बॉलीवुड के निर्देशक जो विलेन बन गए

  • 7 मई 2015
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किसी वक़्त में फ़िल्मों की कमान सँभालने वाले निर्देशक कैमरे के आगे की चका चौंध से दूर नज़र आते थे. लेकिन बदलते दौर में कई निर्देशकों ने अपना हुनर ना सिर्फ कैमरे के पीछे बल्कि कैमरा के सामने भी दिखाया है.

बॉलीवुड में यह कहावत भी है कि अक्सर हीरो का किरदार तभी उभरता है जब विलेन दमदार हो. ऐसे में कुछ जाने माने निर्देशक ऐसे भी हैं जिन्होनें अपने हीरो को दमदार बनाने के लिए ख़ुद विलेन बनना स्वीकार किया.

करण जौहर

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रणबीर कपूर की आने वाली फ़िल्म 'बॉम्बे वेलवेट' वैसे तो रणबीर कपूर को लेकर चर्चा में है .लेकिन इस फ़िल्म में विलेन के किरदार में पहली बार नज़र आ रहे करण जौहर भी दर्शकों के लिए एक आकर्षक पहूल है.

करण पर्दे पर पहली बार 1995 में फ़िल्म 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' में एक छोटे से किरदार में नज़र आए थे लेकिन 'बॉम्बे वेलवेट' में वो एक मुख़्य किरदार निभा रहे हैं.

हैरानी की बात ये है कि 'बॉम्बे वेलवेट' अनुराग कश्यप की फ़िल्म है और किसी ज़माने में करण और अनुराग की बिल्कुल नहीं बनती थी.

बदलते वक़्त के साथ अब दोनों बहुत अच्छे दोस्त बन गए हैं. इस रोल को निभाने के बारे में करण कहते हैं, "अनुराग पागल हो गया था इसलिए उसने मुझे फ़िल्म में लिया लेकिन मैं इतना पागल नहीं हूँ की कभी अनुराग कश्यप को फ़िल्म में लूँगा."

करण आगे कहते हैं, "हालांकि मेरा किरदार गब्बर या मोगैम्बो जैसा नहीं है पर ऐसा किरदार निभाना जो पहले नसीर साहब को गया हो, मुझे एक सम्मान और जिम्मेदारी लगी."

तिग्मांशु धूलिया

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एक और निर्देशक जिनका पर्दे पर डेब्यू विलेन के तौर पर हुआ वो हैं तिग्मांशु धूलिया और इस बार भी एक निर्देशक को विलेन बनाने का श्रेय जाता है अनुराग कश्यप को.

फ़िल्म 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' में रमाधीर सिंह जैसे शांत और गंभीर विलेन का किरदार निभाने वाले तिंग्मांशु पहले इस किरदार के लिए तैयार नहीं थे लेकिन अनुराग ने ज़िद कर उन्हें अपनी फ़िल्म में विलेन बनने के लिए मना लिया.

अनुराग और तिग्मांशु अच्छे दोस्त हैं. तिग्मांशु ने गैंग्स ऑफ़ वासेपुर कि एक प्रेस कांफ़्रेंस में यह बात मीडिया को बताई थी कि वो अनुराग के लिए विलेन इसी शर्त पर बने हैं कि अनुराग उनके लिए उनकी फ़िल्म में विलेन बनेंगे.

इस फ़िल्म में किरदार रमाधीर सिंह का डॉयलॉग, "तुमसे न हो पाएगा !!" बेहद लोकप्रिय हुआ था.

अनुराग कश्यप

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दो निर्देशकों को अपनी फ़िल्मों के लिए कैमरा के आगे विलेन बनाने वाले अनुराग कश्यप खुद भी कैमरा के सामने विलेन बन चुके हैं और इसलिए ये प्रयोग उनके लिए नया नहीं है.

साल 2011 में आई निर्देशक तिग्मांशु धूलिया कि फ़िल्म 'शागिर्द' में अनुराग ने नाना पाटेकर के ओपोज़िट विलेन का किरदार निभाया था.

इससे पहले भी साल 2010 में अनुराग कश्यप ने संवेंदनशील विषयों पर फ़िल्मे बनाने वाले निर्देशक ओनिर की बहुत बड़ी मुश्किल हल कर दी जब उनकी फ़िल्म "आई एम" में एक बाल शोषक के किरदार के लिए अनुराग मान गए थे.

अनुराग बताते हैं, "बाल शोषण करने वाला ये किरदार इतना स्ट्रांग था कि कोई 'अभिनेता' इसे करने के लिए तैयार नहीं था. अब वो करना नहीं चाहते थे तो मैंने कर लिया."

सुधीर मिश्रा

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जाने माने निर्देशक सुधीर मिश्रा वैसे तो थिएटर में अभिनय कर चुके हैं लेकिन साल 1985 में आई फ़िल्म ख़ामोश के बाद वो सीधा 2007 में फ़िल्म ट्रैफ़िक सिग्नल में विलेन के रोल में नज़र आए.

"हज़ारो ख्वाहिशें ऐसी", "ये साली ज़िन्दगी" जैसी फ़िल्मे बनाने वाले निर्देशक सुधीर मिश्रा को मधुर भंडारकर की ट्रैफिक सिग्नल के बाद कई नकारात्मक भूमिका निभाने के ऑफ़र मिले थे. लेकिन उन्होनें निर्देशन पर ध्यान देने की बात कर इन भूमिकाओं को निभाने से इंकार कर दिया था.

अमोल गुप्ते

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निर्देशक से निकल कर सबसे कामयाब विलेन बनने वालों में सबसे बड़ा नाम है अमोल गुप्ते. हवा हवाई और स्टेनली का डिब्बा जैसी फ़िल्में बना चुके अमोल कमाल के विलेन बन कर सामने आए हैं.

साल 2009 में विशाल भारद्वाज की फ़िल्म 'कमीने' में विलेन के किरदार में अमोल ने इतनी अच्छी एक्टिंग की, कि उन्हें फिर साल 2010 में फ़िल्म 'फंस गए रे ओबामा' में भी एक विलेन का किरदार मिला.

अमोल का विलेन के तौर पर सबसे लोकप्रिय रोल था सिंघम रिटर्न्स में बाब जी का किरदार. अमोल के किरदार का डॉयलॉग, "अपने मस्तक पे दस्तक दे सिंघम, तेरी कुंडली मेरे हाथ में है." बहुत लोकप्रिय हुआ था.

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