'मुझे असहिष्णुता जैसा कुछ महसूस नहीं हुआ'

  • 30 नवंबर 2015
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'ढोंडू बेटा जस्ट चिल' ये डायलॉग सुनते ही हमारे सामने अभिनेता संजय मिश्रा का चेहरा आ जाता है.

'गोलमाल', 'धमाल' और 'ऑल द बेस्ट' जैसी फ़िल्मों में हास्य कलाकार के रूप में काम कर चुके अभिनेता संजय मिश्रा मार्च 2014 में आई फ़िल्म 'आँखों देखी' में हीरो भी रह चुके हैं.

संजय ने जहां चर्चित टीवी कार्यक्रम 'ऑफ़िस ऑफ़िस' में काम किया है वहीं हाल ही में आई निर्देशक नीरज घवण की फ़िल्म 'मसान' में रिचा चड्डा के पिता की भूमिका निभा कर उन्होंने फ़िल्म समीक्षकों को प्रभावित किया.

फ़िल्मों में अपनी हास्य छवि के लिए पहचाने जाने वाले संजय मिश्रा ने बीबीसी से ख़ास बातचीत में अपने व्यक्तित्व का एक अलग पहलू भी दिखाया.

संजय ने बताया, "सिनेमा से लगाव था, हालांकि पहले मैं कैमरामैन बनना चाहता था. उस लाईन का स्ट्रग्ल देख कर मैंने सोचा कि अभिनय ही करता हूं."

संजय अब शाहरुख़ ख़ान और काजोल की वापसी के लिए चर्चित फ़िल्म 'दिलवाले' में नज़र आएंगे.

वो इसे केवल संयोग मानते हैं कि फ़िल्म 'ज़मीन' के बाद फ़िल्म निर्देशक रोहित शेट्टी की हर फ़िल्म का वो हिस्सा रहे हैं.

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वो बताते हैं, "रोहित शेट्टी की फ़िल्म 'ऑल द बेस्ट' में 'ढोंडू बेटा जस्ट चिल..' का डायलॉग बोलने वाले किरदार रघुनंदन दास वकावले की डबिंग के बाद मैं रोने लगा और मैंने सोचा की मैं क्या कर रहा हूं?"

लेकिन इसके लिए संजय की न सिर्फ़ तारीफ़ हुई बल्कि इस किरदार ने उन्हें रोहित कैंप का लगभग परमानेन्ट हिस्सा बना दिया.

आजकल असिहष्णुता के मामले पर भी काफ़ी बात हो रही है. संजय कहते हैं," देखिए ये स्थिति जबरदस्ती बनाई जा रही है और कुछ लोग इस मुद्दे से राजनीतिक फ़ायदा उठाना चाहते हैं. मुझे असहिष्णुता जैसा कुछ भी महसूस नहीं होता."

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संजय का मानना है, "हमें रोटी, घर और रोज़गार जैसे मुद्दों पर बात करनी चाहिए और असहिष्णुता से ज़्यादा एकजुटता बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए."

मीडिया पर नाराज़गी जताते हुए संजय कहते हैं, "अगर आमिर ने भारत में रहने पर बात की तो ऐसा उन्होंने किस मकसद से कहा, यह जानना भी ज़रूरी है. बिना जाने ऐसा कवरेज दिखाना सही नहीं है."

संजय मिश्रा मूल रूप से बिहार के हैं और उन्होंने बिहार में शराबबंदी का विरोध करते हुए कहा, "ऐसा नहीं है कि शराब पी कर पूरा बिहार पागल हुआ पड़ा है. रोक लगाने के बाद भी लोग ज़्यादा पैसे दे कर शराब खरीद लेंगे."

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सेंसर बोर्ड को लेकर हो रहे चौतरफ़ा विरोध का संजय खुलकर बोर्ड का समर्थन तो नहीं करते लेकिन अपनी राय ज़रूर रखते हैं.

संजय कहते हैं,"फ़िल्मों में कुछ शब्दों के इस्तेमाल पर बैन लगा देने से लेखक की 'क्रिएटिविटी' पर असर पड़ता है लेकिन इससे देश नहीं सुधर सकता."

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