रिव्यू: डिटेक्टिव ब्योमकेश बक्शी

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फ़िल्म: डिटेक्टिव ब्योमकेश बक्शी

निर्देशक: दिबाकर बनर्जी

कलाकार: सुशांत सिंह राजपूत, नीरज कबी

रेटिंग: **

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जासूसी जैसे मज़ेदार और मनोरंजक विषय पर फ़िल्म बनाते समय आप कितने मूडी हो सकते हो ये मुझे इस 150 मिनट लंबी फ़िल्म देखकर महसूस हुआ.

हालांकि फ़िल्म की प्रोडक्शन क्वालिटी आला दर्जे की है.

फ़िल्म में लगातार प्रकाश और छाया का इस्तेमाल किया गया है. हर लम्हे को जानबूझकर एक ख़ास शक्ल देने की कोशिश की गई है.

फ़िल्म के कई स्लो मोशन वाले दृश्यों पर बजता हुआ बैकग्राउंड संगीत असरदार है.

सुस्त रफ़्तार

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लेकिन फ़िल्म की रफ़्तार बड़ी सुस्त है. काश फ़िल्म के कुछ हिस्सों में जीवंतता और उर्जा होती तो ये फ़िल्म देखने लायक बन जाती. फ़िल्म बनावटी बन पड़ी है.

इसकी कहानी ज़रूरत से ज़्यादा पके हुए अंडे की तरह है.

ढेर सारे किरदार हैं. चीनी, जापानी और ना जाने कौन-कौन.

जटिल फ़िल्म

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अगर फ़िल्म देखते समय आप अलर्ट नहीं रहे, अगर आंखे फाड़-फाड़कर फ़िल्म नहीं देखी तो आपको समझ नहीं आएगा कि पर्दे पर क्या चल रहा है.

फ़िल्म, सरदेंदु बंदोपाध्याय के किरदार ब्योमकेश बक्शी पर आधारित है.

मेरी उम्र के तमाम लोगों के ज़ेहन में 90 के दशक में दूरदर्शन पर आने वाले ब्योमकेश बक्शी की यादें हैं.

अभिनय

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सुशांत सिंह राजपूत ने लीड रोल किया है. ना तो वो किरदार की आत्मा पकड़ पाए हैं ना ही उनमें इस मुख्य किरदार वाली अकड़ है.

उन्होंने अपने रोल को इतना ज़्यादा अंडरप्ले किया है कि फ़िल्म के दूसरे मुख्य कलाकार नीरज कबी उनसे कहीं ज़्यादा प्रभावशाली नज़र आते हैं.

फ़िल्म के हिसाब से ब्योमकेश 24 साल का है. वो मुंगेर (बिहार) में पैदा हुआ और 15 साल की उम्र में कोलकाता चला आया.

वो जासूस है लेकिन जासूसी की दुनिया में अभी अपना नाम नहीं बना पाया है. पुलिस वालों तक को नहीं पता कि वो कौन है.

वो एक हॉस्टल में कमरा किराए पर लेकर रहता है और उसी हॉस्टल से ग़ायब हुए एक दूसरे किराएदार की खोज करता है.

प्लॉट

शुरुआत में फ़िल्म का प्लॉट अफ़ीम तस्करी से शुरू होता है जो बाद में द्वतीय विश्व युद्ध में शामिल देशों पर शिफ़्ट हो जाता है.

थोड़ी देर बाद निर्देशक दिबाकर बनर्जी और ब्योमकेश बक्शी दोनों अपने लक्ष्य से भटक जाते हैं.

ये दिबाकर की पांचवी फ़िल्म है. उनकी इससे पहले की सभी फ़िल्में बेहतरीन हैं.

निर्देशन

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इस फ़िल्म का ट्रेलर भी ख़ासी उम्मीदें जगा रहा था. फ़िल्म का कॉन्सेप्ट भी अच्छा है.

लेकिन इस बार दिबाकर चूक गए हैं.

अगर आप अपनी उम्मीदें काफ़ी कम कर लें तो हो सकता है कि इस फ़िल्म को आप थोड़ा पसंद कर पाएं.

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