कैंसर के ख़िलाफ़ जंग में गिटार बना हथियार

मुंबई में दादर से अंबरनाथ जाने वाली लोकल ट्रेन में एक लड़का हाथों में गिटार थामे चढ़ता है.

बैठने की सीट म‍िल जाती है तो वे ट्रेन के दरवाज़े से ट‍िककर ग‍िटार बजाते हुए गाना गाने लगते हैं.

एक गाने के बाद वह अपना पर‍िचय देते हुए कहता है, “मेरा नाम सौरभ निंबकर है. 23 साल का हूँ और एक फ़ार्मास्‍यूट‍िकल कंपनी में क्‍वाल‍िटी कंट्रोल में जून‍ियर ऑफ‍िसर हूँ. कैंसर से पीड़‍ित मरीजों की मदद करने के लिए, ग‍िटार बजाकर आप सबका मनोरंजन करूंगा, इसके एवज में जो बन पड़े इस बॉक्‍स में डाल दें.”

इतना कहने के बाद सौरभ एक डोनेशन बॉक्‍स निकालकर अपने सामने रख देते हैं और अपने गिटार पर बॉलीवुड के लोकप्रिय गानों की धुन बजाना शुरू कर देते हैं.

शुरुआत

पांच महीने से ट्रेन में इस तरह गाना गा रहे सौरभ की मां की मौत कैंसर से हुई थी.

कैंसर की बीमारी के इलाज के लिए मां के साथ अस्पतालों के चक्कर लगाने के बाद सौरभ को एहसास हुआ कि इस बीमारी से एक व्यक्ति नहीं, पूरा घर पीड़ित होता है.

वे कहते हैं, "मैं उस समय संगीत सीख रहा था. मां की मौत के बाद मैंने इसी संगीत को कैंसर के ख़िलाफ़ हथियार बना लिया."

मुश्‍क़‍िलें

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लेकिन इस काम के लिए सौरभ को कई बार यात्रियों और पुलिस वालों से डांट सुननी पड़ी है.

वे कहते हैं, "एक बार दादर में एक अधेड़ उम्र के आदमी ने मुझे भिखारी समझ लिया और ज़बरन ट्रेन से उतार दिया."

कई बार यात्रियों को संगीत शोर लगता है और वे चीखने-चिल्लाने लगते हैं. ऐसे में सौरभ को गिटार बजाना बंद करना पड़ता है. लेकिन कई बार कुछ यात्री सहयोग भी करते हैं और उन्हें बचाते भी हैं.

मदद

सौरभ मानते हैं कि वे जो भी मदद करते हैं, वो कैंसर के पूरे इलाज के लिए काफ़ी नहीं है.

वे कहते हैं, "मैं जो कर सकता हूँ, कर रहा हूँ. मैं अपने वेतन का एक हिस्सा कैंसर पीड़ितों को दान देता हूँ. लेकिन लोगों को अपने असली होने का विश्वास दिलाने का मेरे पास कोई सबूत नहीं है."

सौरभ गिटार के अलावा गाना भी सीख रहे हैं. वे जल्द ही एक एल्बम निकालने के अलावा लाईव कंसर्ट करना चाहते हैं ताकि उन्हें हमेशा ट्रेनों में ही गाना न पड़े.

वे कहते हैं, "मैं हमेशा यही करता रहूँगा तो शायद मुझे भी औरों की तरह इसकी आदत हो जाए. लेकिन मैं सिर्फ़ मांग कर नहीं, कमा कर कैंसर पीड़ितों की मदद करना चाहता हूँ."

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