एक म्यूज़िक स्टोर का बंद होना..

दक्षिण मुंबई में आज आप काला घोड़ा की तरफ़ जाएंगे, तो मुंबई की पहचान बन चुका रिदम हाउस बंद नज़र आएगा. अब जहांगीर आर्ट गैलरी का समोवर कैफ़े भी नहीं दिखता.

लेकिन रिदम हाउस सलमान रुश्दी के उपन्यास ‘ग्राउंड बिनीथ हर फ़ीट’ के पन्नों में अभी भी मौजूद है.

और बहुत सारे लोगों की यादों में भी, जो कभी वहां बेग़म अख़्तर का एलपी लेने या लियोनार्द कोहेन की सीडी या फिर साबरी ब्रदर्स के ऑडियो कसेट्स खरीदने पहुँचा करते थे.

रिदम हाउस में वो सब मिल सकता था, जो और कहीं न मिल पा रहा हो और अगर रिदम हाउस में नहीं, फिर तो मुश्किल ही था.

किसी भी शॉपिंग मॉल से बिलकुल अलग यहां पुराने तरह के सेल्समैन दिखते थे, जो न सिर्फ़ पुरानी अलबमें आपके लिए ढूंढ निकालते थे बल्कि आपके साथ संगीत पर ठीक-ठाक बात भी करते थे.

आकार पटेल मुंबई में कई साल रहे और रिदम हाउस उनके बचपन की यादों का अहम हिस्सा है.

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पटेल बताते हैं, "मेरे पिता के पास रिकार्ड्स, एलपी और छोटे 45 आरपीएम का बड़ा कलेक्शन था. वे उन्हें पीले मुलायम कपड़े से बेहद प्यार से साफ़ करते थे. 2006 में सूरत शहर में बाढ़ आई, तो वे रिकॉर्ड भी ख़त्म हो गए."

पटेल कहते हैं, "मेरे पिताजी रिदम हाउस के बहुत बड़े फ़ैन रहे हैं. मुझे याद है कि 70 के दशक में रविवार के दिन हम ‘रिदम हाउस’ जाते. वहां संगीत सुनने के लिए बूथ हुआ करते थे. कई लोग वहां सिर्फ़ इन बूथ्स की वजह से आते थे. लेकिन स्टोर के मालिकों को कोई दिक़्क़त नहीं थी. वहां का स्टाफ़ संगीत के बारे में काफ़ी कुछ जानता था और ग्राहक उनसे सुझाव भी लेते थे."

संगीत के बदलते माध्यमों के बारे में आकार का कहना है, "संगीत आज भी सुना जाता है. हां, अब वह कलेक्शन की बात नहीं रही, जब रिकॉर्ड्स के रंग-बिरंगे कवर हुआ करते थे. कलाकार की तस्वीरें हुआ करती थीं. और वो ज़रूरी भी नहीं रहे क्योंकि माध्यम बदल चुके हैं."

पिछले हफ़्ते जब मैं वहां गई, तो बड़ा अनमना सा माहौल था. दरवाज़े पर गुडबाय सेल का पोस्टर लगा था और अंदर भारी डिस्काउंट के ऐलान. सिर्फ़ डूबते टाइटैनिक का मर्सिया ही नहीं बज रहा था, पर माहौल कुछ वैसा ही था.

बॉलीवुड और ग़ज़लों के शेल्फ़ खाली थे. कुछ बची-खुची सीडी जिन शेल्फ़ों पर अभी भी थीं, उनके नाम हिंदुस्तानी क्लासिकल, जैज़ एंड ब्लूज़, रॉक एंड पॉप थे. कुछ फिल्मों की डीवीडी भी.

एक कोने में शेल्फ़ पर रखे जाने वाले सेक्शन बोर्ड्स के ढेर पड़े थे.

वह सिर्फ़ एक दुकान नहीं थी. वह एक चश्मदीद गवाह थी- संगीत में आते बदलावों की. एलपी से कसेट्स और फिर सीडी में बदलते बाज़ार की.

अब आप अपना पसंदीदा संगीत अपने मोबाइल की किसी ऐप पर सुन रहे हैं.

टेक्नोलॉजी ने संगीत बदला और दुनिया में रिदम हाउस जैसे अड्डों को लोकप्रिय बनाया और अब जब शटर गिर रहे हैं, तो शायद टेक्नोलॉजी के कारण ही.

थोड़ी देर तो मैं उस माहौल को जज़्ब करने की कोशिश करती रही.

दुकान मालिक और सेल्समैन बात करने को तैयार नहीं थे. वो ख़ुद उदास, अनमने और चिड़चिड़े लग रहे थे लेकिन 18 साल से वहां काम कर रहे अतीक़ ने मुझसे बात की.

"आते तो यहां रोज़ी के लिए हैं, पर जो सुकून यहां मिलता है, वैसा कहीं और नहीं मिलता. संगीत के माहौल में हर दिक़्क़त भूल जाते हैं. टेक्नोलॉजी की वजह से लोग संगीत डाउनलोड करने लगे हैं और स्टोर में कम आते हैं. ऐसे हालात में स्टोर बंद करना ही शायद एकमात्र रास्ता बचा है."

अतीक़ की राय में ‘रिदम हाउस’ पांच साल पहले ही बंद हो गया होता. लेकिन कई कोशिशों के बावजूद आख़िरकार स्टोर को टेक्नोलॉजी के सामने घुटने टेकने ही पड़े.

रिदम हाउस संगीत और संगीतकारों दोनों के लिए अनूठी विरासत रहा है. ऐसा स्टोर न कोई था, न अब कभी होगा. वैसे भी टेक्नोलॉजी की वजह से ऐसी कई जगहें पहले ही दम तोड़ चुकी हैं.

अतीक़ का परिवार भी छोटा नहीं. उन्हें नहीं पता कि सेल्सपर्सन होने का 18 साल का तजुर्बा और संगीत की उनकी समझ उनके किसी काम आएगी भी या नहीं.

अतीक़ के मुताबिक, "यहां काम करने वाले हम सब जैसे डॉक्टर्स हैं, जो अलग-अलग तरीक़े के संगीत को समझते हैं. कोई जैज़ का डॉक्टर है तो कोई भक्ति संगीत का. मैं शास्त्रीय संगीत का विभाग देखता हूँ."

"मुझे समझ है कि किस घराने का कौन उस्ताद है या कौन कैसी शैली में गाता है. पढ़ा तो मैं 10वीं तक ही हूँ, लेकिन यह जगह मेरे लिए संगीत की कॉलेज-यूनिवर्सिटी से कम नहीं. यह ऐसी नौकरी है, जहां ओवरटाइम करने में भी हमें दिक़्क़त नहीं है."

उन्होंने कहा, "स्टोर बंद होने की ख़बर सुनने वाले कई ग्राहकों की आंखों में मैंने आँसू देखे हैं. आज भी एक महिला आई थी, जिन्होंने बताया कि कैसे उनकी नानी और मां यहां आया करती थीं."

जिन लोगों को रिदम हाउस बंद होने का अफ़सोस है, उनमें पंडित हरिप्रसाद चौरसिया और शंकर महादेवन भी हैं.

"स्टोर में जाने-माने लोग आते रहे हैं. यहां मेरा पहला साल था और अचानक स्टोर में फ़िल्म स्टार धर्मेंद्र आए. मेरे दिल की धड़कनें बढ़ गईं. उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा और स्टोर में घूमे. पहली बार मैंने किसी सेलेब्रिटी को इतना क़रीब से देखा था. फिर इतने सालों में संजय खान, विद्या सिन्हा, मौसमी चटर्जी, रणबीर कपूर, संजय लीला भंसाली को मैंने यहां देखा है.”

‘रिदम हाउस’ में किशोर कुमार, नरगिस, शम्मी कपूर, धर्मेंद्र और आज की पीढ़ी के ऋतिक रोशन जैसे फ़िल्मी जगत की हस्तियों से लेकर पंडित शिवकुमार शर्मा, उस्ताद ज़ाकिर हुसैन, पंडित रविशंकर, उस्ताद विलायत ख़ान जैसे भारतीय शास्त्रीय संगीत से जुड़े दिग्गजों का आना-जाना लगा रहा.

अतीक़ के मुताबिक़ पांच साल पहले ‘रिदम हाउस’ में एक दिन की बिलिंग चार-साढ़े चार लाख तक होती थी जो हर साल कम होती गई.

पिछले साल से यह आंकड़ा घटकर रोज़ के एक-सवा लाख तक हो गया था. जब से स्टोर बंद होने की ख़बर आई, लोग आने लगे लेकिन अब देर हो चुकी है. काफ़ी माल वापस भेज दिया गया है और जो है उसे डिस्काउंट में बेचा जा रहा है.

पहले लोग यहां के म्यूज़िक बूथ में सिर्फ़ संगीत सुनने आते थे. बदलते समय के साथ उनका आना भी कम हो गया.

अतीक़ ने बताया, "ऐसे हालात में भी मालिकों ने कभी किसी को नौकरी से नहीं निकाला. कुछ़ स्टाफ़ अब ऑनलाइन स्टोर के लिए काम कर रहा है."

जब तक स्टोर में स्टॉक रहेगा, वह चलेगा. अतीक़ की मानें तो यह बस दो महीने का माजरा है.

टेक्नॉलॉजी के सामने टिके रहने के लिए रिदम हाउस ने भी अपना ऐप बनाया था लेकिन वह भी कुछ ख़ास चला नहीं.

रिदम हाउस का बंद होना अपने आप में अकेला वाकया नहीं. पूरी दुनिया में संगीत का बाज़ार बदल रहा है. इसका निशाना रिदम हाउस भी बना है.

'प्लैनेट एम' की चेन जब शुरू हुई थी, तब लगता था संगीत की दुनिया में बहुत बड़ा बदलाव आएगा. लेकिन हालात के चलते 'टाइम्स ग्रुप' ने इन्हें वीडियोकॉन को बेच दिया.

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आज 'प्लैनेट एम' के स्टोर्स 'वीडीयोकॉन' के नैक्स्ट स्टोर का हिस्सा हैं, और वहां कुछ लोकप्रिय संगीत-फ़िल्मों के डीवीडी के साथ खिलौने, कंप्यूटर गेम्स जैसी चीज़ें बिकती हैं.

मुंबई और दूसरे शहरों के ज़्यादातर स्टैंड अलोन म्यूज़िक स्टोर बंद हो चुके हैं.

2013 में आरपी-संजीव गोयनका ग्रुप के संगीत के रिटेल बिज़नेस बंद करने के निर्णय के चलते ‘म्यूज़िक वर्ल्ड’ के सारे आउटलेट्स बंद हो गए. इनमें कोलकाता पार्क स्ट्रीट का सबसे बड़ा आउटलेट भी शामिल था.

2009 में न्यूयॉर्क के टाइम्स स्क्वेयर का 'वर्जिन मेगास्टोर' बंद किया गया. वह दुनिया का सबसे बड़ा म्यूज़िक स्टोर था.

उसके बंद होने के बाद लंदन स्थित ऑक्सफ़र्ड स्ट्रीट के 'एचएमवी म्यूज़िक' स्टोर की बारी आई. यह स्टोर 30 साल से मौजूद था और 60,000 स्क्वेयर फ़ीट में फैले इस स्टोर को 2012 में बंद कर दिया गया.

अब वह ऑक्सफ़र्ड स्ट्रीट में एक छोटा सा स्टोर बनकर रह गया है.

न्यूयॉर्क की ‘फ़्रैंक म्यूज़िक कंपनी’ ने भी अपना स्टोर बंद कर दिया है. यह सीडी, डीवीडीज़ या एलपी बेचने वाला स्टोर नहीं था. यहां बीथोवन और बाख़ जैसे दिग्गजों के क्लासिकल म्यूज़िक कंपोज़िशंस की शीट्स मिला करती थीं.

1937 में शुरू हुए इस स्टोर से नोट्स खरीदकर सिंफ़नी सीखने वाले कम होते गए क्योंकि अब वह ऑनलाइन पर मिल जाते हैं या वो वेबसाइट से डाउनलोड कर लेते हैं.

ऐसा ही हाल फ़िंडले ओहायो के 60 साल से चल रहे ‘ग्रोमेन्स म्यूज़िक’ का हुआ. यहां शीट म्यूज़िक और पियानो बिकते थे. यहां संगीत भी सिखाया जाता था और छोटे कार्यक्रम भी होते थे.

उनके लिए ऑनलाइन से भी बड़ी दिक़्क़त है ऐसे माता-पिता, जो बच्चों को संगीत से ज़्यादा खेलकूद के लिए प्रोत्साहित करते हैं.

90 के दशक के मध्य में एमपी-3 पॉपुलर होने लगीं. उन्हीं दिनों कंप्यूटर से हमारी दोस्ती बढ़ रही थी और ऑनलाइन एमपी-3 से मिलता मुफ़्त का संगीत हमें बेहद पसंद था.

उसी समय म्यूज़िक फ़ाइल्स के ऐसे फ़ॉर्मेट आए, जिन्हें कंप्यूटर पर सुनाना या अपने कंप्यूटर पर डाउनलोड करना बेहद आसान था.

सोनी, फ़िलिप्स, सैमसंग जैसी कंपनियों ने वॉकमैन से भी छोटे एमपी-3 प्लेयर्स लॉन्च किए. उन दिनों मिलने वाले एमपी-3 प्लेयर्स में 800-1000 गाने डाउनलोड हो सकते थे. संगीत प्रेमियों के लिए यह बड़ा आकर्षण था.

छोटे से डिवाइस के ज़रिए वो अपना पसंदीदा संगीत कहीं भी सुन लेते. एक से ज़्यादा सीडी या बड़े वायर्स साथ रखने के झंझट से भी वो बच रहे थे.

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2000 के दशक में स्टीव जॉब्स आई-ट्यून्स लेकर आए और बड़े बदलाव की शुरुआत हो गई.

जॉब्स जब म्यूज़िक कंपनियों के साथ कोई सौदा न कर पाए, तब उन्होंने कलाकारों से सीधे संगीत खरीदना शुरू कर दिया. जिसके मुताबिक़ अगर आपके पास 'एप्पल' का कोई भी प्रॉडक्ट है, तो आप अपनी पसंद का संगीत आई-ट्यून्स से ख़रीद सकते हैं.

समय के साथ यह ट्रेंड भारत में भी लोकप्रिय हो गया. 15 रूपए में अपनी पसंद का एक गाना मिलना या 120 रुपए में पूरा एल्बम मिलना लोगों को म्यूज़िक स्टोर जाने से ज़्यादा आकर्षित लगने लगा.

स्पर्धा में आगे रहने के लिए वोडाफ़ोन, एयरटेल सर्विस प्रोवाइडर्स ने अपने ग्राहकों को कम क़ीमत पर म्यूज़िक डाउनलोड करने की सर्विस देना शुरू कर दिया.

‘गाना’ और ‘सावन’ जैसे कई ऐप्स हैं, जिससे फ़ोन पर मुफ़्त म्यूज़िक स्ट्रीमिंग हो सकती है.

सोनी जैसे ब्रांड के फ़ोन में संगीत का प्री-इन्स्टॉल्ड ऐप आता है.

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एपल म्यूज़िक ऐसा माध्यम है, जो अपने ग्राहकों की पसंद को ध्यान में रखकर कस्टमाइज़्ड संगीत ऑफ़र करता है.

संगीत का डिजिटलाइज़ेशन म्यूज़िक स्टोर्स बंद होने का मुख्य कारण बना. स्टोर बंद ज़रूर हुए, लेकिन संगीत थमा नहीं.

छोटे कलाकार अपनी रचनाओं को ऑनलाइन लॉन्च करने लगे, तो बड़े कलाकारों ने भी ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचने के लिए ऑनलाइन माध्यम का सहारा लिया.

अब यूं है कि दुनिया के दो अलग कोनों में बैठे दो कलाकार एक-साथ मिलाकर कुछ नया रच लेते हैं और ऑनलाइन उन्हें अपने काम की प्रतिक्रिया भी मिलने लगती है.

संगीत का डिजिटल होना एक बड़े बदलाव का उदाहरण है.

हमने कुछ ऐसे लोगों से बात की, जो किसी तरीक़े से या तो संगीत से जुड़े हैं या संगीत से उनका गहरा लगाव है. हमने उनसे जाना कि संगीत के डिजिटलाइज़ेशन के बारे में वो क्या मानते हैं.

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दिल्ली की प्रतिष्ठित शास्त्रीय गायिका विद्या शाह बताती हैं, "हमारी सोच से जल्द ही टेक्नोलॉजी हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुकी है. संगीत हमारे समाज का अंश है और बदलाव से वह भी प्रभावित होता है. अच्छी बात है, अब आप हर तरीक़े का संगीत आसानी से सुन सकते हैं."

"अगर मैं कोई शास्त्रीय कंपोज़िशन की रचना कर रही हूँ और मैं कोई लोकसंगीत या अन्य शैली उसमें मिलाना चाहती हूँ, तो टेक्नोलॉजी के ज़रिए वो खोज मेरे लिए सरल हो जाएगी. डिजिटल माध्यम से मुझे कोई परहेज़ नहीं है. लेकिन एक चिंता है कि कहीं लोग लाइव कार्यक्रमों में जाना कम न कर दें. कार्यक्रम कम नहीं हुए लेकिन संगीत के आसान स्रोतों का होना यह चिंता देता है. दौड़ती-भागती ज़िंदगी में कार्यक्रम में लोग जाना छोड़कर अपने आप से ऑनलाइन संगीत सुनने लगेंगे, तो ठीक नहीं होगा."

म्यूज़िक स्टोर बंद होने के बारे में वे कहती हैं, "ऐसा तो स्टोर में ही हो सकता है कि आप ढूंढ कुछ रहे हों और आपको कुछ बेहतर मिल जाए, या कोई पुराना रिकॉर्ड मिल जाए. ख़ुद के एल्बम शैल्फ़ में देखने का आनंद ऑनलाइन नहीं मिल सकता. डाउनलोडिंग में संगीत की गुणवत्ता की फ़िक्र रहती है. टेक्नोलॉजी में ‘ओल्ड वर्ल्ड चार्म’ नहीं मिलेगा. हां, लेकिन जब मेरा 16 साल का बेटा अपने आयपॉड पर किशोर कुमार, विलायत ख़ान और एडेल को भी सुनता है, तब पता चलता है कि संगीत नहीं रुकता."

मुंबई में नेशनल सेंटर फ़ोर परफ़ॉर्मिंग आर्ट्स के भारतीय संगीत विभाग की हैड डॉ. सुवर्णलता राव दो दशक से भी ज़्यादा समय से वहां काम कर रही हैं.

परिवर्तन को सहज बताते हुए उन्होंने कहा, "हमें समझना चाहिए कि हर पहलू की एक मर्यादा होती है. हम हमेशा जो नहीं रहा, या चला जा रहा है उसी के बारे में बात करते हैं. नए को हम स्वीकृति देने में विलंब करते हैं. लेकिन यह देखना ज़रूरी है कि संगीत की जड़ें हम सोच रहे हैं, उससे बहुत ज्यादा दृढ़ हैं. हमें पसंद हो-न हो, बदलाव होकर ही रहेगा. ऐसे में बदलाव की अच्छी बातों पर ध्यान देना चाहिए."

टेक्नोलॉजी के बारे में वह मानती हैं, “टेक्नोलॉजी बुरी नहीं हो सकती. हम उसका कैसे उपयोग करते हैं उसी पर सब निर्भर है. लोग टेक्नोलॉजी के माध्यम से संगीत सुन रहे हैं, वह अच्छी बात है. बदलते समय के साथ चलने से आप ख़ुद को कैसे रोक सकेंगे. ‘रिदम हाउस’ एक अहम स्टोर ज़रूर रहा है लेकिन परिवर्तन तो होना ही है. मेरी दादी जिस तरह रसोई में काम करती थी, वही काम मैं अलग तरीक़े से करती हूँ, लेकिन उसमें कुछ ग़लत नहीं हो रहा है. यही संसार का नियम रहा है.”

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अहमदबाद के आर्किटेक्ट रबीन्द्र वसावडा मानते हैं, “संगीत के हम तक पहुँचने के ज़रिए बदल चुके हैं. रिकॉर्ड से कसैट्स, फ़िर सीडी और अब डिजिटल संगीत. लेकिन यह इवॉल्यूशन का हिस्सा है. हम रियल से वर्चुअल का सफ़र तय कर चुके हैं. प्राकृतिक ध्वनि में कोई मिलावट न हो और संगीत का संवाद चलता रहे तो फ़िक्र की कोई बात नहीं. डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ध्वनि का मूल रूप खो जाने की चिंता रहती है.”

रिदम हाउस के बारे में वह बताते हैं, “यह स्टोर रिकॉर्डिंग के ज़रिए संगीत बांटने की ऐतिहासिक जगह रहा है. वह यादों में बरक़रार रहना चाहिए. यह जानना ज़रूरी है कि स्मृति के द्वारा ही अगली पीढ़ी तक परंपरा या विरासत के विचार पहुँचते हैं. यही, समाज में सांस्कृतिक प्रवाह के लिए भी आवश्यक है.”

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अग्नि बैंड के लीड सिंगर मोहन कन्नन को लगता है कि लोग संगीत से कभी अलग नहीं होंगे, "संगीत हमेशा से हमारी ज़िंदगी का हिस्सा रहा है और आगे भी रहेगा. संगीत सुनने के तरीक़े बदलते रहे हैं. आज अगर हम गाना ढूंढते हैं, तो सबसे पहले यूट्यूब पर जाएंगे. लाइव परफॉर्मेंस देखने के लिए लोग आज भी पागल हुए जाते हैं. लोग संगीत खरीदने स्टोर में जाना छोड़ देंगे लेकिन कलाकार को स्टेज पर देखने की इच्छा नहीं रोक पाएंगे क्योंकि वह अहसास ऑनलाइन नहीं मिल सकता."

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रोलिंगस्टोन इंडिया पत्रिका की पूर्व संपादक ललिता सुहासिनी का नज़रिया इस बदलाव पर सकारात्मक है. “रोलिंगस्टोन की ऑनलाइन एडिशन हार्डकॉपी (प्रिंट) से ज़्यादा रुचिकर बनी है. मैं आंकड़े तो नहीं बता पाऊंगी, लेकिन इतना ज़रूर कहूंगी कि ऑनलाइन के ज़रिए हम ज़्यादा लोगों से जुड़ पाए. प्रिंट की मर्यादाएं ऑनलाइन में अवरोध नहीं बनतीं. ऑनलाइन में आर्टिकल के साथ कलाकार का यू-ट्यूब वीडियो होता है या उसके परफॉर्मेंस का कोई लिंक, जो प्रिंट में मुमकिन ही नहीं है.''

संगीत के मामले में भी कुछ ऐसा ही कहा जा सकता है. टेक्नोलॉजी में आए बदलाव के चलते अगर कोई पुरानी कड़ी टूट रही है, तो हर क़दम पर नए रिश्ते भी बंध रहे हैं."

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पार्श्व गायिका रेखा भारद्वाज मानती हैं, "संगीत का लोगों तक पहुंचना ज़रूरी है, चाहे कोई भी माध्यम हो. टेक्नोलॉजी की वजह से संगीत की सीमा, उसके दायरे बढ़े हैं, जो अच्छी बात ही है."

टेक्नोलॉजी आने से संगीत और सुगम हो गया है. हमारी ज़िंदगियों के और क़रीब. बाथरूम से लेकर बग़ीचों में दौड़ते और ट्रेन-बसों में सफ़र करने तक.

म्यूज़िक स्टोर्स का बंद होना किसी एक पीढ़ी के लिए अपनी ज़िंदगी की किताब का पन्ना निकाल बाहर करने जैसा हो सकता है लेकिन कहानी यहां ख़त्म होने वाली नहीं.

‘रिदम हाउस’ इतिहास के पन्नों पर मील का पत्थर बना रहेगा. आकार पटेल जैसे बहुतेरे लोग जब भी संगीत की बात करेंगे, उसमें इस तरह की दुकानों की भूमिका भी होगी और योगदान भी.

उन एंटीक रिकार्ड प्लेयर या पुराने टाइप राइटरों की तरह, जिनका अब कोई इस्तेमाल भले न हो, पर वो उन गवाहियों के सुबूत हैं, जिसके ज़रिए संगीत ने कोलंबस की तरह नई ज़मीनें तलाशीं और लोगों का दिल जीत लिया.

क्या ऐसा 10 साल पहले मुमकिन था कि यू-ट्यूब पाकिस्तान में बैन होने के बावजूद कोक स्टूडियो पाकिस्तान दुनियाभर में देखा-सुना जाता है और उसे पसंद करने वालों की संख्या भारत के कोक स्टूडियो से कहीं ज़्यादा है.

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स्टोर बंद होने से संगीत की ज़मीन भले छोटी हो गई है, लेकिन आसमान बड़ा ही हो रहा है. इंग्लिश संगीतकार ब्रायन इनो के शब्द संगीत के बदलते माध्यमों पर भी लागू हो सकते हैं, "मुझे संगीत में शाश्वतता पसंद है लेकिन शाश्वत पुनरावर्तन नहीं. मैं चाहता हूं वह हमेशा बदलता रहे."

रिदम हाउस इसलिए भी बंद हो रहा है क्योंकि संगीत ने अपना रास्ता बदला, अपना जादू नहीं.

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