मां की मज़दूरी पर पले, और हीरो बने..

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सिनेमा के परदे पर विभिन्न किरदार निभाने वाले अभिनेता बस एक रोल कर रहे होते हैं. लेकिन कई बार फ़िल्म का काल्पनिक चरित्र उसे निभाने वाले अभिनेता की निज़ी ज़िंदगी के बहुत क़रीब होता है.

2014 की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली - 'कोर्ट' के हीरो वीरा साथीदार के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ.

इस फ़िल्म को कई अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले है और ये 17 अप्रैल को रिलीज़ होगी. मूलतः मराठी भाषा की इस फ़िल्म में हिंदी, गुजराती और अंग्रेजी के डायलॉग्स का भी काफ़ी इस्तेमाल हुआ है.

दिलचस्प ये है कि फ़िल्म के हीरो वीरा साथीदार की निज़ी ज़िंदगी फ़िल्म के नायक 'नारायण कांबले' के जीवन से काफ़ी मेल खाती है.

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अपनी फिल्म ‘कोर्ट’ को मिले कई सम्मानों के साथ वीरा साथीदार अचानक सुर्खियों में आ गए हैं. साथीदार का बचपन बेहद गरीबी में नागपुर की एक स्लम में बीता है.

उनके पिता रामदास कुली का काम करते थे. गरीबी इतनी, कि डाक्टर बीआर आम्बेडकर के आह्वान पर जब वे धर्म परिवर्तन के लिए अपने पैतृक गाँव से नागपुर पहुंचे तो घर के बर्तन तक बेचने पड़े थे.

साथीदार याद करते हुए कहते हैं, "हम बहुत दिनों तक मिट्टी के बर्तन में खाना खाने को मजबूर थे. माँ मज़दूरी करने जाती थीं तो हम बच्चों को याद दिलाकर जाती थीं कि ‘सावधान रहना’ ‘जनी’ (पड़ोस की लड़की) आएगी तो रोटी-सब्जी चुरा ले जाएगी."

डबडबाई आँखों से साथीदार कहते हैं, "मुझे आज भी ‘जनी’ के लिए बहुत प्यार और सम्मान है. वो भी ऐसी गरीबी में थी कि रोटी-सब्जी चुरानी पड़ती थी, वह घर के बर्तन या जूते चप्पल नहीं चुराती थी. इसके अलावा हमारे घरों में था भी क्या!"

सुखद आश्चर्य

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Image caption वीरा साथीदार अपने परिवार के साथ.

वीरा कहते हैं, "हमारी फ़िल्म को ‘अंतरराष्ट्रीय सम्मान’ तो कई मिल चुके थे लेकिन नेशनल अवार्ड का ‘गोल्डन लोटस’ (सर्वश्रेष्ठ भारतीय फीचर फिल्म) अवार्ड मिलने की सूचना जब मुझे मिली तो मैं आश्चर्य से भर गया. मेरे मुंह से अचानक निकला - ‘अरे इस फिल्म को तो बैन होना चाहिए था,' पर सम्मान ले कर आ गई.''

साथीदार ने कहा, "फिल्म स्टेट के डर और तुनकमिजाज़ चरित्र को सामने लाती है. इसकी कहानी एक ऐसे लोकगायक के इर्द–गिर्द घूमती है, जो मजदूरों के जन–जागरण के लिए गीत गाता है. उस पर स्टेट के द्वारा एक मुकदमा इस कारण लाद दिया जाता है कि उसके गाने से व्यथित होकर एक व्यक्ति ने आत्महत्या कर ली. इस क्रम में क्रूर न्याय व्यवस्था और उसके तंत्र का बेहद मार्मिक चित्रण किया गया है."

साथीदार कहते हैं कि ऐसी फिल्म का वर्तमान स्टेट की ओर से सम्मानित किया जाना सुखद आश्चर्य ही है.

जिंदगी की परत

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साथीदार बताते हैं, "जब मेरे पास इस फिल्म में काम करने के लिए संदेश आया तो मुझे लगा कि वे या तो मज़ाक कर रहे हैं या बड़े कलाकारों को देने के लिए उनके पास पैसे नहीं हैं. लेकिन जब मैं फिल्म करने लगा तो नारायाण कांबले के बहाने मेरी जिन्दगी की परत दर परत सामने आने लगी."

साथीदार कहते हैं, "मैं भी कांबले की तरह लोक गायक रहा हूँ और बुटीबोरी औद्योगिक परिसर में काम करते हुए मजदूरों के जनजागरण के लिए नुक्कड़–नाटक और लोक गायन करता रहा हूँ."

नागपुर की दीक्षाभूमि पर दिल्ली के ‘दानिश बुक्स’ की किताबें बेचने वाले साथीदार ने बताया, "मैं कभी गिरफ्तार तो नहीं हुआ, लेकिन मुझ पर भी पुलिस की नज़र हमेशा बनी रहती है. अभी तक कोई बहाना नहीं मिला उन्हें."

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साथीदार कहते हैं, "फिल्म की कहानी यथार्थ के बहुत करीब है. फिल्म के निदेशक चैतन्य तम्हाने ने इसके निर्माण में काफी मेहनत की है. विनायक सेन से लेकर कई सामाजिक कार्यकर्ताओं (जिन्हें देशद्रोह के मुकदमों में बंद रहना पड़ा) की जिन्दगी का अध्ययन कर यह फिल्म बनाई गयी है. मेरे लिए तो यह अपनी जिन्दगी को दुहराने जैसा ही था."

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