राजस्थान की मिट्टी से कोक स्टूडियो तक!

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ममे ख़ान राजस्थान के मशहूर मंगनियार घराने के लोक गायक है.

वह इस घराने की 14वीं पीढ़ी हैं और बेहतरीन ढंग से अपना घराना आगे बढ़ा रहे हैं.

बीबीसी हिंदी से एक ख़ास मुलाक़ात में उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने अपनी संगीत शिक्षा पूरी की, फ़िल्मों में गाना गाया और कैसे रेगिस्तान की रेत से निकलकर 'कोक स्टूडियो 'पहुंचे.

पढ़ें ममे ख़ान से बातचीत के ख़ास अंश

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मंगनियार घराने की कहावत है कि यहां का बच्चा अगर रोता भी है तो सुर में रोता है.

शादी या जन्मदिन जैसे खुशी के मौकों के लिए गीत गाने वाला यह मशहूर घराना आज चर्चा में हैं गायक ममे ख़ान के कारण जिन्होंने 'कोक स्टूडियो' में संगीतकार अमित त्रिवेदी के साथ मिलकर राजस्थानी संगीत को पश्चिमी डबस्टेप से मिला दिया.

ममे के गाने 'चौधरी' ने सबका मन मोह लिया और रातों रात चर्चा में आ गए.

ममे कहते हैं, "संगीत की शुरुआत मेरे जन्म से हुई है. मेरे पिता राणा ख़ान हमारे घराने के बड़े गायकों में हैं और संगीत की दुनिया में मैंने सबसे पहले अपने पिता राणा ख़ान को ही सुना था और मैं उनका मुरीद हो गया था."

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ममे बताते हैं मंगनियार घराने में हर छोटा बच्चा संगीत के माहौल में बड़ा होता है. खाते-पीते उठते-बैठते हम संगीत को जानते हैं, सीखते हैं लेकिन इसकी कोई डिग्री नहीं होती.

वे कहते हैं, "हमारे घराने में सब कुछ मौखिक है. कहीं पर कुछ लिखा हुआ नहीं है. ऐसे ही चलता आ रहा है. लेकिन मैं इसको आहिस्ता-आहिस्ता लिख रहा हूं क्योंकि न लिखने की वजह से बहत सारे गाने लुप्त हो गए हैं."

'चौधरी' से बनी बात

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14 पीढ़ी से यह घराना गाना गाता आ रहा है पर इस घराने को लोग पहचानने-जानने लगे, जबसे ममे ख़ान ने 'कोक स्टूडियो' में संगीतकार अमित त्रिवेदी के साथ 'चौधरी' गाना गाया.

हालांकि इससे पहले ममे ने 'नो वन किल्ड जेसिका', 'लक बाई चांस', 'आई एम कलाम' जैसी फ़िल्मों में गाना गाने के बाद भी श्रोता, लोकगायक ममे ख़ान के बारे में नहीं जान रहे थे. ऐसा क्यों?

इस पर ममे कहते हैं, "मेरा मानना है कि एक कलाकार के लिए सिर्फ़ एक कलाकार होना पर्याप्त नहीं. उसके लिए आपको सोशल मीडिया में आना बहुत ज़रूरी है. मेरा कोई भी गाना 14 साल पहले मेरे गांव में 3000 लोग सुनते थे लेकिन आज वही गाना लाखों लोग सुनते हैं और मैं चाहता हूं कि मेरा संगीत सब सुनें और समझें और वही काम कोक स्टूडियो ने करके दिखाया."

सोलो गायक

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मंगनियार घराने की एक रीत है कि इसका कोई भी गायक अकेला नहीं गाता लेकिन ममे ख़ान शायद अकेले ऐसे गायक हैं जो सोलो परफ़ॉर्मेंस देते हैं.

ममे कहते है,"मंगनियार घराने में कई शाखा हैं जो साथ में गाते हैं और कई सोलो गाते हैं. मेरे पिताजी सोलो गाते थे तो मैं भी उनके नक़्शे-क़दम पर चल रहा हूं."

वे कहते हैं, " मैंने अपने ट्रेडिशन को नहीं छोड़ा है. हां ये ज़रूर है मैंने इसमें थोड़ी बहत तब्दीली की है, कुछ गानों में मैंने टेम्पो बदला है और बहत जल्द आप सब इसको सुन पाएंगे मेरे एल्बम में जो मार्च के अंत तक रिलीज़ होगी."

लोकगीत

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ममे को अफ़सोस है कि बहुत समय से बॉलीवुड में राजस्थानी लोक संगीत का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है पर उसे वह दर्ज़ा नहीं मिला जो पंजाबी संगीत को मिला.

वे कहते है,"कई साल से राजस्थानी गानों का फ़िल्मों में इस्तेमाल हो रहा है, चाहे 'निंबुड़ा निबुंड़ा' हो या 'पल्लो लटके' या फिर 'परदेसी परदेसी'. इन सबमें आपको राजस्थानी मिट्टी की खूशबू आएगी लेकिन क्रेडिट देने में फ़िल्म जगत पीछे रह जाता है."

ममे ख़ुद को खुशनसीब मानते हैं कि उनको अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक प्लेटफ़ॉर्म मिला और इसके ज़रिए वह अपने घराने को नई उंचाई पर ले जाना चाहते हैं.

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