शाहरुख़ ख़ान: थोड़े ‘फक़ीर’ हैं थोड़े ‘बादशाह’

शाहरुख ख़ान

शाहरुख़ ख़ान आज पचास बरस के हो गए. पचास बरस बाद शाहरुख़ सौ साल के हो जाएंगे. गुज़रे पचास सालों में शाहरुख़ को ज़माने ने ‘बादशाह’ मान लिया. उधर शाहरुख़ ने अपने को इस ‘बादशाह’ की गद्दी पर बिठाकर ख़ुद को ‘थोड़ा सा फक़ीर’ भी मान लिया.

‘किंग’ और ‘बादशाह’ के लक़ब अगर धंधे के लिए ज़रूरी हैं तो ‘थोड़ी सी फक़ीरी’ रूह की बेचैन तलाशों के लिए सुकून का मसकन है.

यूं भी इस मान लेने और होने के बीच एक बहुत लंबा फ़ासला है. और फ़ासलों के बीच सच नहीं सिर्फ़ फ़ासले होते हैं. सच, फ़ासले तोड़ने के बाद सामने आता है. सलीम कौसर का बड़ा ख़ूबसूरत मिसरा है ‘सरे आईना मेरा अक्स है, पसे आईना कोई और है.’

यह जो आईने के पीछे का ‘कोई और’ है, वो ज़माने से अक्सर बहुत शर्माता है. जिन लोगों ने सुई के बारीक नक्के से शाहरुख़ को देखने की कोशिश की होगी वो इस बात से बख़ूबी वाक़िफ़ होंगे कि फिल्मों की जगर-मगर दुनिया से दूर ‘मन्नत’ की ऊंची-ऊंची दीवारों के पीछे बैठा शाहरुख़ ख़ान ‘बादशाह’ का चोला उतारकर ही घर में दाख़िल होता है.

इस जगह वह शफ़क़त और मुहब्बत से लबरेज़ एक बाप है. एक ऐसा बाप जिसकी ज़िंदगी का वाहिद मक़सद अपनी औलाद की ख़ुशी और उसकी बहबूदी है.

कोई 14-15 साल पुरानी बात है. निर्माता-निदेशक महेश भट्ट से बातचीत के दौरान शाहरुख़ ने अपना दिल खोलकर उस पर्दे को हटा दिया था जहां उसका ‘कोई और’ मुक़ीम है.

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“मैं जल्दी बड़ा हो गया भट्ट साहब. अगर मैंने ज़्यादा बात की तो मैं रोने लगूंगा. मैं ट्रेन के साथ नहीं खेल सका...काश मैं ट्रेन-ट्रेन खेल पाता ज़्यादा वक़्त तक... मुझे सब कुछ मिला. मैंने कभी मां-बाप को ग़ैर-ज़िम्मेदार नहीं पाया. उन्होंने सब कुछ दिया. मैं आज जो भी हूं, उन्हीं की वजह से हूं. लेकिन सच कहूं तो मैं यही सोचता हूं कि काश! थोड़ी देर से ड्राईविंग सीखी होती. काश! मेरे अंदर बच्चा कुछ ज़्यादा वक़्त तक बना रहता. अब मैं उस बच्चे को ज़िंदा कर रहा हूं....मैं अपने बच्चों के साथ अपना बचपन जी रहा हूं...मैं अपना बचपन जी रहा हूं अभी. मैंने बच्चों की तरह महसूस किया तो मैं किसी बच्चे की तरह दिखने भी लगा. मैं बच्चा होना चाहता हूं. मुझे इसमें बहुत मज़ा आता है ...मैं बुद्धिमान लोगों से नहीं मिलना चाहता. मैं उन दो मासूम बच्चों के साथ रहना चाहता हूं, जिनके आगे मुझे पर परफ़ार्म नहीं करना पड़ता.”

यह है शाहरुख़ ख़ान. जिसने अपने माज़ी को, अपने गुज़रे वक़्त को अपने हाथों और अपनी यादों से फिसलकर भागने नहीं दिया है. उसे अब तक याद है कि महज़ 15 बरस की उम्र में ही उसके सर से बाप का साया उठ गया. एक ऐसा बाप जिससे याराना की हद तक का रिश्ता था. जिसके पास बहुत दौलत भले न रही हो पर मुहब्बत के अकूत ख़ज़ाने थे.

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आज शाहरुख़ जितनी मुहब्बत अपने तीन बच्चों आर्यन, सुहाना और अबराम से करते हैं, उसमें कहीं न कहीं उनके पिता मीर ताज मोहम्मद की उस क़ुरबत की परछाईं हैं, जिसकी छांव में पलकर शाहरुख़ ने यह किरदार पाया है. यही वजह है कि शाहरुख़ की बातों में एक छोर पर उनकी बीवी-बच्चे और दूसरे छोर पर मां-बाप होते हैं. इन दो छोरों के बीच ही उन्होंने अपने आपको पाना और खोना सीखा है.

कोई चार साल पहले गोवा में एक जल्से के दौरान बात करते हुए शाहरुख़ ने अपने पिता को याद करते हुए कहा था कि बचपन में एक बार उसके पिता उसको एक फ़िल्म दिखाने ले गए लेकिन जेब में पूरे पैसे न थे. अब उन्होंने बेटे के नाउम्मीद और ग़मज़दा चेहरे पर ख़ुशी लाने की कोशिश में उसे सड़क से गुज़रती हुई रंगीन कारों के गुज़रते क़ाफिले दिखाते हुए कहा कि इन गाड़ियों को देखना भी एक ख़ूबसूरत अहसास है.

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एक बात जिसके लिए शाहरुख़ के दुश्मन भी उसे दाद देते हैं वह है उसका सेंस ऑफ़ ह्यूमर और हाज़िर जवाबी. यह ख़ूबी भी उन्हें अपने पिता से ही विरासत में मिली है.

शाहरुख़ ने ही 1998 में एक उर्दू मैगेज़ीन ‘फ़िल्मी सितारे’ से अपने पिता के बारे में बात करते हुए ‘...ख़ूबसूरत पठान, जिसकी आंखों का रंग ग्रे और बालों का रंग ब्राऊन...’ बताया था और उसी के साथ ढेर सारे क़िस्से बयान किए थे. इन क़िस्सों से पठान मीर ताज मोहम्मद की क़ाबिले रश्क हाज़िर जवाबी और ख़ुश मिज़ाजी का अंदाज़ ज़ाहिर होता है.

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“हमारे पड़ोस में रहने वाली साऊथ (दक्षिण भारतीय) लड़की को मैंने छेड़ा तो उसकी मां मेरी शिकायत लेकर पापा के पास पहुंच गई. पापा ने पूछा – ‘क्या आपकी बेटी, आप ही की तरह ख़ूबसूरत है?’ जब उसने हां कहा तो पापा बोले – ‘फिर तो मैं अपने बेटे को क़ुसूरवार नहीं मानता. अगर आप मुझे पहले मिली होतीं तो मैं भी आपके पीछे पड़ गया होता.”

ऐसे पिता का बेवक़्त चले जाना किस औलाद को दर्द न देगा. उनके जाने के बाद शाहरुख़ को उस कम उम्री में जिन तूफ़ानों का सामना करना था, उसके लिए पिता ने उसे पहले ही तैयार कर दिया था.

जो सबक़ मीर ताज मोहम्मद ने अपने बेटे को हंसते-खेलते सिखाए, बेटे ने वो तमाम सबक़ इस गहराई से अपने किरदार में समा लिए कि ज़िंदगी की हर मुश्किल के सामने पुख़्तगी से सीना तानकर खड़े होना और जीतना उसकी आदत हो गई है. और ज़िंदगी के हर ख़ुशनुमा मोड़ को ख़ुशियों के दरख़्तों में तब्दील करके अपने और ज़माने के लिए मसर्रत के मक़ाम क़ायम करना सीख लिया है.

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