बाहुबली: भव्य, सम्मोहक, लगभग जादुई …

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फ़िल्म: बाहुबली - दि बिगनिंग

निर्देशक: एसएस राजमौली

कलाकार: प्रभाष, तमन्ना भाटिया

रेटिंग: ****

स्पष्ट कहूँ, तो मेरे जेहन में ऐसी कोई भारतीय फ़िल्म नहीं आ रही है जो इस क़दर आलीशान, सम्मोहित करने वाली और एक तरह का जादू सा करने वाली हो. बड़ी पर्दे पर दर्शकों को इसके दृष्य स्तब्ध से कर देते हैं. सच कहूँ, आप पर्दे से अपनी आंखे नहीं हटा सकते.

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फ़िल्म निर्माता को फ़िल्म में इफेक्ट डालने के लिए 3डी शीशे लगाने की आवश्यकता नहीं है. कई बार आपका मन सीटी मारने या ताली बजाने का करेगा, जब हीरो बीच हवा में अपने तीर-कमान से दुश्मन पर हमला करता है, तब जब ग्लेशियर पर नहीं फिसलता या ऊंचे झरने से नीचे नहीं गिरता, बड़ी चट्टान से टकराता है और नीचे बड़ी झील में गिर जाता है.

मैं इसके बारे में और बातें कर बड़े पर्दे पर फ़िल्म देखने का आपका मज़ा किरकिरा नहीं करना चाहता. कभी-कभी कोई इस तरह की बातें सुनकर असहज सा हो सकता है, इसलिए मैं इस चर्चा को यहीं विराम देता हूँ.

सबसे महँगी फ़िल्म

मैंने सुना है कि ये फ़िल्म 250 करोड़ रुपए में बनकर तैयार हुई है और भारत की अब तक की सबसे महंगी फ़िल्म है. लेकिन ये कोई बड़ी बात नहीं है. मुझे अक्सर कहा जाता है कि फ़िल्म का 70 प्रतिशत बजट तो कलाकारों की फ़ीस चुकाने में ही चला जाता है.

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(बड़े स्टारों के मामले में फ़िल्म के बजट का आधा हिस्सा तो वास्तव में कलाकारों की जेब में ही चला जाता है.) लेकिन यहां, लगता है पैसा फ़िल्म पर ख़र्च किया गया है. और, कंप्यूटर से बनाई गई कई तस्वीरें तो लाजवाब हैं.

तमन्ना भाटिया, राणा डग्गुबाटी, अनुष्का भाटिया और प्रभाष ने फ़िल्म में जान डाल दी है और ये फ़िल्म किसी बड़े स्टार की फ़िल्म देखने के लिए रखे गए पैसों की टिकट की हक़दार है.

प्रभाष ने सिवुडु का किरदार निभाया है, जिसमें हम उन्हें एक नवजात के रूप में देखते हैं. एक महिला पानी में डूब रहे इस शिशु को बचाती है. उन्हें राज्य से बाहर निकाल दिया जाता है. बच्चा एक छोटे गांव में बड़ा होता है और एक ताक़तवर पुरुष के रूप में उभरता है.

बड़ा स्क्रीनप्ले

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जिस राज्य से वह पहले संबंध रखता था, आख़िरकार वह उसे अपना लेता है. जल्द ही लोग उसे पहचान भी लेते हैं. यहीं सिवुडु को प्यार भी मिलता है और अपने जीवन की कहानी भी. वह बाहुबली है, जिसके नाम पर फ़िल्म भी बनी है.

पटकथा लेखकों ने स्क्रीनप्ले की संरचना में काफ़ी फेर बदल किया है. यहाँ तक कि बाहुबली की पृष्ठभूमि भी टुकड़ों मे दिखाई गई है और वह भी फ़िल्म के बाद के हिस्से में. शायद यही वजह है कि पहले हाफ़ में फ़िल्म के काफ़ी हिस्से आप ठीक तरह से समझ नहीं पाते.

वे जिन्हें इस फ़िल्म का प्रोमो पसंद आया था उन्होंने तुरंत ही इसे ज़ैक स्नाइडर की 300 से जोड़ लिया. अमरीकी फेंटेसी सिरीज़ ‘गेम्स ऑफ थ्रोन्स’ के प्रशंसकों ने मुझे बताया कि आप इस टेलीविज़न सिरीज़ की कई बातें इस फ़िल्म में भी देख सकते हैं. मैं नहीं जानता.

विजुअल इफेक्ट्स

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फ़िल्म एक टीवी शो के एपिसोड की तरह एक ‘हूक’ के साथ ख़त्म होती है. कहानी को इस मोड़ पर शायद सीक्वल के लिए ख़त्म किया गया है.

फ़िल्म का सीक्वल 2016 में रिलीज़ होगा. लेकिन इस तरह की गुस्ताख़ी तभी संभव है जब फ़िल्म निर्माता पूरी तरह से आश्वस्त हों कि दर्शक इस फ़िल्म को एक साल तक याद नहीं रख पाएंगे, कुछ और पाने की चाहत में वे अगली बार भी खिंचे चले आएंगे.

निर्देशक राजामौली आत्मविश्वास से भरे हुए होंगे. इसकी वजह भी है. फ़िल्म में उनके एक्शन और लड़ाई के दृश्य देखिए, आप प्रशंसा किए बिना नहीं रहेंगे कि यह विश्वस्तरीय प्रोडक्शन है, ट्रॉय या ग्लेडिएटर जैसा.

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मैं हैरान नहीं हूं कि बॉलीवुड के मुक़ाबले दक्षिण के निर्देशकों ने इस असामान्य से महत्वाकांक्षी सपने को देखा.

गंभीरता से कहूँ तो, इस फ़िल्म से पहले मैं नहीं जानता था कि भारतीय टेक्नीशियन इस तरह के विजुअल इफेक्ट्स देने में सक्षम हैं और वो बहुत कम पैसे में.

बाहुबली को तमिल और तेलुगू में साथ-साथ बनाया गया है. हिंदी और मलयालम में इसके डब किया गया है. जैसा कि शीर्षक बताता है, यह वास्तव में एक शुरुआत है. कहने की ज़रूरत नहीं, किसी को भी शुरुआत नहीं छोड़नी चाहिए. मैं इसके सीक्वल का भी इंतज़ार कर रहा हूँ.

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