मज़ाक से भी बचो...ये मुंबई है

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पिछले कुछ महीनों में मुंबई में कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों का अलग-अलग कारणों से विरोध किया गया. इसीलिए कलाकारों को मुंबई में प्रस्तुति देने से पहले कई बातों का विशेष ध्यान रखना पड़ रहा है.

पिछले वर्ष दिसंबर में कॉमेडी ग्रुप 'एआईबी' द्वारा आयोजित 'नॉक आउट रोस्ट' विवादों से घिर गया और उसे माफ़ी भी मांगनी पड़ी थी.

कुछ महीने पहले नाट्यकर्मी कैज़ाद कोतवाल के एक नाटक 'एग्नेस ऑफ गॉड' का भी खासा विरोध किया गया.

पिछले महीने पाकिस्तानी गायक गुलाम अली के संगीत समारोह को आयोजकों ने विरोध के चलते रद्द कर दिया.

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मुंबई एवं दिल्ली में संगीत समारोह का आयोजन करने वाले भरत टंडन ने बीबीसी को बताया, "आयोजन के स्थल की अनुमति लेने के लिए भी हमें अपने कंटेंट की जांच करवानी पड़ती है. सभागृह के मालिक भी हमसे तरह-तरह के सवाल पूछते हैं जिनका उनसे कोई संबंध नहीं होता."

भरत बताते हैं की कलाकारों की कानूनी जांच करवाने के बाद भी हमें आयोजकों से जांच करवानी पड़ती है.

उन्होंने कहा, "आयोजक हमसे सभी कलाकारों की नागरिकता पूछते हैं, अगर कोइ भी कलाकार पाकिस्तान से हो तो वे अनुमति देने से साफ इनकार कर देते हैं."

भरत बताते हैं, "मैं कुछ वर्षो पहले गुलाम अली का कंसर्ट मुंबई मे करवा चुका हूँ तब इस तरह की कोई आपत्ति नहीं आती थी."

इतना ही नहीं उन्होंने आगे बताया, "अगर हम स्टैंड-अप कॉमेडी के कार्यक्रम को किसी खुले मैदान में करवा रहे हैं तो हमें कंटेंट में अश्लीलता नहीं रखने की सख्त हिदायत दी जाती है जबकि एक बंद सभागृह में इतना ध्यान नहीं दिया जाता."

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तकलीफ सिर्फ हास्य कलाकारों या संगीत कार्यक्रमों के आयोजकों को ही नहीं आती इसी तरह के नियम थिएटर कलाकारों पर भी लागू होते हैं.

मुंबई के थिएटर कलाकार कैज़ाद कोतवाल ने बीबीसी को बताया, "एग्नेस ऑफ गॉड नाटक के विरोध के बाद अब आयोजक हमसे हमारी पटकथा की जांच करवाते हैं."

कैज़ाद आगे बताते हैं, "वे हमें सख़्त हिदायत देते हैं कि हमारे नाटक में ऐसा कंटेंट ना हो जो सत्तारूढ़ पार्टी की छवि को बुरा प्रदर्शित करे, यहां तक कि किसी एसे दृश्य को भी हटवा देते हैं जिससे किसी विशेष समुदाय को ठेस पहुंचने की संभावनाए हो."

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एक स्टैंडअप कॉमेडियन ने नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी को बताया, "आज अभिव्यक्ति की आज़ादी ख़तरे में हैं, मुंबई में तो इवेंट करना मुश्किल है ही दिल्ली में भी कलाकार को आयोजकों के अलावा सरकारी दफ़्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं."

वो कहते हैं, "हांलाकि आज एक कॉमेडियन मज़ाक में देश के प्रधानमंत्री के ख़िलाफ भी बोल सकता है क्योंकि सब जानते हैं वह मज़ाक कर रहा है. लेकिन हमें आयोजक आजकल इस बात के लिए भी मना करने लगे हैं."

भरत टंडन का मानना हैं, "इन सख़्तियों की एक वजह यह भी है की आयोजकों पर पहले के मुक़ाबले राजनीतिक पार्टियों का दबाव बढ़ गया हैं."

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