फ़िल्म रिव्यू: दृश्यम

'दृ्यम' के एक दृश्य में अजय देवगन इमेज कॉपीरइट universal

फिल्म: दृश्यम

निर्देशक: निशिकांत कामत

कलाकार: अजय देवगन, तब्बू

रेटिंग: 1/2*

बीते कुछ वर्षों में फ़िल्म ‘दृश्यम’ के रीमेक जितनी बार और जिस तरह बने है, उस हिसाब से ये फिल्म देवदास की तरह लगती है.

मूल दृश्यम वर्ष 2013 में बनी थी और इसके निर्देशक जीतू जोसफ़ थे. जो काफ़ी हिट रही.

कमल हासन ने इसके तमिल रीमेक में नायक की भूमिका निभाई थी.

इसके हिंदी रीमेक में नायक की भूमिका अजय देवगन ने की है.

पटकथा

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इसकी पटकथा में क्या ज़बर्दस्त ख़ूबियां हैं? तो फिर देवदास में ही क्या महानता थी?

फ़िल्म का प्लॉट कुछ ऐसा है.

एक बातूनी और बर्बाद लफंगा लड़का स्कूलों के एक कार्यक्रम में एक नग्न लड़की का वीडियो अपने मोबाइल फ़ोन पर अपलोड कर लेता है. फिर वह उस लड़की को ब्लैकमेल करता है.

हास्यास्पद

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लड़की अपनी मां (श्रेया शरण) को सब कुछ बताती है. कोई सामान्य औरत अपने पति से यह बताती और लड़के के मां बाप से बात करती. पर अजीब ढंग से इस मां ने खुद उस लड़के को पकड़ा जब वह चुपचाप उस लड़की से मिलने आया.

थोड़ी बहुत झड़प होती है और लड़का मारा जाता है. उस लड़की का पिता (अजय देवगन) और उसका पूरा परिवार इस मामले को छिपाने में लग जाता है.

यह हास्यास्पद है. पर बेवकूफ़ी यहीं नहीं रुकती है. दरअसल, वह तो यहां से शुरू होती है. लड़का एक बड़ी पुलिस अफ़सर (तब्बू) का इकलौता बेटा है.

कई दिन बेटे के लापता रहने के बाद कोई भी मां उसे ढूंढने के लिए ज़मीन आसमान एक कर देती, पर यह मां तो यूनिफ़ॉर्म में लकदक बनी उस परिवार के पीछे पड़ जाती है.

चूहे बिल्ली का खेल

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उसे पक्का यकीन है कि उसके बेटे के लापता होने की वज़ह इस परिवार को मालूम है. यह शक एक पुलिस वाले की जानकारी पर आधारित है और वो भी तब जब उस पुलिस वाले को उस परिवार से पुरानी खुन्नस है.

इस पुलिसिया मां की चिंता बस पटकथा के इर्द गिर्द ही घूमती रहती है. इसके बाद तब्बू और अजय देवगन के बीच चूहे बिल्ली का खेल शुरू होता है.

यह कुछ कुछ ‘अ वेडनेस डे’ (2008) के नसीरुद्दीन शाह और अनुपम खेर के बीच की तकरार की तरह है.

यह फ़िल्म भी अपराध और बग़ैर किसी सबूत के सज़ा पर आधारित है.

बॉलीवुड सुपर स्टार

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फ़िल्म का नायक एक आम आदमी है. उसने चौथी कक्षा से ज़्यादा की पढ़ाई नहीं की है.

उसका ग़ज़ब का आत्मविश्वास और अकड़ उसकी पृष्ठभूमि से क़तई मेल नहीं खाती. पर वह तो पूरी तरह बॉलीवुड सुपर स्टार है.

दबे कुचले शख़्स की भूमिका निभाते हुए भी उसे 'अजय देवगन' बनने से नहीं चूकना चाहिए.

आख़िर, उसके दर्शक भी तो यही चाहते हैं. पर यह पुलिसिया मम्मी तो उससे भी कई क़दम आगे है. वह सब कुछ जानती है.

सीधी सपाट फ़िल्म

निर्देशक निशिकांत कामत ने दर्शकों को ध्यान में रख कर ही फ़िल्म बनाई होगी. उन्हें चुस्त, स्मार्ट ख़ुफ़िया फ़िल्म नहीं बनानी थी, उन्हें हर तरह के जोड़ तोड़ वाली सीधी सपाट फ़िल्म बनानी थी.

निशिकांत ने 2005 में ‘डोंबीवली फास्ट’ से शुरुआत की थी. मेरी समझ में यह ‘एंग्री यंग मैन’ की वास्तविक परिभाषा की कोशिश थी.

‘मुंबई मेरी जान’ (2008) में इसे आगे बढ़ाया गया था.

इसके बाद ‘सिन्स फ़ोर्स’ (2011) और हालिया ‘लाई भारी’ (मराठी) में उन्होंने इसे और आगे बढ़ाया और दर्शकों को बहुत ही खुश किया.

मोहनलाल के फैंस का कहना है कि मूल मलयालम फ़िल्म बहुत ही चुस्त, कसी हुई और विश्वास करने लायक है. ख़ैर, इस फिल्म में ये चीजें तो नहीं ही हैं.

बस आप कह सकते हैं कि यह बहुत ही सरल फ़िल्म है, क्योंकि सबको शुरू से ही पता है कि हत्या किसने की है.

अगले 160 मिनट में 'दृश्यम' के दृश्य मेरी आंखों के सामने धुंधले होते गए. मैं उम्मीद करता रहा कि फ़िल्म जल्द से जल्द ख़त्म हो जाए.

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