सास बहू को मिल रही है चुनौती

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साल 2000 के शुरूआती दशक में टेलीविज़न पर सास बहू धारावाहिकों की ऐसी बाढ़ आ गई थी कि हर परिवार अपनी बहू के रूप में 'तुलसी' या 'पार्वती' को ढूंढता था.

बालाजी टेलीफ़िल्मस के 500 एपिसोड से भी ज़्यादा चलने वाले 'के' सिरीज़ के धारावाहिकों की तर्ज़ पर दुखियारी बहुओं और साज़िश करने वाली सासों की कहानियां लिए कई धारावाहिक विभिन्न चैनलों पर नज़र आने लगे.

लेकिन लंबे वक़्त से चले आ रहे इस सास-बहू के वर्चस्व को अब चुनौती मिल रही है 'ज़िंदगी', 'एपिक', 'सब' और 'एंड टीवी' जैसे चैनलों पर दिखाए जा रहे धारावाहिकों से.

चुनौती

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टीआरपी के मामले में स्टार और ज़ी टीवी भले ही टॉप पर हों लेकिन इनके दर्शकों की संख्या में कमी आई है यह बात किसी से छिपी नहीं है.

साल 2008 में जब वायाकॉम के कलर्स चैनल की शुरूआत की गई थी तब इस चुनौती की नींव पड़ी थी.

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कलर्स पर आने वाले धारावाहिकों जैसे 'बालिका वधू', 'न आना इस देस लाडो' और 'बिग बॉस' ने टेलीविज़न दर्शकों को एक बिल्कुल नया कंटेंट परोसा जो अब ज़िंदगी और एपिक जैसे चैनल कर रहे हैं.

सब टीवी के चैनल हेड अनुज कपूर ने बीबीसी से कहा, "हम सिर्फ़ कॉमेडी शोज़ बनाते आए हैं और आगे भी वही करने वाले हैं क्योंकि यह काम कर रहा है."

वह चुनौती की असलियत बताते हुए कहते हैं, "जिनको रोज़ दाल चावल खाने की आदत हो, उनको कुछ और परोसा जाए तो तकलीफ़ तो होती है. लेकिन हम अपने मकसद में कामयाब रहे और अब तो दूसरे चैनल्स भी यही कोशिश कर रहे हैं क्योंकि दर्शक नए कंसेप्ट का स्वागत कर रहे है."

बोरियत

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'सास-बहू' को छोड़कर नए तरह के धारावाहिक बना रहे लगभग सभी चैनल्स के प्रवक्ता या नीति निर्धारण करने वाले अधिकारी मानते हैं कि लोग बोर होने लगे हैं.

पाकिस्तानी धारावाहिकों को भारत में दिखाने वाला ज़िंदगी चैनल पिछले एक साल में टीआरपी में कई पायदान उपर आया है और चैनल की स्पेशल कंसलटेंट शैलजा कहती हैं, "मैं लंबे समय से भारतीय टेलीविज़न से जुड़ी रही हूं और कई शोज़ मैंने बनाए हैं लेकिन एक वक़्त ऐसा आया जब मैं अपने ही बनाए धारावाहिकों से उबने लगी और तब मैंने बाहर के देशों में कुछ नया तलाशना शुरू किया."

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एपिक चैनल के लुटेरे धारावाहिक के निर्माता सौरभ बंजारा कहते हैं, "ये कुछ नया करने वालों के लिए सुनहरा समय है क्योंकि मेरे 20 साल के अनुभव में पहली बार एपिक जैसे चैनल सामने आए हैं और लोग उन्हें देख रहे हैं, ये सुनहरा वक़्त है क्योंकि ऑडियंस भी कुछ अलग देखना चाह रही है."

एपिक चैनल पर डॉक्यूमेंट्री की शक़्ल में आने वाले धारावाहिक और पीरियड ड्रामा और हाल ही में शुरू हुई रबींद्रनाथ टैगोर की कहानियां या भारतीय क्रिकेट के अनसुने क़िस्से लोगों को ख़ूब पसंद आ रहे हैं.

सास-बहू की वापसी

इसी साल मार्च महीने में लांच हुआ 'एंड टीवी' एक तेज़ी से लोकप्रिय होता चैनल है और इसके धारावाहिक 'गंगा', 'भाभीजी घर पर हैं' काफ़ी पसंद किए जा रहे हैं.

'भाभीजी घर पर हैं' शो में अभिनय करने वाले रोहिताश गौड़ कहते हैं, "शो को अच्छी प्रतिक्रिया मिली है और मुझे ऐसा लगता है कि सास बहू के दिन बहुत जल्द जाने वाले हैं क्योंकि ऑडियंस के टेस्ट भी वक़्त के साथ बदलते है."

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लेकिन ऑडियंस की यही पसंद बदलने वाली आदत 'सास बहू' को वापस ले आएगी, विशेषज्ञों का यही मानना है.

वरिष्ठ टेलीविज़न अदाकारा विद्या सिन्हा के अनुसार,"सास बहू धारावाहिकों में अलग सा आकर्षण है, एक औरत पर होते अत्याचार देख कर घर पर बैठी औरतों में अजीब सी सहानुभूति जाग जाती है और वो उस धारावाहिक से जुड़ जाती हैं और यही आगे भी होगा."

वरिष्ठ निर्माता निर्देशक सिद्धार्थ कुमार तिवारी भी मानते हैं कि सास बहू धारावाहिक फिर लोकप्रिय है सकते हैं, "एपिक और कलर्स एक प्रयोग हैं जिसे 'सास बहू' बनाने वाले लोग ही कर रहे हैं, यह प्रयोग विफल हुए तो फिर सास बहू की ओर निर्माता लौट जाएंगे."

'कलर्स' चैनल इस बात का बड़ा उदाहरण है कि 'उतरन' और 'लाडो' जैसे धारावाहिकों की असफलता को देखकर कुछ ही दिनों में बालिका वधू और ससुराल सिमर का जैसे धारावाहिक उसी बनी बनाई परिपाटी पर चल पड़े ऐसे में एपिक, एंड टीवी और ज़िंदगी चैनलों की यह नई पौध सास बहू को बाहर कर पाएगी, अभी ठोस रूप में कुछ कहा नहीं जा सकता.

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