ट्रेन के भिखारी नहीं 'स्ट्रीट आर्टिस्ट' हैं

  • 21 जुलाई 2015
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मुंबई की लोकल ट्रेनों में घूमते और गाना गाते इन लोगों को देख कर आपको तब तक कोई हैरानी नहीं होगी जब तक आपको यह मालूम नहीं होगा कि ये कोई आम भिखारी नहीं बल्कि संगीत प्रशिक्षु हैं.

24 वर्षीया हेमलता महेंद्र तिवारी की पहल 'स्वराधार' नाम के म्यूज़िक बैंड के चलते इन 'ट्रेन सिंगर्स' को संगीत की शिक्षा और इज्जत मिली है.

मायानगरी की आपाधापी में अपने संगीत के ज़रिए अपनी पहचान बनाने वाले ये 'संगीत सम्राट' कुछ अलग हैं.

'स्वराधार'

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लोकल ट्रेन और प्लेटफ़ॉर्म पर गाना गाकर भीख़ मांगते इन गाने बजाने वालों के लिए 'स्वराधार' म्यूज़िक बैंड कि बुनियाद रखने वाली हेमलता को इसका विचार साल 2010 में आया.

हेमलता बताती हैं, "कॉलेज में एक बार मुझे महाराष्ट्र सरकार के एक संगीत कार्यक्रम में शरीक होने का मौका मिला. वहां जाते हुए मुझे अँधेरी स्टेशन पर भीड़ जमा दिखाई दी, जिसके बीच में दो लोग प्लेटफ़ॉर्म पर बैठे कमाल का तबला और हारमोनियम बजा रहे थे और उन्हें देख सुन कर ऐसा लगता था कि दोनों ही प्रोफ़ेशनल हों."

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वो आगे बताती हैं, "वहां मौजूद सभी लोग उनकी जमकर तारीफ़ कर रहे थे और कुछ लोग उनकी तरफ़ एक-दो रूपए भी फेंक रहे थे, मुझे जाना था सो मैं कार्यक्रम में चली गई."

संगीत कार्यक्रम में हेमलता ने देखा कि वहां भी आर्टिस्ट वही काम कर रहे थे जो प्लेटफ़ॉर्म पर बैठे हुए उन दो लोगों ने किया लेकिन यहाँ लोग पैसा नहीं फेंक रहे थे बल्कि जमकर तालियां बजा रहे थे.

हेमलता के अनुसार, "आप अगर स्टेज पर हो तो आप आर्टिस्ट हो लेकिन अगर आप यही काम प्लेटफ़ॉर्म पर करो तो आप भिख़ारी, बस इसी अंतर को ख़त्म करने की कोशिश में मैंने स्वराधार का निर्माण किया."

विशारद है हासिल

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स्वराधार बैंड से जुड़े सभी लोग संगीत की दुनिया में नए नहीं हैं बल्कि कुछ ऐसे लोग भी हैं जो संगीत में विशारद हैं.

हेमलता ने बताया, "सभी सदस्यों को संगीत का ज्ञान नहीं हैं लेकिन ज़्यादातर लोगों ने संगीत की शिक्षा प्राप्त की हैं और कई आर्टिस्ट को तो संगीत में विशारद भी हासिल है."

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स्वारधार बैंड में हिस्सा लेने के लिए हेमलता अपनी टीम के साथ ऐसे लोगों को ढूंढती हैं और फिर उनके काम को परखने, उनकी पूरी जाँच पड़ताल करने के बाद ही उन्हें इस बैंड का हिस्सा बनाती हैं.

इस बैंड के ज़रिए अब ट्रेन में गाना गाने वाले इन लोगों को थिएटर शो, स्टेज शो, गणपति पंडाल जैसी जगहों पर हज़ारों लोगो के बीच हर जगह परफॉर्म करने का मौका मिलता है और अच्छे पैसे भी मिल जाते हैं.

बड़ी सफ़लता

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इस बैंड से जुड़े दो लोगों, दीपेश और इरशाद को टीवी और फ़िल्मों से जुड़ने का मौका मिला.

14 साल के दीपेश ने इस साल 'जूनियर इंडियन आइडल' के ऑडिशन में हिस्सा लिया था, हालांकि वो सेलेक्ट नहीं हुए लेकिन दीपेश से प्रभावित संगीतकार विशाल ददलानी ने उन्हें अपनी कंपनी में काम और संगीत सिखाने का ऑफर दिया.

वहीं दूसरे आर्टिस्ट इरशाद को दो छोटी बजट की फ़िल्मों में बांसुरी बजाने का मौका मिला.

इज़्जत

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लोकल ट्रेन में 20 साल तक बांसुरी बजा कर अपना और अपने परिवार वालों का पेट भरने वाले विष्णु भाई पटेल पंजाब से मुंबई काम की तलाश में आए थे लेकिन नौकरी नहीं मिलने पर भीख मांगना शुरू कर दिया.

वो कहते हैं, "इतने सालों में मजबूरी के चलते बहुत ताने सुने, गालियां भी सुनी लेकिन अब मैं ट्रेन के अलावा स्टेज शो भी करता हूँ, जब तालियां मिलती हैं तो खूब ख़ुशी होती है. आज मेरी अपनी पहचान और इज़्ज़त है."

वहीं संगीत की कोई तालीम नहीं लेने वाले नेत्रहीन संतोष, मोहम्मद रफ़ी को अपना गुरु मानते हैं और रफ़ी साहब की तरह ही गाते हैं.

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संतोष कहते हैं, "जब स्वराधार से जुड़ा तो उन्होनें मुझे संगीत सिखाया और आज जब मैं किसी स्टेज शो में रफ़ी साहब के गीत गाता हूँ तो सुनने वालों की तालियों की गूंज मेरे कानों में पड़़ती है, एक अलग सा सुकून मिलता है."

फ़िलहाल स्वराधार में ऐसे कई लोग हैं जिन्हें स्कूलों में संगीत की शिक्षा मिली है या फिर जिन्होनें अपने पूर्वजों से संगीत सीखा है, कई लोगों की तो चार पीढियां संगीत से जुड़ी रही हैं.

हालांकि ट्रेन में गाने की वजह से उनकी आवाज़ में सुर की थोड़ी कमी रहती हैं लेकिन ये अनोखा म्यूज़िक बैंड कहीं से भी बेसुरा नहीं लगता.

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