'ती' एक भुतहा नाटक

  • 27 मार्च 2015
नाटक ती

उस समय ऑडिटोरियम में काफ़ी अंधेरा थ और एक औरत के लोरी गाने की आवाज़ आ रही थी. सबका ध्यान स्टेज पर था और तभी अचानक वह मेरे बहुत पास से गुज़री.

उसके खुले बाल, न मचलने वाली बड़ी बड़ी आँखे, लाल बिंदी, हाथ में सर कटे बच्चे का शरीर- मेरे रोंगटे खड़े हो गए. क्या हो रहा है कुछ पता चले उसके पहले ही वह दिखनी बंद हो गई.

दर्शकों की भीड़ में से कोई डर के मारे चिल्लाया भी, तो फ़ुसफ़ुसा कर बात करने वाले कुछ लोग बिल्कुल चुप हो गए, थिएटर में लोग होने के बावजूद सन्नाटा महसूस हुआ.

ये किसी फ़िल्म का दृश्य नहीं है बल्कि वास्तविक अनुभव है जो आपको मराठी नाटक ‘ती’ के दौरान हो सकता है. नाटक में हास्य, श्रृंगार या वीर रस तो बहुत बार दिखाए गए है लेकिन शायद पहली बार भयानक रस का मंचन किया गया.

नाटक में नाटक

यूटोपिया कम्युनिकेशन के प्रीतेश सोढा एक युवा दिगदर्शक हैं जिन्होंने इससे पहले भी प्रयोगात्मक नाटकों का मंचन किया है. ‘ती’ का नाट्य प्रयोग बहुत रसप्रद है क्योंकि यहां नाटक में ही नाटक हो रहा है.

मराठी शब्द ‘ती’ का मतलब होता है वह. रोहन टिल्लू लिखित इस नाटक की कहानी शुरू होती है जब देशपांडे नामक एक वकील अपनी कहानी ले कर पटवर्धन नाम के दिग्दर्शक के पास जाता है.

देशपांडे चाहता है कि उसकी कहानी नाटक के माध्यम से लोगों तक पहुंचाई जाए. दिग्दर्शक वकील का पात्र निभाता है और वकील अपनी कहानी में आने वाले अन्य पात्रों का अभिनय करता है. कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है दर्शकों के दिलों की धड़कनें कई मौक़ों पर बढ़ जाती है.

क्या है कहानी?

अपने केस के सिलसिले में देशपांडे को एक गांव में जाना पड़ता है जहां उसे कई अजीबो गरीब अनुभव होते है. श्मशान घाट पर दिखने वाली औरत, वीरान रास्ते पर होता हुआ एक्सीडेंट, पालना झुलाती औरत की परछाई और बहुत कुछ देशपांडे को अचंभित करता रहता है.

इन सब अनुभवों का कारण पता चलते ही वह मुंबई वापस आता है और समय के साथ इस घटना का प्रभाव कम होने लगता है लेकिन आखिरकार जो होना था सो होता है.

घटना का नाट्यकरण करते हुए पटवर्धन को कहानी तब तक दिलचस्प लगती है जब तक उसे अभिनय के दौरान दिखने वाली औरत की सच्चाई पता नहीं चलती और वहीं नाटक का अंत होता है. दर्शक भी कुछ क्षण अपने आप को संभालते हैं क्योंकि उस औरत को उन्होंने भी तो देखा था.

इस नाटक की कहानी हॉलीवुड के अभिनेता डेनियल रैडक्लिफ की फिल्म ‘वुमन इन ब्लैक’ में से ली गई है और रोहन टिल्लू ने इस नाटक में दिग्दर्शक पटवर्धन का और वकील देशपांडे का पात्र निभाया है तो ओमकार तिरोडकर ने इस नाटक में नामदेव, पंढरी मामा, नारायणराव, मोहितराव टांगेवाला, गणपतराव, धर्माधिकारी जैसे कई पात्रों का अभिनय बहुत सहजता और प्रभावशाली तरीेके से निभाया है.

हॉलीवुड से प्रेरणा

हमें डराने वाली 'ती' यानी 'वह' का पात्र शीतल कपोले ने निभाया है.

हॉरर में संगीत का भी बहुत योगदान होता है जो इस नाटक में ओजस भट्ट और रिशित झावेरी ने संभाला है और लाइटिंग दिगंबर आचार्य का है. लाइटिंग की बात यहां इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस नाटक के दौरान 'ती' को प्रकट और गायब करने का काम स्टेज लाइट्स की सहायता से ही होता है.

जब इस नाटक के बारे में मैंने मेरी दोस्त सुप्रिया सोगले से बात की तब उसे भी तुरंत ‘वुमन इन ब्लैक’ फिल्म की कहानी याद आई. लेकिन नाटक में हॉरर का माहौल इस कदर पैदा हो जाता है कि आप सोच ही नहीं पाते कि किसी फ़िल्म को याद करें या किसी देवदूत को.

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