घायल वन्स अगेनः90 की यादों का अपग्रेडेड संस्करण

फिल्मः घायल वन्स अगेन

निर्देशकः सनी दिओल

अभिनेताः सनी दिओल, नरेंद्र झा

रेटिंगः **

"भगवान अजय मेहरा को लंबी उम्र दे" (ताकि वो और महिलाओं को बचा सके), "काश अजय मेहरा दिल्ली में होता"(ताकि वो महिलाओं की हिफ़ाज़त कर पाता),"कोई अजय मेहरा को नहीं बताएगा!"(वरना वो हमें एक्सपोज़ कर देगा और हम मुश्किल में पड़ जाएंगे).

अब तक तो आपको पता चल चुका होगा कि मैं फिल्म के हीरो या यूं कहें कि सुपर हीरो की बात कर रहा हूं. लेकिन सुपर हीरो के साथ एक खास बात होती है.

अक्सर उनकी एक समांतर शख्सियत होती है, जो पता नहीं क्यों अक्सर एक पत्रकार की होती है- जैसा कि पीटर पार्कर है (स्पाइडरमैन की इंसानी शख्सियत), जो 'डेली बिगुल' के लिए काम करता है या क्लार्क कैंट (सुपरमैन का सामन्य व्यक्तित्व), जो 'डेली प्लेनेट' में काम करता है.

वहीं अजय मेहरा अपने स्वाभाविक फौलादी अवतार में है जो कि पूरी तरह एक खोजी पत्रकार है. ये पत्रकार दुनिया को बचाने चला है या कम से कम महिलाओं को तो बचाने निकला ही है.

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वो किस तरह की पत्रकारिता करता है? पता नहीं चल पाता. दरअसल पता चल जाता है, चूंकि ये सनी दिओल की फिल्म है और ज़ाहिर है आप उनसे ये उम्मीद नहीं कर सकते कि वो एक छोटे से केबिन में बैठ कर कीबोर्ड पर उंगलियां नचाते हुए किसी इंटरव्यू की कॉपी बनाएंगे. ये तो बड़ी भारी बरबादी होगी.

अजय एक अखबार निकालता है. लेकिन हर न्यूज़ स्टेशन में राष्ट्रीय खबर तो वही बनता है- सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ घूमते हुए, किसी कारोबारी के दफ्तर में धावा बोलते हुए, उसका अपहरण करके, शायद बाद में उसे ये मानने के बाद छोड़ कर कि किसी पुलिस वाले की बेटी का बलात्कार उसी ने किया था.

ये फिर भी कम महत्वपूर्ण है. मैं आपको भरोसा दिलाता हूं कि दांव इससे कहीं बड़ी बात पर है.

ऐसे वक्त में जब भारतीय मीडिया कॉरपोरेट मालिकों के मुद्दों पर उठे विवादों से घिरा हुआ है, अजय कुछ ऐसा करता है जिससे अर्णब भी शरमा जाए.

वो रिलाएंस के मुकेश अंबानी से सीधा भिड़ता है- लगभग शब्दशः. इस फिल्म के खलनायक का राजनीति , मीडिया और अफसरशाही में ज़बरदस्त दबदबा है.

उसका नाम है बंसल और वो मुंबई के एक भव्य बंगले में रहता है जो कि बेशक 'अंतिला' (अंबानी परिवार के विशाल बंगले का नाम) है.

दूसरी पीढ़ी के कारोबारी बंसल (नरेंद्र झा, जो कि एक बढ़िया अभिनेता हैं) बूढ़ी मां के साथ रहते हैं उनका एक बहुत ही सिरचढ़ा बेटा है, जो विदेश में पढ़ा लिखा है, गु्स्सैल है और एक आरटीआई कार्यकर्ता की हत्या कर चुका है.

कुछ बच्चों के पास इसका वीडियो की शक्ल में सबूत भी है. उन्हें अजय तक ये सबूत पहुंचाना है.

ये इस फिल्म की एक लाइन में कहानी है जो कि पीछा करने वाली लंबी सीक्वेंस के चारों ओर बुनी गई है. और ये सीक्वेंस ट्रेनों, मॉल्स और गलियों के बीच शूट की गई है.

और 'अंतिला'. अगर किसी दर्शक के मन में कोई शंका हो तो बंसल सीनियर एक कार दुर्घटना का ज़िक्र भी करते हैं. एक हार्ड ड्राइव में रखा गया ये वीडियो रिलाएंस के एक स्टोर में छिपा कर रखा गया है.

और मुझे अभी ये एहसास हुआ कि फिल्म को रिलाएंस एंटरटेनमेंट ने ही रिलीज़ किया है. ये हो क्या रहा है?

ज़ाहिर है, काफी कुछ. पहली बात तो ये कि अन्य फिल्मों के विपरीत जो सीक्वल को एक ब्रांड की तरह इस्तेमाल करती हैं, ये फिल्म वाकई 1990 में रिलीज़ हुई घायल का दूसरा हिस्सा है.

पहली घायल का ओमपुरी का पुलिस वाला किरदार इस फिल्म में आरटीआई कार्यकर्ता है.

नायक, जो अपने पूरे परिवार को खो चुका है, वो लगभग ढाई दशक पहले की अपनी ज़िंदगी के अक्स देखता है, जब उसने 'बलवंत के कुत्तों' का सामना किया था .

जी हां, वो एक बिल्कुल दूसरा वक्त था. मैं अब इतना बड़ा हो चुका हूं कि कह सकूं कि मैं तब बच्चा था. इसका मतलब है कि ये काफी पुरानी बात है.

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अगर तब तक आपका जन्म नहीं हुआ था तो उस वक्त का एहसास कराने के लिए आपको बता दूं कि उस दौरान अलताफ़ राजा (जिन्होंने 'हम तो ठहरे परदेसी' गाने से मशहूरी हासिल की थी) भारत के सबसे बड़े गायक हुआ करते थे.

उन्होंने ही घायल के लिए संगीत भी दिया था और फ्रएंच-ब्राज़ीलियन 'लंबाडा ' को एक सुखद पारिवारिक गीत के रूप में परोसा था!

ज़ाहिरा तौर पर इन बातों के लिए सजग सनी दिओल ने अपनी स्क्रिप्ट को दो बातों पर केंद्रित रखा है, जो उनकी कहानी को 90 के दशक से अलग कर दे- तकनीक और टेलिविजन न्यूज़ मीडिया.

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लेकिन मुख्यतः मोबाइल टेक्नॉलॉजी, ट्रैकिंग के उपकरण सीसीटीवी कैमरा वगैरह. इससे ये फिल्म अपने आप ही किसी भी सनी दिओल फिल्म का सुधरा हुआ संस्करण हो जाती है.

लेकिन ये अब भी सनी दिओल की ही फिल्म है. क्योंकि आप सनी पा'जी को 90 के दशक से बाहर ले जा सकते हैं लेकिन 90 के दशक को सन्नी पा'जी से बाहर नहीं निकाल सकते.

क्या आप ऐसा कर सकते हैं? या क्या आपको ऐसा करना चाहिए? 59 साल की उम्र में भी चाहें वो जो भी आटा खाते हों जो किसी भी चक्की में 'पीसिंग' हो.

जैसे ही आप उनकी फिल्म में दाखिल होते हैं, आप जान जाते हैं कि इस फिल्म से आपको क्या चाहिए.

फिल्म के आखिर में फिरंगी बॉडीगार्ड्स का एक दल सनी पा'जी से अपनी बंदूकें छोड़ देने के लिए कहता है. वो अपनी बंदूकें छोड़ देते हैं.

और फिर हथियारों से पूरी तरह लैस गार्ड्स उनसे कहते हैं- अब हम तुमसे अपने हाथों से लड़ेंगे. यही वो पल है जब वाकई ये फिल्म दिल जीत लेती है!

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