शादी के फ़ैसले से ख़ुश हैं सुहासिनी मुले

  • 30 जुलाई 2015
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हाल ही में सोशल मीडिया पर अभिनेत्री सुहासिनी मुले ख़ासी चर्चा में रही. 2011 में 60 साल की उम्र में शादी करने वाली सुहासिनी को ख़ुद भी हैरानी थी कि कैसे अचानक उनकी शादी चर्चा का विषय बन गई.

सुहासिनी मुले एक सशक्त अभिनेत्री तो हैं हीं साथ ही वो एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म निर्माता भी है जिन्होनें 4 बार अपनी डॉक्यूमेंट्री फ़िल्मों के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीता है.

मुंबई में रहने वाली सुहासिनी पहले तो प्रोफ़ेसर अतुल गुर्तु से अपनी शादी को लेकर किसी तरह की बात नहीं करना चाहती थीं लेकिन फिर उन्होनें बीबीसी से बात करते हुए अपनी शादी के अलावा, अपने फ़िल्मी सफ़र, एकल दिनों के जीवन और महिलाओं से जुड़े कई मुद्दों पर हमसे बात की.

ख़ुशी

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वो कहती है कि मैं हैरान हूं कि मेरी शादी अचानक से इतने साल बाद चर्चा में कैसे आ गई? मेरी शादी इतना बड़ा मुद्दा नहीं थी कि लोग इसे डिस्कस करें या मुझे एक 'फ़ेमिनिज़्म ऑईकॉन' जैसा बना दें.

ऑईकॉन बनाए जाने के लिए मेधा पाटकर हैं, अरूणा रॉय हैं, वो 13 साल की बच्ची माल्वित पूर्णा है जिसने एवरेस्ट फ़तह किया उनके जीवन को हाईलाईट किए जाने की ज़रूरत है. यहां तो एक बुढ़िया है जिसने बस अचानक ज़िंदगी के एक पड़ाव पर शादी कर ली है.

लेकिन फिर भी आपने शादी से जुड़ा सवाल किया है तो मैं यही कहूंगी कि मैंने जानबूझ कर इतने सालों तक शादी नहीं की.

अपना रास्ता

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ऐसा नहीं था कि मुझे घर से शादी के लिए दबाव नहीं था, लेकिन मैं शादी नहीं करना चाहती थी. मेरे पास दूसरी प्राथमिकतांए थी, मेरे सामने मेरा करियर, मेरा काम था जिसे मैं नहीं छोड़ना चाहती थी.

देखिए शादी के बाद एक मर्द को भले ही ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता लेकिन एक औरत की ज़िंदगी ही बदल जाती है.

हर बार देखा जाता है कि शादी में एडजस्ट औरतें करती हैं और मैं तो डॉक्यूमेंट्री निर्माण के सिलसिले में महीनों बाहर रहती थी इसलिए मैं एडजस्ट नहीं कर सकती थी और इसलिए ही शादी नहीं की.

दवाब

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मैं कनाडा में मास कॉम की पढ़ाई कर भारत आ चुकी थी और फिर एक बार मेरी मां ने मुझे शादी के लिए ज़ोर दिया.

वो पहला और आख़िरी बार था क्योंकि मैंने उसी दिन मां को समझा दिया कि मेरी ज़िंदगी की प्राथमिकता मेरा करियर है और रही बात उनकी नाती पोतो की ख़्व्वाहिशों को पूरा करने की तो इसके लिए उनके पास दो बेटियां और हैं.

ऐसा नहीं है कि मैंने इन 60 सालों तक जीवन अकेले काटा, दोस्त, परिवार पर मेरी निर्भरता बराबर थी लेकिन प्रोफ़ेसर साहब से मिलने के बाद मुझे लगा कि इस आदमी के साथ ज़िंदगी बिताई जा सकती है.

वैसे शादी में देर होने का एक कारण मैं आपको बता सकती हूं, मुझे कहा जाता है कि लोग मुझसे डरते हैं, मेरी भाषा साफ़ नहीं है और ऐसे में एक ऐसा आदमी जो मेरे साथ निभा ले वो मिलना मुश्किल ही था.

दुनिया में औरत का रोल

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मुझे जब लोग पूछते हैं कि क्या आप एक भारतीय स्टीरियो टाईप को तोड़ रही हैं तो मैं पूछती हूं कि लोग इसे सिर्फ़ भारतीय समस्या क्यों मानते हैं?

दुनिया में हर जगह एक औरत का रोल तय है कि उसे ही घर चलाना है, बच्चों को पालने से लेकर परिवार के सदस्यों के खाने तक की ज़िम्मेदारी एक औरत की ही तो है.

दरअसल पूरे संसार में समाज की परिभाषा लिखने वाले पुरूष ही थे और इसलिए ये समाज और इसके नियम उनके लिए आसान है.

मैंने नहीं देखा किसी आदमी को अपने बच्चों के लंच, शाम की सब्ज़ी या रात के खाने के लिए चिंता करते हुए. औरत के साथ ये स्टीरियो टाईप सिर्फ़ भारत में ही नहीं दुनिया की हर सभ्यता में जुड़ा हुआ है और इसे तोड़ने के लिए अभी कई साल लगेंगे.

मैं विवाह बंधन के विरूद्ध नहीं हूं लेकिन, मैंने ख़ुद भी ये फ़ैसला लिया है लेकिन फिर कहूंगी अगर एक औरत के लिए कोई रिश्ता - पिता, भाई, प्रेमी, पति राह में रोड़ा बन रहा है तो वो हिम्मत करें और बगावत करें, ज़िंदगी में बहुत कुछ है जीने के लिए.

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