फ़िल्म रिव्यू: तितली

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फ़िल्म: तितली

निर्देशक : कनु बहल

कलाकार: शशांक अरोड़ा, रणवीर शौरी, अमित सियाल

रेटिंग: ***

'ब्रदर ग्रिम्स' की पागल कर देने वाली मनहूस परीकथा की याद दिलाती फ़िल्म.

फ़िल्म तितली इतनी डार्क है कि कुछ ही मिनटों में आप समझ जाएंगे कि बाकी की फ़िल्म भी उदास करने वाली है.

पूरी फ़िल्म में दर्दनाक दिखने वाले तीन भाई (शशांक अरोड़ा, रणवीर शौरी और अमित सियाल) और उतने ही उदास उनके पिता के चेहरों पर शायद ही कोई भाव नज़र आता हो.

हिंदी फ़िल्मों में मध्यम वर्ग की लगभग यूनिफॉर्म बन चुकी चेक वाली शर्ट या सफेद बनियान जो कि हीरो की त्वचा से मेल खाने की हद तक मैली दिखती है, पहने हुए किरदार सच्चाई को उजागर करते दिखते हैं.

शायद गरीबी की वजह से ये किरदार के अनैतिक के रास्ते चल पड़े हैं. हालांकि अमीर होने से भी नैतिकता का कोई वास्ता नहीं होता है.

ये परिवार दिल्ली के जमुना पार्क में मदर डेयरी के पास वाले नाले में रहता है.

हालांकि मैं यह तय नहीं कर सका कि कार जैक करने वाले ये तीनों भाई अपना सही पता बताते भी हैं या नहीं.

तीनों भाई कार जैकिंग के धंधे में हैं. ये लोग रात में कार ड्राइवरों को पकड़ते हैं, इनके साथ मार-पीट करते हैं और कार के पुर्ज़े स्थानीय चोर बाज़ार में बेच देते हैं.

फिर परिवार में एंट्री होती है एक महिला की जिससे इन लोगों की ज़िन्दगी थोड़ी आसान हो जाए.

वैसे भारत में अरेन्ज्ड मैरेज में एक स्टॉक एक्सचेंज की तरह है.

जिस आसानी से ये भाई अपना धंधा चलाते हैं उससे भले ही आप यथार्थ पर सवाल न उठाएं लेकिन आप चौंक सकते हैं.

और आपको इसलिए ऐसा लग सकता है कि फ़िल्म पूरी तरह सिर्फ़ सच्चाई पर आधारित है.

फ़िल्म के पहले सीन से ही सच्चाई का आभास होता है जब सबसे बड़े भाई (रणवीर शौरी) एक टेन्ट वाले के साथ कुत्ते-बिल्ली की तरह झगड़ते दिखते हैं. यही दिल्ली है, यहां क्लास का कोई मतलब नहीं होता.

लेकिन रुकिए यह पहला सीन नहीं है. फ़िल्म शुरू होती है सबसे छोटे भाई (शशांक) से जो शहर में बनन वाले एक बड़े मॉल के पार्किंग स्थल के कॉन्ट्रैक्ट लिए बात करते दिखता है.

पिछले एक साल में मैं छोटे शहरों में बसने वाले भारत को बहुत देख चुका हूं जैसे मेरठ, बनारस, इलाहाबाद, रांची, जमशेदपुर, भोपाल, लखनऊ वगैरह.

इलाहाबाद को छोड़कर बाकी सारे शहरों में आप देख सकते हैं कि एक बड़ा सा मॉल बन गया है जो बाकी शहर से बिल्कुल अलग उभरकर आता है. शहर के बाकी हिस्से बिल्कुल वैसे ही होते हैं जैसे वो पहले हुआ करते थे.

दिल्ली और मुंबई जैसे मेट्रो शहरों में भी ऐसे ही कई छोटे-छोटे शहर बसते हैं, यहां तक गांव भी.( झुग्गियां अगर घनी बस्तियों के रूप में ग्रामीण भारत नहीं तो क्या हैं?)

मैं नहीं जानता कि यह फ़िल्म की कहानी कब लिखी गई. लेकिन पिछली सदी के बाद (बीते दशक के मध्य और अंत में) की छाप फ़िल्म के लेखन में नज़र आती है, जब भारत की जीडीपी दो अंकों का आंकड़ा छू रही थी और गरीबों के प्रति अमीरों की उदासीनता पर गुस्से से भरी आवाज़ों (अरुंधती रॉय, पंकज मिश्रा और उनके जैसे कई लेखकों की) के बीच अमीरों और गरीबों का फ़ासला बढ़ता जा रहा था.

सही मायनों में "इंडिया शाइनिंग "अब कहीं नहीं दिख रहा. कुछ ही लोग हैं जो आगे बढ़ रहे हैं वहीं सांस्कृतिक और राजनीतिक परिवेश में असहनशील लोग भी बने हुए हैं. शहरों के बेरोज़गार ग़रीबों में उपभोक्तावाद के असर पर इस फ़िल्म में जो टिप्पणियां दिखती हैं वो संदर्भहीन नहीं लगती.

शायद उपभोक्तावाद के उस असर को बदला भी नहीं जा सकता.

इस फ़िल्म को देखते हुए मानो आप झुग्गी में एक घर-परिवार के बीच पहुंच जाते हैं, जैसे उनकी टेबल पर रखे खाने की महक को महसूस कर रहे होते हैं (ये परिवार अक्सर खाते और बात करते नज़र आता है), गरारे करते हुए किरदारों की आवाज़ें आपको असली लगेंगी, उनके बर्तन और टूथब्रशों को देख सकते हैं और दीवारों पर उकेरे गए चित्रों को महसूस कर सकते हैं. जबकि इन सब चीज़ों के बीच दहेज में आई डाइनिंग टेबल नई दुल्हन की तरह चमकती दिखती है.

फ़िल्म के किरदार आपको उनकी ज़िन्दगियों और दूसरों के लिए उनके प्रेम में नज़दीक से झांकने का मौका देते हैं.

मुझे याद नहीं कि मैं मनीष झा की 2003 की फ़िल्म 'मातृभूमि' के बाद किसी फ़िल्म को देखकर इतना दुखी और परेशान हुआ हूं. हालांकि मनीष झा की फ़िल्म 'मातृभूमि' भी दर्शकों के बीच ज़्यादा कमाल नहीं दिखा पाई थी.

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