मुंबई में छिपा हुआ है 'छोटा जापान'

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मुंबई के वर्ली में जब आप जापानी मंदिर में घुसकर फ़ोटो खींचने की कोशिश करते हैं तो एक बुज़ुर्ग महिला आपको हिदायत देती हैं.

ये हैं जापानी मंदिर के साथ ही कब्रिस्तान की देखरेख करने वाली यशोदा ढाले, जो कहती हैं, "तस्वीरें लेने से पहले गुरुजी से पूछ लेना, नहीं तो वह गुस्सा करेंगे."

इस इलाके में रोज़ाना हज़ारों लोगों का आना जाना होता है लेकिन वहां स्थित छोटे से जापानी मंदिर और कब्रिस्तान के बारे में अक्सर लोगों को पता ही नहीं चलता है.

मुंबई में इकलौता और शायद भारत में अपनी तरह का अकेला जापानी मंदिर और कब्रिस्तान साल 1908 से मुंबई में है. ये जापानी परंपराओं के अनुसार चलाया जाता है.

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वैसे तो इस मंदिर की देखरेख ढाले परिवार के हाथ में है और अपने पति राजाराम ढाले की मौत के बाद यशोदा ढाले इसकी देखरेख करती हैं.

लेकिन मंदिर और कब्रिस्तान का संचालन करते हैं जापानी नागरिक और बौद्ध भिक्षु टी मोरिता.

65 वर्षीय मोरिता 1976 में जापान से भारत आए थे और आज भी वो ‘निप्पोजन म्योहोजी’ मंदिर में जापानी रीति रिवाजो से पूजा-प्रार्थना करते हैं.

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वो कहते हैं, "मैं 1970 में भारत आया था और कुछ समय भारत के विभिन्न हिस्सों में बिताने के बाद मुझे जापानी व्यावसायियों की संस्था द्वारा यहां नियुक्त कर दिया गया. मैं 1976 से यहां हूं.”

जापानी दूतावास के आंकड़ो के अनुसार देश भर में कुल 8,313 और मुंबई में लगभग 600 की सीमित संख्या में जापानी लोग रहते हैं.

भारत में रहने वाले जापानी और वहां से आने वाले पर्यटक जापानी मंदिर और कब्रिस्तान ‘निप्पोजन म्योहोजी’ के दर्शन के लिए आते हैं.

मोरिता कहते हैं, "अब यहाँ लोग मात्र दर्शन को आते हैं लेकिन मुर्दों को यहाँ दफ़न नहीं किया जाता क्योंकि जापानी परिवार वालों के पार्थिव शरीर को वापिस जापान ले जाते हैं."

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इसके इतिहास के बारे में वो बताते हैं, "करीब डेढ़ सौ वर्ष पूर्व जापानी व्यावसायी यहाँ कपास का व्यापार करने आते थे और उनके साथ आने वाली ‘औरतों' के लिए इस कब्रिस्तान का निर्माण किया गया था."

यह 'औरतें' जापान की मशहूर ‘गीशा’ थीं जिन्हें नाचने, दिल बहलाने के लिए ग़ुलामों या फिर वेश्याओं की तरह इस्तेमाल किया जाता है.

हालांकि मोरिता कहते हैं, "मानव समाज में ऐसी औरतों को सम्मान मिलना हर धर्म और देश में हमेशा से ही मुश्किल रहा है. लेकिन गीशा को मैं वेश्या नहीं अदाकारा कहूंगा क्योंकि जापानी भाषा में 'गीशा' का अर्थ कलाकार होता है."

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मंदिर में जापानी अक्षरों से खुदे दो स्तंभों की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा, "1973 में श्रद्धा स्तंभों की स्थापना की गई. बाईं ओर जो स्तंभ है उसपर रखे दो बड़े पत्थरों को हटाकर, सीढ़ियों के रास्ते नीचे पानी तक उतरा जा सकता है."

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दाईं ओर के स्तंभ पर लिखा मंत्र 'नाम-म्योहो-रेंगे-क्यो' है, जो जापानी मान्यता के अनुसार सृष्टि का मूल आधार है.

मोरिता भारत में उठ रहे असहिष्णुता जैसे मुद्दों पर कहते हैं, "हर धर्म, निरपेक्ष होता है. आपसी दीवार इंसानों ने बनाए हैं, धर्म ने नहीं. हम जैसे बौद्धधर्मी मानते हैं कि विश्व में उठ रही हर समस्या का समाधान भारतीय संस्कृति में ही है."

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हालांकि यह एक विदेशी मंदिर है लेकिन इसके आस पास कोई ख़ास सुरक्षा नहीं है. यहां की सुरक्षा-व्यवस्था को लेकर मोरिता चिंतित भी नहीं हैं, “मुझे याद है मुंबई में सबसे ख़राब महौल 1992 के सांप्रदायिक दंगों में था लेकिन तब भी किसी हमलावर ने यहां का रुख नहीं किया.”

अंत में यह पूछे जाने पर कि वह खुद को भारतीय मानते हैं या जापानी, वह हंसते हुए बीबीसी के कैमरा का उदाहरण देते हुए कहते हैं, "मैं इस कैमरा (जापानी ब्रांड) की तरह हूँ, जापान का नागरिक लेकिन कर्मभूमि भारत."

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