कितने रंग में है फ़िल्म गुड्डू रंगीला?

  • 3 जुलाई 2015
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फ़िल्म: गुड्डू रंगीला

निर्देशक: सुभाष कपूर

कलाकार: अरशद वारसी, अमित साध, अदिति राव हैदरी

रेटिंग: *1/2

आप फ़िल्म में जैसी ही ये लाइन सुनेंगे इसे पहचान जाएँगे- लोहा गरम है, मार दो हथौड़ा. आप तुरंत बता देेंगे कि ये किस फ़िल्म से है. इस फ़िल्म के आने के चार दशक बाद आज भी बॉलीवुड में बहुत से लोगों को लगता है कि उन्होंने नई शोले बना दी...जब तक कि उनकी फ़िल्म रिलीज़ न हो जाए.

गुड्डू रंगीला बनाने वाले भी इससे अलग नहीं है.

इस 'शोले' में रॉनित रॉय गब्बर के रोल में हैं और वे इस रोल को उसी अंदाज़ में निभाते हैं जिसे केवल वही कर सकते हैं- हर वक़्त मुरझाया हुआ सा चेहरा.

ये एक लोकल गुंडा है और उन लोगों पर हुक़्म चलाता है जो अपनी जाति के बाहर प्यार करते हैं. फ़िल्में में उन्हें इज़्ज़त की नाम पर हत्याओं के खिलाफ़ एक प्रॉप की तरह इस्तेमाल किया गया है.

हाल की कई फ़िल्मों में ये दिखाया गया है जैसे नवदीव सिंह की एनएच10 और आनंद राय की तनु वेड्स मनु रिटर्न्स. हालांकि ये सब उतनी प्रभावी नहीं हुई जितनी दिबाकर बनर्जी की लव सेक्स और धोखा हुई थी.

सेक्स और हिंसा

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ख़ैर फ़िल्म की बात करें तो गब्बर या बिल्लू पहलवान दरअसल पाखंडी व्यक्ति है. उसे अंतरजातीय प्यार संबंधों से चिढ़ है लेकिन ख़ुद वो ऐसे यौन संबंध बनाता है जिसमें प्यार की कोई जगह नहीं. ये बात एक सीडी में भी क़ैद है.

अगर ये सेक्स टेप बाहर आ जाती है तो उसका राजनीतिक करियर खत्म हो जाएगा. उसके चुनावी क्षेत्र के लोगों को कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वो एक ख़ूनी है.

शायद हिंसा करना सही है, पर सेक्स नहीं. इस देश का सेंसर बोर्ड भी यही सोचता है.

भोजपुरी संगीत सुनने वालों ने गु्ड्डू रंगीला का नाम सुना होगा. वे मशहूर गायक हैं जो अश्लील गानों के लिए जाने जाते हैं.

इस फ़िल्म में गुड्डू (अमित साध) और रंगीला (अरशद वारसी) दो अलग अलग हरियाणवीं लड़के हैं. जय और वीरू की तरह वो भी एक तरह से किराए पर लिए जाने वाले अपराधी हैं लेकिन उनका अपना ज़मीर भी है.

बेरंग अभिनय

एक ‘हॉट’ महिला इन लोगों को फुसलाकर बिल्लू पहलवान से पंगा लेने के लिए मना लेती है. ये रोल अदिति राव हैदरी ने बेमन से किया है.

गुड्डू उनसे यही सवाल पूछता है- देगी? और कुछ सीन बाद- लेगी? आप समझ गए होंगे कि मैं क्या कह रहा हूँ.

इस सब के बाद क्या आपको हीरो-हीरोइन के बीच की केमिस्ट्री से कोई फ़र्क पड़ेगा..यहाँ तो बेरंग गुड्डू और बोरिंग रंगीला के बीच ही कोई केमिस्ट्री नहीं है.

सैकेंड रेट

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ये विशाल भारद्वाज टाइप फ़िल्म का सेकेंड रेट संस्करण है. ये ज़्यादा खलती इसलिए भी है क्योंकि प्रोमो से ऐसा लगा था कि ये गुदगुदाने वाली देसी कॉयबॉय कॉमेडी होगी.

ये ट्रैजिक है क्योंकि आप जानते हैं कि अरशद कितने काबिल हैं जब वे इश्कियां और डेढ़ इश्कियां जैसी ऐसी ही फ़िल्में करते हैं. आप ये भी जानते हैं कि निर्देशक सुभाष कपूर इससे पहले फँस गए रे ओबामा और जॉली एलएलबी जैसी फ़िल्में बना चुके हैं.

इसे बनाने वाला स्टूडियो स्टार फॉक्स ने पिछले कुछ समय में बॉम्बे वेलवेट और बैंग बैंग दी हैं. फ़िल्म देखकर आपको सबके लिए बुरा लगता है और उनके प्रति थोड़ा नरम रुख अपनाने को मन करता है.

लेकिन यहाँ फिर शोले की याद आती है, घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो खाएगा क्या?

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