थोड़ा इतिहास, थोड़ी कल्पना, बाक़ी भंसाली

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बाजीराव मस्तानी

निर्देशक- संजय लीली भंसाली, अभिनेता - रणबीर सिंह, दीपिका पादुकोण, प्रियंका चौपड़ा

रेटिंग-****

क्या कहानी है! वाकई! हालांकि बहुत से सवाल उठाए जा सकते हैं.

एक कहानी जैसी सापेक्ष चीज़ को महान या बेकार कैसे कहा जा सकता है ख़ासकर जबकि वह 300 साल पुरानी दुनिया की बात करती हो?

पहली बात तो ये, कि आपने ये कहानी पहले नहीं सुनी. (कम से कम मैंने नहीं सुनी थी, और ना विकिपीडिया की कहानी पर ग़ौर नहीं करना चाहिए)

लेकिन जो इससे अहम हैं वो द्वंद् जो एक इतने बड़े कथानक के केंद्र में है कि उनकी अपील बरक़रार रहती है.

इस फिल्म में बहुत से छोटे बड़े कथानक हैं जिनसे आप रूबरू होते हैं, हालांकि कुछ पहलुओं को सिर्फ हल्के से छुआ ही गया है

पृष्ठभूमि में हैं - युद्ध के शाही और अद्भुत दृश्य - एक योद्धा पेशवा के नेतृत्व में हिंदू मराठों का स्पष्ट उदय.

इतिहास में मराठों के उदय और मुगलों का पतन का वक्त लगभग एक ही है.

मराठा समाज खुद सांप्रदायिक तौर पर काफी विभाजित दिखाई देता है ख़ासकर जाति पर, क्योंकि ये समाज ख़ानदानी ख़ून की विशुद्धता से अभिभूत है.

पेशवा जन्म से हिंदू ब्राह्मण है. लेकिन कर्म से क्षत्रिय. अपने साथ के ब्राहमणों, पुरोहितों, हिंदू समाज (या संस्कृति) के कथित संरक्षकों से पेशवा के बर्ताव के दौरान धर्म और राजनीति के अलग अलग होने पर हल्की बहस भी सामने आती है.

यही बहस आधुनिक धर्म निरपेक्षता का आधार भी है

धर्म की तरफ झुकाव को कमतर नहीं आंका जा सकता. यहां तक कि प्रधानमंत्री भी इन मामलों में असहाय नज़र आ सकता है.

मगर फिर भी, इन सभी मुनासिब अतंर्प्रवाहों के परे (जिनमें से ज्यादातर पर हो सकता है आप ध्यान ही ना दें), बाजीराव मस्तानी एक युवा, निर्भीक हिंदू सेनापति बाजीराव और पड़ोसी राज्य की जाति से आधी मुसलमान शूरवीर राजकुमारी की एक भावप्रवण प्रेमकहानी है

परंपरागत पौराणिक कहानियों की तर्ज़ पर ये एक अमर रोमांस है जिसमें डायलॉगबाज़ी और प्रतीकों का इस्तेमाल इतना सटीक है.

महल के भीतर चलने वाले वाली साज़िशों के बीच गढ़ी गई इस प्रेम कहानी को आप शेक्सपीयर की ट्रेजेडी के तौर पर भी देख सकते हैं.

हिंदी सिनेमा में ऐतिहासिक रोमांस पर केंद्रित फिल्मों में ये 'मुग़ले आज़म' (1960) के क़रीब है जितना कि कोई अौर फ़िल्म नहीं हो सकती.

फिल्म की स्क्रिप्ट मराठी लेखक नागनाथ इनामदार के ऐतिहासिक उपन्यास राव पर आधारित है.

क्या इससे कोई फ़र्क पड़ता है कि ये फिल्म आधा इतिहास है, आधी कल्पना और पूरी तरह से संजय लीला भंसाली की निरंकुश सौंदर्यपरक कल्पना?

फर्क नहीं पड़ता लेकिन अगर आप किसी और चीज़ की उम्मीद लगाए फिल्म देखने आए हैं तो फिर ये आपकी बदक़िस्मती है.

आप फ़िल्म से ख़ुद को थोड़ा अलग कर इस बात पर हैरान हो सकते हैं कि उस दुनिया को पर्दे पर रचने के लिए कितनी जेनरेटर वैन्स लगीं होंगी जिसमें बिजली नहीं होती थी.

या फिर उस बलुआपत्थर के हीरे जैसे शीशों से सजे भव्य कक्ष को डिज़ाइन करने में कितने लोगों की मेहनत लगी होगी.

आप उन लंबे गानों और नृत्य सीक्वेंस को विस्मित हो सकते हैं, जिनमें कहीं कहीं समकालीन संगीत की झलक दिखाई देती है जो हो सकता है 18वी सदी में रहा ही ना हो.

(मुझे ख़ासकर बाजीराव का लयात्मक सामरिक नृत्य बहुत पसंद आया - "दुश्मन की देखो जो वाट लावली".

लेकिन ये असंगत भव्यता क़तई काम नहीं आती अगर कथानक और अभिनय में दम ना होता तो.

अगर मुझे ठीक से याद है तो भंसाली ने 2002 में बाजीराव मस्तानी को सलमान ख़ान और ऐश्वर्य राय के साथ बनाने की घोषणा की थी.

तब से 13 साल बीत गए हैं. फिल्म की स्रोत सामग्री तो सार्वजनिक ही रही है. लेकिन उस पर तवज्जो देने की किसी ने ज़हमत नहीं की.

वो इसलिए कि ऐतिहासिक फिल्म बनाने के लिए भंसाली के अलावा किसी और निर्देशक पर प्रोड्यूसर अपने करोड़ों रुपए भरोसे के साथ नहीं लगा सकते थे.

भंसाली ने इस शिल्प में महारत हासिल कर ली है जो बॉलीवुड में एक बहुत परिष्कृत विधा नहीं रही है.

रणवीर सिंह बाजीराव की भूमिका में हैं और हर तरह से एक वीर और रणनीति में चतुर योद्धा लगते हैं.

उनका व्यक्तित्व हालांकि दृढ़ दिखता है लेकिन शाही से ज़्यादा खिलंदड़ नज़र आता है.

उनकी चाल एक तेज़ चलती हुई पेंगुइन की तरह है लेकिन किरदार फिर भी खुद को बहुत गंभीरता से नहीं लेता.

मुझे शक है कि पिछली पीढ़ी का कोई अभिनेता इस किरदार को कुछ बढ़ा चढ़ा कर पेश करता.

नसीरुद्दीन शाह, जिन्होंने लगभग सभी तरह के भारतीय समुदायों के किरदार निभाए हैं, उन्होंने मुझसे एक बार कहा था कि मराठी बोलने में जो खनक है उसकी नक़ल करना उन्हें सबसे ज्यादा मुश्किल लगता है.

रणबीर इस लहजे में बोलने की कोशिश करते हैं. कहीं कहीं उनका बोलने का तरीका 'नाना पाटेकर' जैसा लगने लगता है.

बाजीराव का विवाह काशी से हुआ है (प्रियंका चौपड़ा, जो खूबसूरत और ग्रामीण लगी हैं). वह बबाजीराव की ताक़त हैं.

बाजीराव अपनी दूसरी पत्नी मस्तानी से भी उतना ही (अगर ज़्यादा नहीं तो) प्रेम करते हैं. मस्तानी उन्हें 'प्रेरित' करती हैं.

दोनों नायिकाओं के बीच जो सूक्ष्म द्वंद् है, वो देखते ही बनता है

महज साठ साल पहले तक बहु विवाह की प्रथा हमारे यहां सामान्य बात थी. अब भी ये ग़ैरकानूनी नहीं है (भारत के सभी समुदायों के लिए).

मेरे बहुत से दोस्तों के दादा वग़ैरह के एक से ज्यादा बीवियां थीं.

एकस्त्री विवाह अभी हाल की ही प्रथा है. और प्रेम विवाह? ये तो अब भी कुछ ही घरों में हो रहा है.

इसलिए पीढ़ियों से, पुरुषों को एक स्त्री से ज्यादा स्त्रियों से प्रेम करने में कोई समस्या नहीं दिखाई देती.

लेकिन स्त्रियों के लिए ये कैसा होता होगा (खासकर अगर वे सभी एक ही पुरुष को चाहती हों, तो), ये जानना बहुत अजीब और हैरतअंगेज़ लगता है .

इसमें भी मिथक का पुट है. ये भी इस कहानी को पसंद करने की एक और वजह है.

तो फिर, क्या ये 158 मिनट की फिल्म ऐसी है कि 20 किलो का वज़न सात किलो के थैले में अटा दिया गया हो.

कभी कभी ऐसा लगता है. हर पल एक अहम मौका है. एक कथानक से दूसरे कथानक तक आप जल्दी जल्दी सफ़र करते हैं, शायद कहीं कहीं बेदम भी हो जाते हैं.

लेकिन आप उतना ही उससे खिंचाव भी महसूस करते हैं.

कुछ हफ्तों बाद मैं शायद ये फिल्म एक बार फिर देखूं ताकि उन सब चीज़ों को जज़्ब कर सकूं जो मुझसे पहली बार में छूट गई हों.

कहने का मतलब ये कि आप तो इसे पक्का एक बार देख ही सकते हैं.

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