें स्माईली का विकल्प दिया था. विभिन्न हाव भाव लिए, पीले रंग के ये गोल से चेहरे चैट स्टीकर का पहला स्वरूप थे.

इसके बाद व्हाट्सऐप और फ़ेसबुक जैसी एप्लीकेशंस ने 2010 में इन्हें मूविंग कर दिया और ये कहलाए ईमोशन-आईकॉन.

बीते साल के शुरुआती महीनों में आई चैट एप्लीकेशन 'हाईक' ने इन चैट स्टिकर्स में हिंदी टेक्सट को भी शामिल किया.

स्टिकर के साथ संदेश भेजने वाला व्यक्ति अपने विचार को लिख भी सकता था जैसे किसी स्टिकर के साथ 'औऱ भई', 'क्या हाल है?' जैसे संदेश भी आ सकते थे लेकिन ये सभी संदेश रोमन लिपि में होते थे और यहीं से देवनागरी लिपि के स्टिकर्स के विचार ने अपनी नींव डाली अपराजिता शर्मा के दिमाग में.

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Image caption अपराजिता शर्मा ने अपनी स्टिकर में मौजूद किरदार को 'अनान्या' का नाम दिया है.

अनन्या की ख़ोज

अपराजिता शर्मा दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस कॉलेज में अध्यापिका के पद पर कार्यरत हैं लेकिन शौक से चित्रकारी करने वाली ये शिक्षिका अब एक पूर्णकालिक चित्रकार बनने की ओर अग्रसर है.

चित्रकारी में नए आयाम ढूंढते हुए उन्हें मिली 'अनन्या', यही नाम देती हैं वो अपनी स्टिकर में मौजूद किरदार को.

अपराजिता ने बताया, "मैं व्हाट्सऐप्प और फ़ेसबुक काफ़ी इस्तेमाल करती हूं लेकिन हिंदी की शिक्षिका होने के नाते मैं कई बार इन वेबसाईट्स पर हिंदी की कमी को महसूस करती थी. साल 2000 की शुरुआत में यूनीकोड आ जाने से कंप्यूटर में हिंदी टाईप आसान हो गया था और फिर मोबाईल में भी हिंदी टाईपिंग आ गई लेकिन चैट स्टिकर हिंदी में आते नहीं थे. यहीं से मुझे ये ख़ुराफ़ात सूझी."

अपराजिता बताती हैं, "एक चित्रकार के लिए चित्र बनाने के लिए पेड़, फूल पत्ती या फिर मॉर्डन ऑर्ट के विकल्प होते हैं लेकिन मैं कुछ अलग करना चाहती थी. फिर एक दिन मैंने अपनी एक सहेली की बेटी के लिए जन्मदिन पर उपहार स्वरूप 'अनन्या' का पहला चित्र बनाया. इसे फ़ेसबुक पर काफ़ी लाईक मिले और मैंने देखा कई लोगों ने इसे दूसरे लोगों की वॉल पर भी डाला. मुझे चित्रकारी के लिए एक नया विषय मिल गया था."

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हिट है अनन्या

मैंने बीते साल अनन्या के करीब 15 चित्र बना कर फ़ेसबुक पर डाले और अपने दोस्तों से आग्रह किया कि अगर वे चाहे तो इनका इस्तेमाल कर सकते हैं. शुरूआत में लाईक्स के अलावा कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ा लेकिन फिर एक दिन एक दोस्त ने अपना व्हाट्सऐप्प चैट दिखाया जिसमें उसकी राजस्थान की रहने वाली दोस्त ने अनन्या का इस्तेमाल किया था. इसके बाद मुझे समझ में आया कि लोग इन स्टिकर्स का इस्तेमाल कर रहे हैं.

अनन्या का इस्तेमाल अपने चैट पर करने वाली बिज़नेस वुमेन विनीता जैन अग्रवाल ने बताया, "मैंने बस इन्हें इसलिए इस्तेमाल किया क्योंकि मुझे लगा ये कुछ अलग है, ये मेरी भाषा में मेरी बात कह रहे हैं."

इन स्टीकर्स का इस्तेमाल करने वाले कर्ण कहते हैं, "ये स्माईली से काफ़ी कूल हैं और डिफ़रेंट भी, जब मैं अपने ग्रुप में इन्हें शेयर करता हूं तो लोग पूछते हैं ये कहां से मिला ?"

क्योंकि अपराजिता एक लेक्चरर भी हैं इसलिए उनके चित्रों का कॉलेज स्टूूडेंट्स में पॉपुलर होना स्वाभाविक है. उनकी एक छात्रा सुप्रिया ने बताया, "हम सब मैम के बनाए चित्रों का इस्तेमाल करते हैं, हाथ से बनाए इन स्टिकर्स में जो फ़ीलींग है वो ग्राफ़िक स्माईली से नहीं मिलती"

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हैं चुनौतियां भी

अपराजिता इन स्टीकर्स को बना तो रही हैं लेकिन उनके सामने एक बड़ी परेशानी है कि ये हाथ से बने हैं और यही इनकी ख़ासियत है.

लेकिन इसमें लगने वाले वक़्त के चलते वो इनकी संख्या को बढ़ा नहीं पाती. वो कहती हैं, "कंप्यूटर डिज़ाईनर्स एक मिनट में जो स्माईली या स्टिकर तैयार करते हैं वैसे एक 'अनन्या' बनाने में मुझे 1 दिन लग जाता है.

कई बार पेपर फ़ाड़ कर दोबारा शुरू करना पड़ता है"

व्यवसाय

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क्या वो इसे व्यवसाय बनाएंगी ?

इस सवाल पर वो कहती हैं, "ये चित्र मेरे दिल के करीब हैं और जो चीज़ दिल के पास होती है वो बेची नहीं जाती. मैं चाहती हूं कि ज्यादा से ज्यादा लोग इन्हें इस्तेमाल करें और हमारी भाषा का प्रसार हो. अगर मैंने इनकी कीमत रख दी तो ये अपनी लोकप्रियता खो देंगे."

लेकिन अनन्या को पेटेंट करने के लिए लोग आगे आए हैं और जल्द ही किसी सोशल चैटिंग साईट का य़े हिस्सा बन सकते हैं.

इसके अलावा इन्हें इस्तेमाल करने के लिए इन्हें अपने पास सेव करना पड़ता है ऐसे में डिवाईस की मेमोरी खर्च होने का भी ख़तरा रहता है जो एक चुनौती के तौर पर 'अनन्या' सीरीज़ के सामने है.

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