फ़िल्म रिव्यू: एनएच10

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फ़िल्म: एनएच10

निर्देशक: नवदीप सिंह

कलाकार: अनुष्का शर्मा, नील भूपलम

रेटिंग: ***

ये डार्क किस्म की फ़िल्म है जो ऑनर किलिंग जैसे मुद्दे पर प्रकाश डालती है.

इस मुद्दे पर मैंने दिबाकर बनर्जी की 'एलएसडी' (2010) के अलावा कोई और प्रभावी फ़िल्म नहीं देखी.

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'एनएच10' शहरी और ग्रामीण भारत के बीच के अंतर को दिखाती है.

फ़िल्म का जो प्लॉट है उस पर बड़ी आसानी से, बिना किसी मेहनत के एक सतही, थर्ड क्लास की बी ग्रेड फ़िल्म बनाई जा सकती थी.

थैंक गॉड, ऐसा नहीं हुआ.

कहानी

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एक जोड़ा जो सफ़र कर रहा होता है उस पर रास्ते में ख़तरनाक किस्म के गुंडे हमला कर देते हैं.

ये जोड़ा दिल्ली से सटे गुड़गांव में रहता है.

गुड़गांव, ऊंची-उंची इमारतों और शॉपिंग मॉल्स वाला एक बेहद अव्यस्थित शहर जो आसपास के ऐसे ग्रामीण इलाकों से जुड़ा है जहां आज भी मध्य युगीन सभ्यता और रीति रिवाज़ जारी है.

फ़िल्म की हीरोइन एक मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव है.

हीरो के पास एक महंगी गाड़ी है. जिस कंपनी की ये गाड़ी है वो इस फ़िल्म को अपने विज्ञापन के तौर पर इस्तेमाल कर सकती है क्योंकि पूरी फ़िल्म में इस गाड़ी को बड़ी प्रमुखता से दिखाया गया है.

चौंकाने वाले दृश्य

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फ़िल्म में कई चौंकाने वाले दृश्य हैं.

इस जोड़े को जिन हालातों का सामना करना पड़ता है उन परिस्थितियों में आप भी हो सकते हैं.

लेकिन मुझे नहीं लगता कि आप ऐसी बेवकूफी कर गुज़रेंगे जो इन लोगों ने की थी. एक बचकानी बंदूक लेकर छटे हुए बदमाशों से उलझ पड़ेंगे.

अभिनय

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अनुष्का शर्मा ने फ़िल्म में केंद्रीय भूमिका निभाई है. वो फ़िल्म की सह निर्माता भी हैं.

फ़िल्म में अपने सूजे हुए होंठो के बावजूद वो प्रभावी लगी हैं.

अपना रोल उन्होंने बहुत अच्छे से निभाया है.

उनके पति का रोल किया है नील भूपलम ने जो 'रागिनी एमएमएस' के राजकुमार राव और आकर्षक दिखने वाले रणदीप हूडा की क्रास ब्रीड लगते हैं.

किसी और उपयुक्त शब्द के अभाव में चलिए मैं उन्हें फ़िल्म का हीरो ही कह देता हूं.

विलेन

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फ़िल्म का मुख्य खलनायक एक जाट/गुज्जर सरीखा युवक है.

इस ठेठ हरियाणवी किरदार को दर्शन कुमार ने निभाया है जो इससे पहले फ़िल्म 'मेरी कॉम' में प्रियंका चोपड़ा (मेरी कॉम) के पति की भूमिका में दिख चुके हैं.

उन्होंने 'एनएच10' में शानदार अभिनय किया है.

इसके बाद मुझे लगता है कि इस बकवास बहस पर विराम लगेगा कि पंजाबी कुड़ी प्रियंका चोपड़ा को एक पूर्वोत्तर भारतीय महिला का किरदार निभाना चाहिए या नहीं.

निर्देशन

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कहानी को आगे बढ़ाने वाली बहुत ज़्यादा घटनाओं के ना होने और बेहद कम किरदारों के बावजूद फ़िल्म आपको बांधे रखती है.

इसका क्रेडिट काफ़ी हद तक निर्देशक नवदीप सिंह को जाता है.

नवदीप की पहली फ़िल्म 'मनोरमा सिक्स फ़ीट अंडर' (2007) भी एक बेहतरीन फ़िल्म थी.

वो फ़िल्म 1974 में आई 'चाइनाटाउन' का शानदार देसी रूपांतर थी.

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वैसे मैंने साल 2008 में आई हॉरर फ़िल्म 'ईडन लेक' नहीं देखी है लेकिन प्लॉट के हिसाब से 'एनएच10' उससे काफी मिलती है.

'एनएच10' एक थ्रिलर फ़िल्म है.

फ़िल्म के कुछ सीन आपके रोंगटे खड़े कर देंगे.

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