जिनकी आंखें नहीं, वो भी देख सकेंगे 'पीके'

  • 11 मई 2015
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"एक चोर ने नंगे आदमी को देखा और नंगा आदमी उस चोर के पीछे भागा. चोर आगे आगे, नंगा आदमी पीछे पीछे और अचानक चोर चलती मालगाड़ी में उछल कर चढ़ गया और उसका ट्रांज़िस्टर नंगे आदमी के पास रह गया और उस नंगे आदमी ने उस ट्रांज़िस्टर को पहन लिया."

हम आपको कोई कहानी नहीं सुना रहे है, ये है ऑडियो नरेशन आमिर ख़ान की हिट फ़िल्म 'पीके' का. इसे ख़ासतौर पर नेत्रहीनों के लिए तैयार किया गया है.

नेत्रहीन भी फ़िल्म का लुत्फ़ ले सकें इसके लिए कई फ़िल्मकार अपनी फ़िल्मों के दृश्यों का ऑडियो नरेशन तैयार करवाते हैं, बाक़ी फ़िल्म के मूल संवाद जस के तस रहते हैं.

'पीके' फ़िल्म का नरेशन करने वाले नरेन जोशी ने बीबीसी हिन्दी को बताया, "एंटरटेनमेंट सबको चाहिए तो भला नेत्रहीनों को क्यों नहीं? इस तरह की फ़िल्मों में हम दृश्यों का ऑडियो डिस्क्रिप्शन तैयार करते हैं ताकि जो पर्दे पर चल रहे सीन को देख नहीं सकते वो भी इसका मज़ा ले सकें."

पहला अनुभव

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नेत्रहीन लोगों के साथ कई बरसों से काम कर रहीं रमी सेठ ने बताया, "इन बच्चों को लेकर हॉल में पहली बार फ़िल्म देखने गई तो काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा क्योंकि हर सीन को बता पाना आसान नहीं था."

रमी को अपने इस अनुभव के बाद एक आइडिया आया. रमी ने बॉलीवुड के कुछ प्रोड्यूसरों से इस बारे में बात की. उसके बाद उन्होंने ख़ुद ही इन फ़िल्मों का ऑडियो डिस्क्रिप्शन देना शुरू किया.

'सक्षम' संस्था के सहयोग से रमी ने पहली बार हिंदी फ़िल्म 'ब्लैक' का ऑडियो डिस्क्रिप्शन तैयार किया.

एक फ़िल्म का ऑडियो डिस्क्रिप्शन तैयार करने में 80 हज़ार से एक लाख रुपए तक का ख़र्च आता है.

माई नेम इज़ ख़ान

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फ़िल्म 'माई नेम इज़ ख़ान' जब लंदन में रिलीज़ हुई तब वहां उसका ऑडियो डिस्क्रिप्शन किया गया था, लेकिन जब वही फ़िल्म भारत में रिलीज हुई तो वो नेत्रहीनों के लिए नहीं थी.

अनिल देख नहीं सकते, लेकिन फ़िल्म 'वांटेड' का वो सीन उनका फ़ेवरेट है जिसमें सलमान ख़ान की शर्ट अपने आप फट जाती है.

रमी बताती हैं कि 'ब्लैक' के बाद कई फ़िल्में ऑडियो डिस्क्रप्शन के साथ आने लगीं. वो बताती हैं कि 'बर्फी' फ़िल्म का ऑडियो डिस्क्रिप्शन काफ़ी पसंद किया गया था.

आमिर ख़ान की फ़िल्में

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बॉलीवुड में आमिर ख़ान उन अभिनेताओं में से है जो अक्सर अपनी फ़िल्मों का ऑडियो डिस्क्रिप्शन भी करवाते हैं.

दृश्यों को शब्दों में बयाँ कर पाना थोड़ा जटिल काम है. फ़िल्म में विवरण देने के लिए पहले से स्क्रिप्ट तैयार करनी पड़ती है.

नरेन जोशी कहते हैं, "ये एक चुनौती है क्योंकि थोड़े से समय में पूरे सीन का विवरण बता देना बहुत कठिन होता है."

बहरहाल, नेत्रहीनों को उम्मीद है कि बॉलीवुड इस कठिनाई को पारकर आने वालों दिनों में अधिक से अधिक फ़िल्मों को उनके लिए उपलब्ध करवाएगा.

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