नए कलाकारों की झोली में नए मौके

  • 24 सितंबर 2015
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किसी भी कलाकार के पास अपनी पहचान बनाने के मौके बहुत कम होते हैं, अगर किसी को लोकप्रिय होना है तो उसे सिनेमा, रंगमंच या टेलिविज़न का सहारा लेना पड़ता है.

लेकिन सोशल मीडिया के आ जाने के बाद अब कला और कलाकारों के लिए मंचो की कमी नहीं रह गई है.

'ओपन प्लेटफ़ॉर्म' या 'खुला मंच' के नाम से मशहूर इन माध्यमों को सोशल मीडिया के माध्यम से लोकप्रिय बनाया जा रहा है और यहां परफ़ॉर्म करने के लिए आपको किसी 'गॉडफ़ादर' की ज़रुरत नहीं पड़ती.

खुला मंच

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रंगशिला थिएटर ग्रुप ने कल्चर वल्चर प्रॉजेक्ट के अंतर्गत हर कला और टैलेंट से जुड़े कलाकारों को मंच से जोडना चाहा.

पहले ही आयोजन में एक प्रयोग किया गया. इसमें कलाकारों ने मैथिली शरण गुप्त, दिनकर जैसे हिन्दी साहित्य के प्रतिष्ठित कवियों की रचनाओं को संगीत में ढाला गया.

कोई रचना जैज़ में तो कोई लोकसंगीत के साथ प्रस्तुत की गई, तो किसी को शौर्य गीत का स्वरांकन मिला.

रंगशिला के शशि चतुर्वेदी ने कहा,"हम संभावनाएं ढूंढ रहे हैं कि मंच पर और क्या हो सकता है ?"

वो आगे कहती हैं,"परफ़ॉर्म करने के जितने भी तरीके हो सकते हैं उन्हें हम टटोलेंगे. आम आदमी स्टेज से जुड़े यही हमारी कोशिश है. यह खुला मंच है और हर दूसरे रविवार को अंधेरी के 'स्काय टैरेस कैफ़े' में कोई ना कोई कार्यक्रम ज़रुर रखेंगे."

नए पुराने सब एक

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इंदौर के रहने वाले मशहूर स्टैंड अप कॉमेडियन ज़ाकिर भी इन्ही खुले मंचो को अपनी सफलता का श्रेय देते हैं.

वो मानते हैं कि खुला मंच आपको आपकी कला दिखाने की जगह देते हैं जो बॉलीवु़ड में किसी नए कलाकार के लिए मुश्किल है.

वो कहते हैं,"मुंबई कॉमेडी का मक्का है, यहां कैनवास लॉफ़ फ़ैक्ट्री जैसी जगह सिर्फ़ कॉमेडी के लिए है. मैं किसी फ़िल्म परिवार से नहीं हूं, ना कोई गॉडफ़ादर हैं लेकिन यहां इवेंट में हिस्सा लेता गया, लोगों को मेरा काम पसंद आया और मुझे शो मिलने लगे."

ज़ाकिर बताते हैं कि उनके जैसे कई कलाकारों को शायद फ़िल्मों में एक मौका लेने के लिए सालों साल इंतज़ार करना पड़ता लेकिन खुले मंचों के चलते नए कलाकार अपनी कला और ज़िंदगी दोनों चला पा रहे हैं.

सोशल मीडिया

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इस तरह के खुले मंचों और यहां परफ़ॉर्म करने वाले कलाकारों को सोशल मीडिया से लोकप्रियता मिलती है.

देहरादून के रहने वाले मोहित डोगरा गिटार बजाते हैं और कुछ महीनों पहले ही मुंबई आए हैं, मोहित बताते हैं,"संगीत के क्षेत्र में मेरा संघर्ष जारी है लेकिन साथ में मैं नौकरी भी कर रहा हूं. अगर खुला मंच न हों तो मेरा काम लोगों तक कैसे पहुंचेगा."

वो बताते हैं कि खुले मंचो के अलावा नए कलाकारों का काम सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों तक पहुंचता है और फिर ‘वर्ड ऑफ माउथ’ के ज़रिए आपकी वीडियो या संगीत किसी फ़िल्म से भी ज़्यादा लोकप्रिय हो सकता है.

लेकिन ऐसा नहीं है कि आप खुले मंच पर जाएंगे और आपको परफ़ॉर्म करने दिया जाएगा, खुले मंचो से जुड़े सभी लोगों का एक स्वर में कहना है कि आपको खुले मंच पर मौका तभी मिलेगा जब आपमें सच्चा टैलंट होगा.

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फ़िलहाल दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर जैसे बड़े शहरों में ही व्यवस्थित रुप से खुले मंच काम कर रहे हैं और सोशल मीडिया से ही छोटे शहरों के कलाकार बड़े शहरों के कलाकारों के साथ मिलकर अपने शहरों में 'खुले मंच' आयोजित करने की कोशिश कर रहे हैं.

कुछ बड़ी संस्थाए जो नए लोगों को मौका देती हैं उनमें प्रमुख है पृथ्वी थिएटर में कैफ़ेराती, बांन्द्रा में हाईव, कल्चर वल्चर, टॉल टेल्स, बिग माइक और कैनवास लॉफ़ क्लब.

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