कवि प्रदीप के गीत की कमाई कौन ले रहा है?

छह फरवरी देश प्रेम और देश-भक्ति से भरी भावनाओं को सुंदर शब्दों में पिरोकर लोगों तक पहुँचाने वाले कवि प्रदीप का जन्मदिन है.

6 फरवरी 1915 को उज्जैन के बड़नगर कस्बे में जन्मे कवि प्रदीप भले ही हमारे बीच ना हो लेकिन उनके गीत आज भी हमारे बीच अमर हैं.

'चल चल रे नौजवान', 'दूर हटो ऐ दुनियावालों, हिंदुस्तान हमारा है' और 'ऐ मेरे वतन के लोगों' गीत से 'राष्ट्र कवि' बने कवि प्रदीप के जन्मदिन पर उनकी बेटी से बीबीसी ने की ख़ास बातचीत.

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कवि प्रदीप की बेटी मितुल प्रदीप मुंबई में रहती हैं. बीबीसी से बातचीत में जहां उन्होंने अपने पिता से जुड़ी कई यादें साझा की, वहीं एक ऐसे मलाल का भी जिक्र किया जो कवि प्रदीप को ज़िंदगी भर रहा.

वो बताती हैं, "1943 में फ़िल्म 'क़िस्मत' के लिए पिताजी के लिखे गीत 'दूरो हटो ऐ दुनियावालों...' के कारण ब्रितानी सरकार ने उनके ख़िलाफ़ वारंट जारी किया था, जिसके चलते वो कई दिनों तक भूमिगत भी रहे."

यह गीत इस क़दर लोकप्रिय हुआ कि सिनेमा में दर्शक इसे बार-बार सुनने की मांग करते थे और फ़िल्म की समाप्ति पर इस गीत को सिनेमा हॉल में दोबारा सुनाया जाने लगा था.

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मितुल के अनुसार उनके पिता एक सच्चे देशभक्त थे, जिनका असली नाम रामचन्द्र नारायण द्विवेदी था.

वो कहती हैं, "फ़िल्म 'बंधन' में लिखा उनका गीत ‘चल चल रे नौजवान’ राष्ट्रीय गीत बना. सिंध और पंजाब की विधानसभा ने इस गीत को राष्ट्रीय गीत की मान्यता दी और ये गीत वहां की विधानसभा में गाया जाने लगा."

अभिनेता बलराज साहनी, जो उस समय लंदन में थे, उन्होंने इस गीत को लंदन के बीबीसी हिंदी रेडियो से भी प्रसारित किया था.

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देशभक्ति से ओतप्रोत गीत 'ऐ मेरे वतन के लोगों' को आज भी गाया जाता है.

27 जनवरी 1963 की शाम राजधानी दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में जब लता मंगेशकर ने इस गाने को गाया था तो वहां मौजूद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ साथ सभी लोगों की आंखें नम हो गई थीं.

तत्कालीन राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन और सभी कैबिनेट मंत्रियों के अलावा लगभग पूरी फ़िल्म इंडस्ट्री इस मौके पर मौजूद थी.

बॉलीवुड की जो हस्तियां वहां मौजूद थीं उनमें दिलीप कुमार, देव आनंद, राज कपूर, राजेंद्र कुमार, गायक मोहम्मद रफ़ी और हेमंत कुमार शामिल थे.

लेकिन मितुल बताती हैं कि दुर्भाग्य से उनके पिता को इस कार्यक्रम में आमंत्रित नहीं किया गया और बाद में नेहरू ने विशेष आग्रह कर तीन महीने बाद 21 मार्च 1963 को मुंबई में कवि प्रदीप से मुलाक़ात की और उन्हीं की आवाज़ में इस गीत को सुना.

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प्रदीप लिखते तो थे ही, गाते भी थे. फ़िल्म 'जागृति' के मशहूर गीत 'आओ बच्चों तुम्हे दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की' गीत के गायक भी कवि प्रदीप ही थे.

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'ऐ मेरे वतन के लोगों' के अलावा कई सुपरहिट गीत कवि प्रदीप के खाते में आते हैं जिनमें प्रमुख हैं, 'दे दी हमें आज़ादी', 'हम लाएं हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चो संभाल के' समेत कई देश भक्ति के गाने लिखें.

मितुल बताती हैं कि भले ही फ़िल्मों के लिए कवि प्रदीप देशभक्ति और जोश से भरे गीत लिखते थे लेकिन वो असल ज़िन्दगी में बहुत मज़ाकिया थे और उन्हें घर में बने पकवानों का बहुत शौक रहता था.

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एक हैरान करने वाला तथ्य यह है कि 71 फ़िल्मों और 1700 गाने देने वाले कवि प्रदीप को आज तक पद्म भूषण, पद्मश्री या भारत रत्न जैसी कोई उपाधि नहीं मिली है.

उन्हें दादा साहब फाल्के अवॉर्ड ज़रूर दिया गया लेकिन इसके अलावा उनके खाते में एक भी पुरस्कार नहीं हैं.

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मितुल कहती है कि उनके पिता को आजीवन एक मलाल रहा.

वो कहती हैं, "पिताजी ने गीत 'ऐ मेरे वतन के लोगों' गीत को सैनिकों की विधवाओ के उद्धार के लिए दान में दिया था, यानी इस गाने की जो भी रॉयल्टी मिलेगी वो उन विधवाओ को मिलेगी. लेकिन उनके जाने तक ना तो म्यूजिक कंपनी ने कोई जवाब दिया और ना ही आर्मी ने."

"वो पूछते रह गए कि उस गीत को हर 15 अगस्त और 26 जनवरी में इस्तेमाल किया जाता हैं लेकिन उसकी कमाई उन जवानों कि विधवाओं तक क्यों नहीं पहुँचती ? यह पैसा कौन ले रहा, इसकी लड़ाई आज भी जारी है."

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