फ़िल्म रिव्यूः बॉम्बे वेलवेट

  • 15 मई 2015
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'कर्स ऑफ़ द मास्टरपीस' या 'महान कार्य कांप्लेक्स' से ग्रसित और बढ़ा-चढ़ाकर लिखी और बनाई गई यह फ़िल्म एक साथ इतने चक्करों में घूमती है कि आपका दिमाग़ ये सोचकर चकराने लगता है कि इस सबका मतलब ही क्या है.

संयोग से इस पीरियड फ़िल्म की पृष्ठभूमि में 1969 के बंबई के दक्षिणी तट पर बढ़ रहा व्यापारिक केंद्र नरीमन प्वाइंट है.

लालची पूंजीपतियों की नज़र ज़मीन पर है. इनके हाथ ख़ून से रंगे हैं. मुझे लगा कि ये कहानी आख़िर तक इन ख़ून के निशानों का ही पीछा करेगी. लेकिन नहीं...

देखा जाए तो ये रणबीर कपूर से सजी एक बड़ी फ़िल्म है जो ब्रोमांस, एक आदर्शवादी रोमांस, एक व्यक्तिगत गाथा है, एक म्यूज़िकल,इतिहास का हिस्सा, षडयंत्र की कहानी और समाज पर टिप्पणी है, एक तरह से फ़िल्मों को एक फ़ैनबॉय की श्रद्धांजलि है. तो इसमें ग़लत क्या है?

रणबीर लगे अल पचीनो

जॉनी बलराज बने रणबीर कपूर एक केज फ़ाइटर हैं. मैं बंबई में ऐसी किसी भूमिगत केज फ़ाइट में नहीं गया हूँ जहाँ पैसों के लिए लोग एक दूसरे का ख़ून बहाते हैं और जहाँ लड़ने का कोई नियम न हो. हालांकि हम फ़िल्मों में ऐसा ज़रूर देखते रहे हैं. सनी देओल की 'घायल' याद आती है.

इस फ़िल्म का जॉनी 1983 में फ़िल्म स्कारफ़ेस के अल पचीनो सा दिखता है. उसमें 1980 की रेजिंग बुल के रॉबर्ट डी नीरो से भी समानताएं हैं.

जॉनी को शहर के टॉप जैज़ क्लब में एक सम्मानजनक नौकरी मिल जाती है. हालांकि आगे के कुछ दृश्यों में भी वे केज फ़ाइट करते दिखते हैं.

जॉनी जिस क्लब को मैनेज करता है उसका नाम ही बॉम्बे वेलवेट है. वो वहाँ की लीड सिंगर (अनुष्का शर्मा) का दीवाना है. एक पारसी पूंजीवादी डॉन कैज़ाद खंबाटा बॉम्बे वेलवेट का मालिक है. जॉनी उसका सबसे वफ़ादार नौकर है. करण जौहर उस गुंडे बॉस की भूमिका में हैं.

आप भले उन्हें पसंद करते हों या ना करते हों लेकिन करण जौहर की गपशप करने वाले मिलनसार टीवी होस्ट की छवि उन पर हावी हो जाती है. उन्हें इस फ़िल्म में एक क़ातिल, साज़िशें रचने वाले चालाक समलैंगिक डॉन की भूमिका में गंभीरता से लेना मुश्किल है. लेकिन इस फ़िल्म को देखते वक़्त आपके होने वाली परेशानियों में ये सबसे मामूली है.

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उलझी कहानी

मुद्दा यह है कि इस कहानी के इतने प्लॉट और सब-प्लॉट हैं कि हम कहानी में असल प्लॉट को तो भूल ही जाते हैं. फ़िल्म में आप बहुत कुछ देखते हैं लेकिन महसूस कुछ नहीं करते. इक्का-दुक्का सीन को छोड़ दें तो कुछ भी ऐसा नहीं है जो आपको कुर्सी से उछाल दे.

इसी बीच हम सांस रोके एक ग़ैर ज़रूरी क़त्ल, फिर उसकी जाँच और बीच में आए जैज़ नंबर में उलझे रहते हैं.

कोई भी कहानी आपकी रूचि पैदा नहीं कर पाती. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि भीड़ वाला ये 'कार्डबोर्ड ओपेरा' अच्छा नहीं लगता. निश्चित रूप से कुछ चीज़ें अच्छी लगती हैं.

लाइटिंग ज़बरदस्त है. कैमरा भी. सैट्स भी शानदार हैं. अभिनय भी पहले दर्जे का है. यानी कि तेवरों में कमी नहीं है.

फ़िल्मकार 1949 और 1969 के ‘प्रतिबंध युग’ से भलीभांति परिचित हैं. ज्ञान प्रकाश की ‘मुंबई फ़ेबल्स’ इस दौर की दास्तान कहती एक ज़रूर पढ़ने लायक किताब है. पेशे से इतिहासकार ज्ञान भी इस फ़िल्म की उस स्क्रिप्ट के लेखकों में से एक हैं जो ‘दिखाओ, बताओ मत’ के पुराने लेखन नियम को पूरी तरह ग़लत इस्तेमाल करते हुए उसे ‘दिखावा करो, बताओ मत’ बना देती है..

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क्यों देखें या ना देखें?

यदि आप इस फ़िल्म के विशाल बजट को नज़रअंदाज़ कर दें तो यह निर्देशक अनुराग कश्यप के सबसे महत्वाकांक्षी कामों की गिनती तक में नहीं आती.

जैसे कि कई पीढ़ियों की गाथा कहती गैंग्स ऑफ़ वासेपुर (2012) अपने विस्तार और पैमाने में महत्वाकांक्षी थी. एक मज़बूत बैकग्राउंड नैरेशन ने उस तीन सौ बीस मिनट की फ़िल्म को ख़ूबसूरती से बांधा था. इस फ़िल्म में ऐसा कुछ नहीं है. शायद इस बार नतीजा गड़बड़ है.

ये मुझे सौ करोड़ के सवाल पर ले आता है. क्या आपको ये फ़िल्म देखनी चाहिए? अगर आपको देखनी ही है तो ज़रूर देखिए. लेकिन इस फ़िल्म को समझने के लिए आपको इसे कम से कम दो बार देखना होगा. ऐसा होगा तो निर्माताओं को तो अच्छा ही लगेगा ना.

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