जब 'तमस' पर इंदिरा गांधी भी हिचक गईं

भीष्म साहनी इमेज कॉपीरइट SAHMAT

अगर भीष्म साहनी आज हमारे बीच होते तो अपने जीवन के 100 साल पूरे करते.

शायद ही कोई पुस्तक प्रेमी उनके लिखे उपन्यास 'तमस' और नाटक 'कबीरा खड़ा बाज़ार में' से परिचित न हो.

बहुत लोग ऐसा मानते हैं कि 'तमस' में भारत के विभाजन की जो तस्वीर उन्होंने उकेरी है वो दुर्लभ है. इस पर टीवी सीरियल भी बन चुका है.

हिन्दी के प्रतिष्ठित समीक्षक और आलोचक नामवर सिंह का मानना है कि बहुमुखी प्रतिभा के धनी भीष्म साहनी की तुलना किसी अन्य लेखक से नहीं की जा सकती.

भीष्म साहनी प्रेमचंद के बाद सबसे महत्वपूर्ण कथाकारों में से एक रहे हैं. मशहूर अभिनेता रहे बलराज साहनी उनके बड़े भाई थे.

साल 2015 भीष्म साहनी की जन्म शताब्दी का साल है.

पढ़ें विस्तार से

इमेज कॉपीरइट Other
Image caption कथाकार भीष्म साहनी.

नामवर सिंह कहते हैं, "मुझे उनकी प्रतिभा पर आश्चर्य होता है कि कॉलेज में पढ़ते हुए वो लिखने, प्रगतिशील लेखक संघ से भी जुड़ने का समय निकाल लेते थे. हिंदी में उस दौर की दुर्लभ प्रतिभाओं में से एक थे भीष्म साहनी. मैं ये नहीं कहता कि उनकी सभी रचनाओं का स्तर ऊंचा है लेकिन अपनी हर रचना में उन्होंने एक स्तर बनाए रखा."

वो कहते हैं, "हैरानी होती है ये देख कर कि रावलपिंडी से आया हुआ आदमी जो पेशे से अंग्रेज़ी का अध्यापक था और जिसकी भाषा पंजाबी थी, वो हिंदी साहित्य में एक प्रतिमान स्थापित कर रहा था."

नामवर सिंह कहते हैं, "हो सकता है कि आर्य समाज के प्रभाव के कारण उनकी हिंदी भाषा पर असर पड़ा हो. प्रेमचंद की बात करें तो वो उर्दू में लिखते थे. बहुत बाद में जाकर वो हिंदी के क़रीब आए, लेकिन मुझे आश्चर्य होता है हिंदी उनकी भाषा न होते हुए भी उन्होंने हिंदी में बेहतरीन रचनाएं गढ़ी हैं."

बकौल नामवर सिंह, "कहानियों में 'वांग्चू', नाटकों में 'कबीरा खड़ा बाज़ार में' और उनके सबसे बेहतरीन उपन्यास 'तमस' को मैं प्राथमिकता देता हूँ."

भिवंडी के दंगे और तमस

इमेज कॉपीरइट GOVIND NIHALANI
Image caption फिल्म तमस में भीष्म साहनी के साथ दीना पाठक

भीष्म साहनी का जन्म 8 अगस्त 1915 में रावलपिंडी (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था. उन्होंने पहले गुरुकुल में हिंदी और संस्कृत की शिक्षा प्राप्त की और बाद में उर्दू और अंग्रेज़ी माध्यम से स्कूली शिक्षा प्राप्त की.

उन्होंने गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर से बीए और एमए किया. भीष्म साहनी ने 16 वर्ष की आयु से ही लिखना प्रारम्भ कर दिया था. उन्होंने विभिन्न तरह की रचनाएँ लिखीं, जिनमें कहानी, उपन्यास, नाटक, संस्मरण और अनेक लेख शामिल हैं.

उनके प्रसिद्ध उपन्यास 'झरोखे', 'तमस', 'बसंती', 'नीलू नीलिमा नीलोफर', शामिल हैं. सर्वोत्कृष्ट कहानियों में 'वांग्चू', 'अमृतसर आ गया', है और नाटक 'हानूश', 'कबीरा खड़ा बाज़ार में' और 'माधवी' प्रमुख हैं.

जब भीष्म साहनी अपने बड़े भाई बलराज साहनी के साथ भिवंडी में दंगे वाले इलाक़ों में गए और उन उजड़े मकानों, तबाही और बर्बादी का मंज़र देखा तो उन्हें 1947 के रावलपिंडी का दृश्य याद आया और दिल्ली लौटने के बाद उन्होंने 'तमस' लिखना शुरू कर दिया.

टीवी पर 'तमस'

इमेज कॉपीरइट GOVIND NIHALANI
Image caption गोविंद निहलानी

निर्देशक गोविन्द निहलानी ने 'तमस' पर एक मिनी टीवी सीरीज़ भी बनाई है.

गोविन्द निहलानी बताते हैं, "फ़िल्म 'ग़ांधी' की शूटिंग दिल्ली में हो रही थी. एक शाम जब श्रीराम सेंटर गया तो कोने में एक किताबों की दुकान में 'तमस' रखी थी. यह किताब विभाजन के समय पर आधारित है. उस दौरान मैं ऐसी ही कोई कहानी ढूंढ रहा था. मैंने ये किताब ख़रीद ली."

"कुछ दिन तक तो ये मेरे होटल के रूम में रखी थी. फिर जब कुछ दिनों बाद मैंने इस किताब को पढ़ने की कोशिश की और जब एक पैरा पढ़ा तो मैं पढ़ता ही चला गया. लगा कि इस पर एक फ़िल्म बननी चाहिए."

वो बताते हैं, "फिर मैंने इस किताब के लेखक को ढूंढ़ना शुरू किया. पता लगा कि भीष्म साहनी साहब दिल्ली में ही रहते हैं और बलराज साहनी के छोटे भाई हैं. उनका पता ढूंढ़ कर मैं उनसे मिलने चला गया."

"उन्होंने मेरी पहली फ़िल्म देखी थी 'आक्रोश'. मैंने कहा कि अगर आपको कोई एतराज़ न हो तो 'तमस' पर फ़िल्म बनाना चाहता हूँ और उन्होंने हामी भर दी."

निहलानी कहते हैं, "उनके व्यवहार से लगा कि इस आदमी के साथ काम करने में बहुत मज़ा आएगा. लेकिन यह जिस तरह की किताब थी उससे लगा कि ये छोटे बजट की फ़िल्म नहीं है. मेरे पास संसाधनों की कमी थी. मैंने ये बात उन्हें बताई और कहा कि जिस तरह का ये विषय है, हो सकता है कि ये विवादस्पद बन जाए इसलिए अभी ये फ़िल्म नहीं बना रहा हूँ."

इंदिरा गांधी ने क्या कहा

इमेज कॉपीरइट Shanti Bhushan
Image caption इंदिरा गांधी

'तमस' से जुड़े एक क़िस्से को याद करते हुए गोविन्द निहलानी कहते हैं, "दिल्ली में इंडिया इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल चल रहा था. प्रधानमंत्री के साथ एक मीटिंग आयोजित की गई. इंदिरा जी आईं और फिर मेरा नंबर आया."

"मैंने उनसे पूछा कि मैडम अगर मेरे पास भारत विभाजन जैसे विषय पर कोई गंभीर कहानी हो तो क्या भारत सरकार सहयोग करेगी."

"उन्होंने कहा कि सरकार के सहयोग का क्या मतलब है, तो मैंने कहा- आर्थिक मदद. उन्होंने तुरंत पूछा कि आप इस विषय पर कब फ़िल्म बनाना चाहते हैं. मैंने कहा कि जब मेरे पास फ़ंड होगा."

"उन्होंने कहा कि ये निर्भर करता है उस वक़्त देश के राजनीतिक हालत पर. उसके अनुसार सरकार ये तय करेगी की आपको मदद दे या न दे."

इमेज कॉपीरइट GOVIND NIHALANI
Image caption तमस के एक दृश्य में दीपा साही

"इंदिरा जी समझ गई थीं कि इस फ़िल्म पर विवाद हो सकता है. जब मैंने अपने प्रोड्यूसर ललित बिजलानी को समझाया तो उन्होंने कहा कि हम इस विषय पर फ़िल्म की बजाय एक टीवी सीरीज़ बना सकते हैं."

"12 दिन बाद उन्होंने कहा कि गोविन्द तुम इस विषय पर काम करना शुरू करो. मैं तुम्हारी मदद करूँगा और आप मुझे बाद में एडिट करके 3 घंटे की फ़िल्म दे देना. मुझे ख़ुशी हुई."

वो बताते हैं, "इस पर विवाद भी हुआ और आख़िरकार 3 जनवरी 1988 को ये दूरदर्शन पर प्रसारित हुआ. पर ये सीरीज़ थिएटर में रिलीज़ नहीं हुई."

कबीरा खड़ा बाज़ार में

इमेज कॉपीरइट SAHMAT
Image caption 'कबीर खड़ा बाज़ार में' नाटक का मंचन भारतीय रंगमंच के प्रसिद्ध निर्देशक, अभिनेता एमके रैना ने 10 साल तक किया है.

'कबीरा खड़ा बाज़ार में' उनका शानदार नाटक है.

जाने माने कलाकार एमके रैना कहते हैं, "भीष्म साहनी प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े थे और हम अक्सर इनके सम्मेलनों में जाया करते थे. इतने बड़े लेखक होने के बावजूद वो अक्सर हमें यार कहकर बुलाया करते थे. उनके इसी व्यवहार की वजह से उनसे नज़दीकियां बढ़ीं."

वो कहते हैं, "यह नाटक पढ़कर लगा कि इसमें तो पद ही छोड़ दिए गए हैं. इस पर भीष्म जी से कैसे बात की जाए, बहुत असमंजस था. तब मैंने अपने घर पर दावत रखी और उन्हें बुलाया."

"काशी में एक मछुवारे ने कबीर के पद गाये थे, उसका टेप मेरे पास था, इसे मैंने उन्हें सुनाया. तब मैंने पूछा- क्या कारण है कि आपने पद बहुत कम रखे हैं और उन्होंने जवाब दिया कि अरे यार मुझे आया ही नहीं ये करना. मैं तो ये सुनकर हैरान हूँ."

"कुछ बदलाव पर उन्होंने हामी भर दी. इस नाटक का नाम 'कबीरा खड़ा बाज़ार में' मैंने ही दिया है. शुरुआत में इस नाटक में बदलाव को भीष्म जी ने पसंद नहीं किया लेकिन प्रोडक्शन देखने के बाद मान गए."

1982 में पहली बार इसका मंचन हुआ था और लास्ट शो हमने किया था 1992 में सूरत में. पहली बार इसका मंचन त्रिवेणी कला संगम में हुआ था.

'मय्यादास की माड़ी'

इमेज कॉपीरइट Other
Image caption 'कबीरा खड़ा बाज़ार में' नाटक के कलाकारों के साथ भीष्म साहनी.

भीष्म साहनी की बेटी कल्पना साहनी कहती हैं, "मैं उन्हें भीष्म जी कहकर पुकारती थी. वो जो कुछ भी लिखते थे वो मेरी माँ को पहले सुनाते थे. मेरी माँ उनकी सबसे बड़ी आलोचक थीं."

वो बताती हैं, "मोहन राकेश की पत्नी अनीता मेरी माँ को बताती थीं कि जब मोहन राकेश लिखते थे तो घर में बिल्कुल चुप रहना पड़ता था और कभी-कभी तो वो अपनी बच्ची के साथ घर के बाहर सीढ़ियों पर बैठती थीं."

"लेकिन मेरे पिता भीष्म जी ऐसे नहीं थे. अगर घर में कोई आया है तो वो अपनी क़लम नीचे रख देते थे. मैंने कभी उन्हें किसी पर बिगड़ते हुए नहीं देखा."

कल्पना साहनी कहती हैं, "मुझे और हमारे परिवार में उनका उपन्यास 'मय्या दास की माड़ी' सबसे ज़्यादा पसंद है."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार