छोटे क़द के हीरो, करते हैं बड़े-बड़े काम

मांगा कॉमिक्स

एक ऐसी किताब जो पूरे जापान में नज़र आती है. क्या बच्चे, बूढ़े और जवान सभी के बीच यह लोकप्रिय है.

यह कुछ और नहीं बल्कि एक कॉमिक्स है, जिसे 'मांगा' कहते हैं. इसमें स्कूल के रोमांस से लेकर प्राचीन साहित्य तक को विषय बनाया जाता है.

इनके किरदारों को लेकर ऐसी दीवानगी है कि लोग इनके जैसे कपड़े पहनते हैं और कुछ लोग तो इन किरदारों से वर्चुअल शादी भी कर लेते हैं.

मांगा की सहजता और उसका आकर्षण पूरी दुनिया में एक जैसा है, बस इसके चित्र अलग-अलग होते हैं.

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साठ के दशक में जापान पढ़ने गए अशोक जैन कहते हैं, "ये कॉमिक्स जापान की लिपि चित्रों पर आधारित है, इसलिए चित्रों के माध्यम से पढ़ना उनके लिए आसान होता है."

जैन कहते हैं, "कई लोगों के लिए यह तस्वीरों के माध्यम से कहानी बताने की एक कला है, पर जापानी लोगों की लिए यह आसान माध्यम है, क्योंकि वे इसे भीड़ में भी पढ़ सकते हैं."

अगर जापान की कुछ मशहूर चीजों की बातें करें तो समुराई, सुशी के बाद मांगा का ही नाम आता है.

वाणी प्रकाशन ने दो मांगा किताबें हिंदी में प्रकाशित की हैं. एक कॉमिक्स 'सकुरा का देश' सामाजिक व्यवस्था पर आधारित है और तीन पीढ़ियों की कहानी है.

मुश्किल कहानियाँ

वाणी प्रकाशन की निदेशक अदिति माहेश्वरी का कहना है, "आने वाले समय में जो मुश्किल कहानियाँ हैं और शब्दों में बयां नहीं की जा सकतीं, उन्हें चित्रों के द्वारा उतनी ही संवेदना के साथ पाठकों के सामने प्रस्तुत किया जा सकता है."

उनके मुताबिक़, "भारत में मांगा लाई गई ताकि इसके माध्यम से नई सामाजिक चेतना लाई जा सके. दुनिया में पहली बार मूकबधिर के लिए भी मांगा लाई गई है, 'उँगलियों का ऑर्केस्ट्रा.'"

छोटे क़द के हीरो

काम बड़ा होना चाहिए बेशक क़द छोटा हो. जापान की चित्र कथाओं में हीरो को अक्सर छोटे क़द का दिखाया जाता है.

अदिति के अनुसार, "ये भी जापान की सभ्यता का एक अंग है. उनका मानना है की छोटी चीज़ से गंभीरता आती है, इसलिए इनके हीरो लम्बे नहीं होते."

उनका कहना है, "वो छोटे होते हैं पर काम बड़ा करते हैं. अब वो काम कोई भी हो सकता है, गणित के सवाल हल करने हों या फ़िजिक्स के फॉर्मूले याद करने हों और अपने इतिहास को जानना हो तो भला मांगा से अच्छा क्या है."

सेस्क एजुकेशन का ज़रिया

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इसमें केवल किशोरावस्था से गुजर रहे बच्चों के रोमांस की कहानी नहीं है, बल्कि यह सेक्स एजुकेशन देने का एक अद्भुत ज़रिया भी है.

जापानी महिला योमिको इशि भारत में कत्थक सीखने आई हैं. वो कहती हैं, "माँगा कॉमिक पढ़ना केवल मनोरंजन नहीं है, इसमें कई सामाजिक मुद्दों को भी लिया जाता है."

वो कहती हैं, "बच्चे इससे सीखते हैं. प्यार करने और प्यार पाने में ये उनकी मदद करती हैं."

बुज़ुर्गों के लिए अलग कॉमिक्स

इन किताबों की लोकप्रियता का आलम यह है कि जिस घर में बच्चे होते हैं वहां दर्जनों की संख्या में मांगा जरूर मौजूद होती हैं.

बुज़ुर्गों के लिए मांगा की अलग से शृंखला निकाली जाती है.

वर्ष 2012 में जापान फ़ाउंडेशन मांगा को भारत में अंग्रेज़ी में लेकर आया.

आज यहाँ मांगा कैफ़े हैं, जहां इनके किरदारों के कटआउट हैं, उनके परिधान रखे गए हैं और कोई भी यहां आकर इन किताबों को पढ़ सकता है.

अब अगली बार जब ये किरदार डोरेमॉन, नोबिता, नोबी, नारोतो, पिको चान, हेलो किट्टी आपस में बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान पर बातें करते नज़र आए तो हैरत मत कीजिएगा.

भारत में मौखिक कहानी कहने की जो परम्परा रही है, उससे मांगा बेहद करीब है और प्रकाशक को उम्मीद है भारत का जनमानस मांगा को अपनाएगा.

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