रंगमंच की एक पुरानी धरोहर

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मुंबई के कालबादेवी में शॉपिंग सेंटर की भीड़ में एक बड़ा सा दरवाज़ा दिखाई पड़ता है जिस पर हाथी का शिल्प है.

1892 से 1978 तक इसी दरवाज़े से भांगवाड़ी थिएटर में काम करने वाले कलाकार, कला रसिक, अभिनेता, लेखक और कइ गायकों का आना जाना लगा रहता था.

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भांगवाड़ी रंगमंच की कला की निशानी के तौर पर यह प्रवेश द्वार ही बचा है लेकिन यह द्वार गुजराती रंगभूमि के स्वर्णकाल का साक्षी है.

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भांगवाड़ी थिएटर के साथ कई क़िस्से और कहानियां जुडे हुए हैं जिनमें से एक मशहूर कहानी यह भी है कि मुंबई को रंगमंच और सिनेमा की नगरी बनाने में भांगवाड़ी थिएटर का ही हाथ है, हालांकि इसकी सत्यता परखने का कोई साक्ष्य मौजूद नहीं है.

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पारसी और गुजराती नाट्यकलाओं से प्रभावित 'भांगवाड़ी रंगमंच' 1892 में देशी समाज के नाटकों से स्थापित हुआ.

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78 वर्षीय विनयकांत द्विवेदी के पिता प्रभुलाल द्विवेदी ने पुरानी गुजराती रंगभूमि के लिए 60 नाटक और 400 से भी ज़्यादा गाने लिखे और वे भांगवाड़ी से जुड़े रहे.

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विनयकांत द्विवेदी ने भांगवाडी की यादें बीबीसी से साझा करते हुए कहा,"उन दिनों नाटकों में पुरुष अभिनेता ही महिला वेश में अभिनय करते थे."

वो बताते हैं कि हिन्दी फ़िल्मों में प्रचलित हुए कई गाने नाटकों से प्रेरित हैं,"मुग़ल-ए-आज़म का ‘मोहे पनघट पे’ गाना रसकवि रधुनाथ ने भांगवाड़ी के नाटक छत्रसाल के लिए लिखा था."

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भांगवाडी में नाटक ढलती शाम से शुरु हो कर सुबह आठ-नौ बजे तक चलते और भव्य सेट के बीच दर्शकों की फ़रमाइशें पूरी करने में सारी रात बीत जाती थी.

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भांगवाड़ी की भव्यता दूर-दूर तक मशहूर थी और कई लोकप्रिय नाटक देखने के लिए दर्शक दूसरे राज्यों से यहां आते थे.

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‘मालवपति मुंज’, ‘वडिलो ने वांके’, ‘पृथ्वीराज’, ‘संपत्ति माटे’ जैसे लोकप्रिय गुजराती नाटकों के 5,000 से भी ज़्यादा शो हुए हैं और नाटकों का मंचन करने वाली नाटक कंपनियां कराची और बर्मा तक जाती थी.

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शिवलाल कॉमिक, आनंद जी कबूतर, चिमन चकुडो, छगन रोमियो, प्राणसुख ऑडिपोलो जैसे अभिनेता अपने किरदारों के नाम से जाने जाते थे. वहीं जयशंकर ‘सुंदरी’, प्रभाकर कीर्ति-रंगलाल नायक, मा. गोरधन जैसे कलाकार स्त्री वेशभूषा की वजह से जाने गए.

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उन दिनों नाटकों में महिलाएं कम दिखती थीं लेकिन मोतीबाई, माहेश्वरी, मनोरमा, कुसुम ठाकर, शालिनी, हंसा जैसी अभिनेत्रियां अभिनय और गाने के कारण प्रसिद्धता पाई.

आज गुजराती नाटक में कला कम व्यवसाय ज़्यादा दिखता है. शायद पहले जैसे कद्रदान नहीं रहे लेकिन कला से जुड़े लोग नाटक के भाव, सत्व और माहोल को कायम रखने में कसर नहीं छोडते.

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