ये हैं भारत को सम्मान दिलाने वाली फिल्में

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बॉलीवुड की दुनिया और उसके सितारों की चमक दमक हमेशा सुर्ख़ियों में रहती है, जबकि क्षेत्रीय फिल्में इस मामले में पिछड़ जाती हैं.

लेकिन इन फिल्मों में कई ऐसे फिल्में हैं जिन्होंने देश से बाहर भारत का सम्मान बढ़ाया है.

1. आशा जओर माझे

बंगाली फ़िल्मों के नवीन निर्देशक आदित्य विक्रम सेनगुप्ता की ये फ़िल्म दो आम लोगों की कहानी हैं जिनके रास्ते मंदी के महौल में जुड़ते है.

फ़िल्म को राष्ट्रीय पुस्कार से नवाज़ा गया है. लेकिन ये फ़िल्म दुनिया के लगभग 45 फ़िल्म उत्सवों में जा कर तारीफ़ें और पुरस्कार बटोर चुकी है. इनमें शामिल है वेनिस अंतराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह, अबु धाबी फ़िल्म फेस्टिवल, मराकेश अंतरष्ट्रीय फ़िल्म समारोह और बीएफ़आई लंदन फ़िल्म फेस्टिवल.

फ़िल्म के निर्देशक आदित्य विक्रम का कहना है कि "बंगाली सिनेमा ने हमेशा से ही अंतराष्ट्रीय स्तर पर ख़ास जगह बनाई है पर उस महान बंगाली सिनेमा का पतन हो गया है. अब कई नए फ़िल्मकार नई कहानियाँ लेकर आ रहे हैं पर उन्हें सही मायनोंं में अच्छे निर्माता की ज़रूरत है जो नई कहानियों का जोख़िम उठा सके."

2. किल्ला

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निर्देशक अविनाश अरुण की मराठी फ़िल्म 'किल्ला' एक 11 साल के लड़के की कहानी है जो पिता की मौत के बाद ज़िंदगी में बदलाव से जूझ रहा है.

'किल्ला' ने बर्लिन फ़िल्म फेस्टिवल में "जनरेशन के प्लस सेक्शन" में बेस्ट फ़िल्म का ख़िताब जीता. इसने राष्ट्रीय पुरस्कारों में सवश्रेष्ठ मराठी फ़िल्म का ख़िताब भी जीता है

इस फ़िल्म के निर्देशक अविनाश अरुण कहते हैं "ऐसी फ़िल्म की सफलता का श्रेय मराठी फ़िल्मी दर्शकों को देना चाहूंगा जो ऐसे सिनेमा में दिलचस्पी रखते हैं और नए फ़िल्मकारों को साहस देता है कि वो ऐसी अलग फिल्में बनाएं."

3. क़िस्सा

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पंजाबी फिल्म 'क़िस्सा' एक सिख की कहानी है जो 1947 में बंटवारे के समय पंजाब आ जाता है. अपनी चौथी बेटी कंवर को वो बेटे की तरह बड़ा करता है जो ट्रक ड्राइवर बनती है लेकिन उलझनें तब बढ़ जाती हैं जब कंवर एक लड़की से शादी करती है.

'क़िस्सा' फ़िल्म ने टोरंटो फ़िल्म फेस्टिवल में तारीफ़ें बटोरी और अवॉर्ड भी जीता. इस फ़िल्म ने कई फ़िल्म फेस्टिवल का भ्रमण किया जिसमे शामिल है रॉटरडैम अंतराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह, साउ पाउलो अंतराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह और वेसोल एशियन फ़िल्म समारोह.

4. श्वास

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2004 में बनी ये फिल्म एक ऐसे लड़के की कहानी थी जो आँखों के कैंसर से जूझ रहा था.

सच्ची घटना पर आधारित ये फ़िल्म 2004 के ऑस्कर में सर्वश्रेष्ठ विदेशी फ़िल्म कि केटेगरी में छठे पायदान पर रही.

श्वास फ़िल्म को उस साल नेशनल अवॉर्ड से भी नवाज़ा गया. श्वास को मराठी सिनेमा के सबसे बड़े मोड़ के तौर पर देखा जाता है.

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