'कमाई का ज़रिया' बन गए हैं नूरूल्लाह

  • 9 मई 2015
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हिट एंड रन मामले में सलमान को मिली सज़ा को लेकर जितनी बहस हुई, उतनी ही इस घटना में मरने वाले नूरूल्लाह शेख़ शरीफ़ को मिलने वाले मुआवज़े पर भी हुई.

दलीप ताहिल, एजाज़ ख़ान और सलमान के जानकार और भी लोगों ने कहा कि सलमान ने पीड़ित परिवारों के लिए बहुत कुछ किया है लेकिन पीड़ितों की ओर से मिली जुली प्रतिक्रिया मिल रही थी.

घटना में घायल अब्दुल्लाह ने एक इंटरव्यू में कहा कि उन्हें सलमान की ओर से आर्थिक मदद मिली है वहीं मरने वाले नूरूल्लाह शेख़ शरीफ़ के परिजन किसी भी मदद के मिलने से इनकार कर रहे हैं.

लेकिन मृतक नूरूल्लाह की मौत के बाद मुआवज़े के अलावा भी बहुत सी चीज़ें हैं जो उन्हें लोगों के लिए फ़ायदेमंद बना रही हैं.

घर दिखाने का पैसा

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नूरूल्लाह के मोहल्ले में सलमान के केस में फ़ैसला आने से दो दिन पहले ही मीडिया ने आना शुरू कर दिया था. लेकिन मुंबई के मलाड इलाके में स्थित मालवानी झुग्गियों में नूरूल्लाह की झुग्गी ढूंढना टेढ़ी ख़ीर था.

ऐसे में इलाके के कुछ लोग मीडिया को नूरूल्लाह की झुग्गी तक लेकर जा रहे हैं और बदले में 100 से 200 रूपए तक ले रहे हैं.

इलाके के ही वसीम बताते हैं, "नूरूल्लाह भाई के यहां आपको मेैं ले चल सकता हूं लेकिन देखिए इससे हमें क्या फ़ायदा होगा. अब अपना काम छोड़ कर कौन जाए ?"

वसीम ने बताया कि ऐसे मौक़ावार गाइड मीडिया के आने के बाद से काफ़ी बन गए हैं.

इंटरव्यू का पैसा

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बेग़म जां जो मृतक की पत्नी थी उनके नए पति किसी को बेग़म ज़ां के टीवी पर आने के बाद से मिलने नहीं दे रहे.

बेग़म के बेटे फ़िरोज़ ने बताया, "मेरे सौतेले पिता ने उसको (मां) घर में बंद कर दिया है ताकि वो किसी चैनल को इंटरव्यू न दे पाए और अगर दे भी तो पहले कुछ सौदा हो."

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फ़िरोज़ ने कैमरा बंद होने के बाद पैसे की तंगी का हवाला दिया और फिर मां से मुआवज़े को लेकर हो रही लड़ाई का भी ज़िक्र किया.

बेकरी की कमाई

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नूरूल्लाह बांद्रा में जिस बेकरी के बाहर सोए थे उस बेकरी की कमाई भी इस हादसे के बाद काफ़ी बढ़ गई है.

बांद्रा की 'ए वन' बेकरी के स्टाफ़ चिट्टी बाबू ने बताया, "हादसे के बाद से हमारी कमाई काफ़ी बढ़ गई है. लोग मुंबई के बाहर से आते हैं, फ़ोटो खींचते हैं और शेख़ भाई के बारे में पूछते हैं."

लेकिन नूरूल्लाह उस दिन बेकरी के बाहर क्यों सोए इस पर चिट्टी ने बताया, "किसी ने पूछा नहीं कभी, अभी आप ने पूछा."

वो कहते हैं, "शेख़ भाई का अपनी बेग़म से बनता नहीं था इसलिए हफ़्ते में तीन दिन इधर ही सो जाते थे, सुबह बेकरी भी वही खोलते."

मृतक के बेटे फ़िरोज़ ने भी कहा, "अब्बा घर इसलिए नहीं आते थे क्योंकि यहां हर रोज़ अम्मी से पैसों और दूसरी चीज़ों को लेकर झगड़ा होता था. वो वहीं शांति महसूस करते थे."

अब नूरूल्लाह तो इस दुनिया में नहीं है लेकिन मरने के बाद भी घर वालों के लिए मुआवज़ा और बेकरी के लिए अपना ज़िक्र पीछे छोड़ गए हैं.

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