बड़े परिवारों में इतना असंतोष क्यों?

  • 7 सितंबर 2015

उनकी शानोशौकत को देख कर हर कोई उनके जैसा बनना चाहता है. हर कोई उनकी तरह बड़ी गाड़ियों में घूमना चाहता है, होटलों में खाना चाहता है लेकिन किस क़ीमत पर?

हाल ही की कुछ घटनाओं पर नज़र डालें तो बाहरी सामाजिक जीवन में ख़ुश नज़र आने वाले बड़े परिवारों में आंतरिक कलह एक आम बात बनती जा रही है.

चर्चा में चल रहा इंद्राणी मुखर्जी का मामला अपनी तरह का पहला हाई प्रोफ़ाईल केस नहीं है, बड़े नाम वाले परिवारों की लंबी फ़ेहरिस्त है जहां विवादों ने 'अमीर' परिवारों की कलह को सड़क पर ला दिया है.

विवाद

सामाजिक रुतबा रखने वाले परिवारों के घरों के भीतर किस तरह की तनातनी चलती है इसके कई उदाहरण वक़्त वक़्त पर सामने आए हैं.

दिल्ली के जाने माने बिज़नेसमैन और फ़िल्म निर्माता पोंटी चड्डा को 2012 में उनके सगे भाई ने प्रपर्टी विवाद के चलते गोली मार दी थी.

भाजपा के क़द्दावर नेता प्रमोद महाजन को उन्हीं के भाई प्रवीण महाजन ने साल 2006 में उनका हक़ न दिए जाने के आक्रोश में गोली मार दी थी.

वहीं साल 2005 से मुंबई के जाने माने उद्योगपति घराने मफ़तलाल परिवार में मालिकाना हक़ को लेकर चल रहे विवाद का एक कड़वा रुप तब सामने आया जब बीते 23 अगस्त को लिंग परिवर्तन करवा कर अपर्णा से अजय बने मफ़तलाल परिवार के बड़े बेटे के देहांत का उनके परिवार को पता ही नहीं चला.

सच

बड़े परिवारों के विवादों में अंबानी परिवार का विवाद, सुनंदा पुष्कर की हत्या और मुंबई के किलाचंद परिवार का नाम भी याद आता है लेकिन सवाल ये उठता है कि आख़िर क्या वजहें हैं कि इन समृद्ध परिवारों के अंदर इतनी अशांति है.

जाने माने मनोचिकित्सक डॉ किरण शांडिल्य कहती हैं, "आप ये आम तौर पर नहीं कह सकते कि यह सिर्फ़ बड़े परिवारों की परेशानी है, लेकिन पैसे को पाने का दबाव इसका एक बड़ा कारण है."

वो कहती हैं, "परिवार व्यक्ति से बनता है और आजकल एक व्यक्ति पर ज़्यादा से ज़्यादा पैसा कमाने का दबाव है और यही दबाव उसे अपनों से दूर कर देता है."

मनोचिकित्सक डॉक्टर श्याम मिठिया के मुताबिक़, "परिवार के सदस्य अब एक दूसरे को समय नहीं दे पाते जिससे उनकी आपस की बॉडिंग कमज़ोर हो जाती है. परिवार जितना अमीर होता जाता है यह व्यस्तता उतनी ही बढ़ती जाती है और साथ ही दूरी भी."

आर्थिक संपन्नता का दबाव और परिवार की दूरी के अलावा एक और कारण है जिसे डॉक्टर्स पारिवारिक उथल पुथल की बड़ी वजह मानते हैं.

ट्रेंड

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"आजकल 'ट्रेंड' में रहने का ज़माना है और जो जितना 'ट्रेंडी' होगा, समाज में उसकी पूछ उतनी ही होगी." कहते हैं मानव व्यवहार पर काम कर रहे मनोचिकित्सक अजीत दांडेकर.

वो कहते हैं, "अमीर लोग हर समय एक दबाव में जीते हैं कि उनपर लोगों की नज़र है और यह दबाव 'तनाव' और 'असुरक्षा' में बदल जाता है, इंद्राणी मामले में बेटी को बहन बना कर मिलवाना ऐसी ही असुरक्षा का परिचायक है."

इंद्राणी की कई शादियों के सवाल पर डॉ किरण ने कहा, "ये भी एक ट्रेंड है, जिससे आजकल का समाज गुज़र रहा है. यह पश्चिम में सामान्य बात है लेकिन हमारे समाज के लिए नई और बस इसलिए इंद्राणी की शादियों पर चर्चा हो रही है, वर्ना यह एक निजी विचार है."

ट्रेंड का ज़िक्र आने पर कई लोग बॉलीवुड को भी इसका दोषी मानते हैं लेकिन बॉलीवुड इस मामले में अलग सोच रखता है.

बॉलीवुड

आज सफलतम अभिनेत्रियों में मानी जाने वाली कंगना राणौत हिमाचल प्रदेश के एक छोटे गांव से आई हैं और वो कहती हैं, "ये अकेले जीने की पद्धति मुझे परेशान करती है, मुझे नहीं पता क्यों लोग यहां अकेले जीना चाहते हैं?"

वो कहती हैं, "मैं हमेशा से अपने परिवार के सहारे रही हूं और उनसे राय मशविरा करती आई हूं और मैं जानती हूं कि ज़िंदगी फ़िल्म नहीं है, जिस दिन मैंने इस चकाचौंध में उन्हें खो दिया मैं अकेली रह जाउंगी."

वहीं बड़े फ़िल्मी परिवार से आने वाले अभिनेता इमरान ख़ान 'संपन्नता' से जुड़े विवाद की बात पर इंकार करते हैं.

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वो कहते हैं, "ये आपकी परवरिश पर निर्भर करता है, मैं एक संपन्न परिवार से हूं लेकिन हमें घर में बड़ों और छोटों का फ़र्क़ समझाया गया है और मैं आज भी अपने बड़ों से ज़ुबान नहीं लड़ा सकता."

वहीं निर्माता निर्देशक महेश भट्ट का कहना है कि फ़िल्में सच्चाई नहीं होती और सच्चाई और हक़ीक़त का फ़र्क़ हमें समझना, ज़मीन पर रहना होगा, वर्ना उदाहरण तो कई हैं.

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