एक फिल्म के 11 निर्देशक

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क्रिकेट में फ़ील्ड पर होते हैं 11 खिलाड़ी. अब कुछ ऐसे ही 11 दिमाग़ लगे, पिच पर नहीं, बल्कि एक पिक्चर पर तो क्या होगा?

इसे हकीक़त में बदला है कुछ लोगों ने मिलकर.

फ़िल्म का नाम है ‘एक्स’(X), जिसकी है एक कहानी और 11 निर्देशक हैं.

भारत में पहले भी फ़िल्में आईं हैं जिसमें कई निर्देशक रहे.

1993 की 'बाज़ीगर', 2008 की 'रेस' जिनका निर्देशन किया दो भाईयों, अब्बास मस्तान ने.

फिर आई फ़िल्में ‘दस कहानियाँ’ और ‘बॉम्बे टॉकीज़’, पर इनमें हर कहानी अलग थी और हर अलग कहानी का निर्देशक भी अलग था.

‘एक्स’ कहानियों का संकलन नहीं

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11 में से एक निर्देशक दिल्ली के हेमंत गाबा, जिन्होंने इससे पहले ‘शटलकोक बायज़’ नामक फ़िल्म बनाई थी, बताते हैं, "हर एक निरेशक को अलग ही शैली, अंग, रचना-पद्धति मिली है. ये कहानी एक ही पात्र, एक ही क़िरदार की है. इस क़िरदार को निभाया है रजत कपूर ने."

वो बताते हैं, "उसके फ्लैश बैक यानी यादें दिखाई गई हैं, उसके जीवन के अलग अलग पड़ाव, चरण और अवस्था की कहानी है. एक एक चरण या याद एक निर्देशक की ज़िम्मेदारी है."

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इस प्रयोगात्मक फ़िल्म में अलग अलग राज्यों से निर्देशक आए हैं, जैसे दिल्ली, महाराष्ट्र, बंगाल, असाम और तमिलनाडु.

इस फ़िल्म का निर्देशन किया है हेमंत गाबा ने, कोलकाता के ‘क्यू’ (कौशिक मुखेर्जी) ने, अभिनव शिव तिवारी, अनु मेनन, नलन कुमारसामी, प्रतिम गुप्ता, राजा सेन, राजश्री ओझा जिन्होंने इससे पहले बनाई थी 'आईशा', संदीप मोहन, सुधीश कामत और सुपर्ण वर्मा ने.

पहली तमिल फ़िल्म

इस फ़िल्म में स्वरा भास्कर, हुमा क़ुरैशी, राधिका आप्टे और रजत कपूर हैं.

क्योंकि निर्देशक अलग अलग भाषा में फ़िल्म बनाते हैं तो ‘एक्स’ फ़िल्म में भी हिन्दी, तमिल, बंगाली और अँग्रेज़ी का इस्तेमाल हुआ.

स्वरा बताती हैं, “ये एक बड़ी दिलचस्ब फ़िल्म है. मेरी कहानी सबसे आख़िर में आती है. कहानी का निर्देशन किया तमिल फ़िल्मों के निर्देशक- नलन कुमारसामी ने."

स्वरा कहती हैं, “ये मेरी पहली तमिल फ़िल्म है. मेरे पास ये आइडिया लेकर आए थे सुधीश कामत, जिनके दिमाग़ की यह उपज थी कि एक फ़िल्म 11 दिमाग़ मिलकर बनाएं. सुधीश कामत ने एक हिस्से का निर्देशन किया है."

11 निर्देशक ने बनाई खिचड़ी ?

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इस फ़िल्म के दूसरे निर्देशक कोलकाता के क्यू.

वो बताते हैं कि क्योंकि 11 लोगों ने काम किया तो अलग अलग नज़रिए सामने आए.

वो कहते हैं, "जब इतने लोग काम करेंगे तो अहंकार, अलग नज़रिए, अलग सोच, प्रस्तुति का अलग ढंग, ये सारे मुद्दे सामने आते हैं. बल्कि सबकी अलग सोच सामने आती है, यही फ़िल्म की ख़ासियत है."

वो बताते हैं, "आख़िर एक इंसान भी अलग अलग स्थिति में अलग सोच रखता है. कहानी का जो मुख्य क़िरदार है वो भी अलग है. ज़िन्दगी भी ऐसी ही है- विकृत और असंबद्ध. जहाँ तक रही अहंकार की बात वो तो सब जानते हैं कि फ़िल्म सबसे उपर, ये सारी बातें पीछे.”

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फिल्म के निर्देशक और सह निर्माता सुधीश कामत बताते हैं, "इस फिल्म का एक अंश दिखाया गया था 2014 के दक्षिण एशियाई अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव में. अब हम इससे शायद नवंबर में रिलीज़ करें."

हेमंत गाबा कहते हैं, “फ़िल्म की खिचड़ी नहीं बनी क्योंकि सबको पता था कि क्या करना है क्या नहीं.

2013 में सारे निर्देशक मिले और सबने एक साथ स्क्रिप्ट पर काम किया और उसके बाद सबने अपना अपना हिस्सा आपने आप अकेले शूट किया.”

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