बजरंगी के रोल में पसंद आएंगे सलमान?

  • 17 जुलाई 2015
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फ़िल्म: बजरंगी भाईजान

निर्देशक: कबीर ख़ान

कलाकार: सलमान ख़ान, करीना कपूर, नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी

रेटिंग: ***

ये सीमापार के प्यार पर क्रॉसओवर फ़िल्म है.

उस तरह की क्रॉसओवर नहीं जैसा पिछले एक दशक में एक ख़ास किस्म के ‘मल्टीप्लेक्स’ सिनेमा को कहा गया.

ये अब तक ठीकठाक तौर पर मान लिया गया है कि जब मेनस्ट्रीम बॉलीवुड की बात आती है तो न कोई मल्टीप्लेक्स और न कोई सिंगल स्क्रीन सिनेमा है.

बल्कि सलमान ख़ान ने इस मिथक को तोड़ दिया था 'दबंग' और 'एक था टाइगर से'. 'एक था टाइगर' के निर्देशक थे कबीर ख़ान जिन्होंने बजरंगी भाईजान भी निर्देशित की है.

बहुत मेलोड्रामा है, बहुत कुछ बातें हैं जिन पर यकीन करना पड़ता है, बहुत गाने हैं जो किसी गंभीर कहानी को सूट नहीं करते. लेकिन इसके बावजूद फ़िल्म में चतुराई से सजावट की गई है, कुछ मानवीय स्पर्श है, एक नज़रिया है, एक आवाज़ है.

इंसान की तरह

सलमान इस फ़िल्म में एक इंसान की तरह नज़र आते हैं न कि 'सल-मैन' की तरह जो सुपरमैन और दूसरे सुपरहीरो जैसा दिखता है. इसी बात से ये तय हो जाता है कि फ़िल्म उन लोगों को भी पसंद आएगी जो सलमान ख़ान के अंध-भक्त नहीं हैं.

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ये जोखिम भी हो सकता है और वरदान भी. ये जुआ है. सलमान असल ज़िंदगी में आधे मुसलमान, आधे हिंदू हैं और उनकी सौतेली मां ईसाई हैं. वो ख़ुद एक तरह का छोटा-मोटा धर्म बन चुके हैं.

इस फ़िल्म में उनका किरदार उस तरह के मीठे-मीठे रोल से ज़्यादा मेल खाता है जैसे वो अपने करियर की शुरुआत में करते थे, न कि उस ‘भाई’ जैसे जो उन्होंने गर्व, तेरे नाम, वांटेड और रेडी में किए.

पवन चतुर्वेदी (सलमान) एक शांतिप्रिय इंसान हैं, उसे मांस से नफ़रत है, वो ब्राह्मण है और हनुमान जी का परम भक्त है.

वो एक कामयाब 'संघी' का बेटा है, हालांकि वो राजनीतिक और महत्वाकांक्षी नहीं दिखता. वो एक पारिवारिक दोस्त के साथ रहता है जिसकी बेटी (करीना) से वो शादी करना चाहता है.

न तो ये रोमांटिक फ़िल्म है और न ही पड़ोस का कोई गुंडा करीना को परेशान कर रहा है.

सलमान वाला मसाला नहीं

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ये फ़िल्म तो असल में सलमान पर केंद्रित भी नहीं है. ये उनके मिशन पर है. आप भले ही फ़िल्म हीरो को देखने जा रहे हों लेकिन फ़िल्म में नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी और छोटी सी बच्ची हर्षाली मल्होत्रा की मौजूदगी से भी दंग रह जाएंगे.

क्योंकि सलमान की कोई भी फिल्म उनके प्रशंसक के नज़रिए से देखी जानी चाहिए, इसलिए वो चीज़ें देख लीजिए जो फ़िल्म में होंगी. सलमान शर्ट उतारेंगे लेकिन टॉर्चर सीन के दौरान. वो कुछ हड्डियां ज़रूर तोड़ते हैं. जहां तक मैंने देखा, कोई डांस वाले गाने नहीं हैं. न ही एकतरफा प्यार को लेकर कोई भावुक गाना है.

तो क्या सलमान की सलमान के मसाले के बिना ये फ़िल्म ठीक है?

देखिए, पिछले हफ़्ते ही एसएस राजामौली की फ़िल्म ने सारे बॉक्स ऑफ़िस रिकॉर्ड तोड़े हैं और साबित किया है कि भारी भरकम बजट वाली पिक्चर बेचने के लिए सुपरस्टार की ज़रूरत भी नहीं है.

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कोई खलनायक नहीं

इन दोनों फ़िल्मों की तुलना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि इन दोनों की कहानी के. विजयेंद्र प्रसाद ने ही लिखी है. वो राजामौली के पिता हैं.

कहानी सीधी-सादी है. पवन चतुर्वेदी को एक लड़की मिलती है जो पाकिस्तानी है और बोल नहीं सकती.

वो इस लड़की को सरहद पार उसके माता-पिता से मिलाना अपना मकसद बना लेता है. नवाज़ का किरदार एक पाकिस्तानी रिपोर्टर पर आधारित हैं जिनका एक वीडियो वाइरल हो गया था. वो सलमान की मदद करते हैं.

ये गदर के ठीक उलट कहानी है. ये कहानी भी भारत और पाकिस्तान में है. सरहद पर कांटे बिछे हैं. सेना भी है और आम लोग भी. पूर्वाग्रह हैं लेकिन न तो कोई 'संघी' न मौलवी और न ही पाकिस्तानी पुलिस वाला इसमें खलनायक है.

फ़िल्म ज़्यादातर लोगों में छिपी अच्छाई के बारे में बात करती है.

हीरो को भारत और पाकिस्तान में बराबर प्यार किया जाता है और इसी तरह से मानवतावादी, बहुत भावुक फ़िल्म को भी किया जाएगा.

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