नुसरत और क़व्वाली का दरगाह से रिश्ता

नुसरत फ़तेह अली ख़ान के परिवार के दो बच्चे अपनी ख़ानदानी परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए तैयार हैं.

इन दोनों ने बाबा फ़रीद गंज शकर की दरगाह में अपना पहला प्रदर्शन किया. उन्हें सुनने के लिए कई बड़ी हस्तियां पहुंची थी.

बारह साल के कैफ़ और तेरह साल के सैफ़ अली मोहम्मद ख़ान ने उसी वक़्त क़व्वाली सीखनी शुरू कर दी थी जब वो बोलना सीख रहे थे.

इनकी क़व्वाली सुनकर लोग झूम उठे और माना जा रहा है कि दो नये क़व्वालों का जन्म हो चुका है.

नुसरत फ़तेह अली ख़ान के परिवार का 800 साल से बाबा फ़रीद गंज शकर की दरगाह से संबंध है.

कहते हैं कि इस परिवार को सूफ़ी संत बाबा फ़रीद से संगीत का वरदान मिला है और यहां पीढ़ी दर पीढ़ी महान क़व्वाल पैदा होते रहे हैं.

लेकिन हर क़व्वाल को सबसे पहले इसी दरगाह में गाना होता है. उसके बाद ही वो दुनिया के सामने अपने हुनर पेश करते हैं.

कैफ़ और सैफ़ की मां शुमैला ने कहा, "हमने कराची में अपना सबकुछ छोड़ दिया ताकि मेरे बच्चे अपना फ़र्ज़ निभा सकें और पहली बार इस दरबार में गा सके. इनकी क़व्वाली सुनने कई बड़े लोग आ रहे हैं. इस प्रदर्शन से मेरे बच्चों का भविष्य बन या बिगड़ सकता है."

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जबकि क़ैफ मोहम्मद ने कहा, "हम अपने घराने के आध्यात्मिक संगीत को सुनते हुए बड़े हुए हैं. ये गीत हमारे दिल को छू लेते हैं. मुझे पता है कि मैं गाने से पहले बाबा फ़रीद से मिन्नत करूंगा तो वो मुझे एक बड़ा स्टार ज़रूर बनाएंगे. "

क़व्वाली सुफ़ी संतों की गायन परंपरा है. शुरूआती दौर में क़व्वाली पंजाब के सुफ़ी संतों की दरगाहों में गाया जाता था. बाद में नुसरत फ़तेह अली ख़ान और साबरी बंधुओं जैसे बड़े क़व्वालों ने इसे धर्मनिरपेक्ष रूप दिया और इसका व्यवसायीकरण भी हुआ.

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