जब ज़िया के गेस्ट बनते थे बॉलीवुड सितारे

  • 6 फरवरी 2016

बात 1970-80 के दशक की है जब पाकिस्तान में ज़िया उल हक़ का राज था. उनके सैन्य शासन में फ़िल्मों जैसी चीज़ के लिए कोई ख़ास जगह नहीं थी.

लेकिन इन्हीं ज़िया उल हक़ ने हिंदी सिनेमा के बिहारी बाबू को बतौर मेहमान पाकिस्तान बुलाया था. उस समय हिंदी सिनेमा में बिहारी बाबू शत्रुघ्न सिन्हा बड़े सितारे थे.

वरिष्ठ पाकिस्तानी पत्रकार आरिफ़ वक़ार याद करते हैं, "ज़िया की बेटी थी जो उनकी बहुत लाडली थी. वो जिस तरह की फरमाइश करती थी वो उन्हें पूरी करनी पड़ती थी. मसलन, ये कहानी बड़ी मशहूर थी कि बच्ची ने एक बार टीवी स्क्रीन पर शत्रुघ्न सिन्हा को देखा तो कहा कि अब्बू इनसे मिलना है. तो उन्होंने शत्रुघ्न सिन्हा को बुला लिया, उनको स्टेट गेस्ट बनाकर ठहराया. मनोज कुमार को बुला लिया, जिसको बेटी कहती थी वो बुला लेते थे."

इसे हिंदी फ़िल्मों का जादू ही कहेंगे जिसने पाकिस्तान के एक सैन्य शासक और एक भारतीय फ़िल्मी सितारे को एक साथ ला खड़ा किया था.

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ऑस्कर जीतने वाले रूसी निर्देशक निकिता मिखाइलोफ़ नवंबर में गोवा आए थे. तब उन्होंने कहा था कि राज कपूर इतने लोकप्रिय थे कि अगर वो ज़िंदा होते तो शायद रूस के राष्ट्रपति बन सकते थे.

1950-60 के दशक से ही हिंदी फ़िल्में पूर्व सोवियत संघ, अफ़ग़ानिस्तान, चीन, मध्य पूर्व के देशों में बहुत मशहूर थीं.

हर देश की ये कोशिश होती है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी पकड़ हो. इसका एक रास्ता है हार्ड पावर यानी सैन्य शक्ति, पैसों की ताक़त और दूसरा रास्ता है सॉफ़्ट पावर यानी आपकी संस्कृति, फ़िल्में, गाने, लिबास, खाना- पीना दूसरे देशों के कोने-कोने तक फैले जिससे लोग उस देश से एक तरह का जुड़ाव महसूस करें.

आज़ादी के बाद से ही ये रोल भारतीय फ़िल्मों ने बखूबी निभाया है. आज हिंदुस्तानी फ़िल्में विदेशों में भारत की ब्रैंड एम्बैसेडर बन गई हैं.

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ज़रा सोचिए कि आप चीन जैसे अजनबी देश में हों जहाँ कोई आपकी ज़बान नहीं जानता, आप सबसे अलग-थलग हैं. लेकिन वहाँ सफ़र के दौरान अचानक ट्रेन के डिब्बे में बैठे कुछ अंजान चीनी लोग आपकी जमकर ख़ातिरदारी करने लगें.

और वो भी सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उनके मोबाइल पर ऐश्वर्या राय की फ़िल्म चल रही थी और एक भारतीय को सामने देख वो ख़ुशी से चिल्लाने लगे. पिछले साल जब मैं चीन घूमने गई तो ये किस्सा मेरे साथ हुआ.

और अगर मैं कहूँ कि जब मैं मोरक्को गई तो एक शख़्स शाहरुख़ ख़ान स्टाइल में वायलिन बजाता और बाँहें फैलाते हुए आया और शाहरुख़ का गाना गाने लगा तो शायद आप सोचें कि मैं ख़्याली पुलाव पका रही हूँ. पर मोरक्को में वाकई ऐसा हुआ. कहानी थोड़ी फ़िल्मी है लेकिन है सच.

अगर यादों की गलियों में थोड़ा पीछे जाएँ तो 1950-60 के दशक में राज कपूर-दिलीप कुमार का विदेशों में जलवा था.

सायरा बानो दिलीप कुमार के दौरों का ज़िक्र कुछ यूँ करती हैं, "मैंने देखा है कि उनके लिए सड़कों पर दरियां बिछाई जाती थीं और झूमर लगाए जाते थे. सुनने में यह अजीब लगता होगा लेकिन ये होते हुए मैंने अपनी आंखों से देखा है. जहां से वो गुज़रते थे लोग वहां इत्र भी छिड़कते थे."

हिंदी फ़िल्मों ने ऐसे मुल्क़ों के साथ भी दिल के तार जोड़ने का काम किया है जिन्हें लोग भारत का प्रतिद्वंद्वी समझते हैं या फिर जिनसे रिश्तों में कड़वाहट आ गई हो.

नेपाल से भले ही पिछले एक साल से रिश्ते बिगड़ गए हों लेकिन वहाँ रहने वाली स्नेहा बॉलीवुड की ज़बरदस्त फैन हैं.

वो बताती हैं, "मैं आमिर ख़ान की बहुत बड़ी फैन हूं. इतनी बड़ी कि जब मैं छोटी थी तो यही बोलती थी कि मैं राज से ही शादी करूंगी क्योंकि उनकी कई फिल्मों में उनका नाम राज था. मेरी बेटी फिलहाल 16 महीने की है लेकिन मैं उसे बहुत सारे हिन्दी गाने सुनाती हूं. फिलहाल उसका पसंदीदा 'चिटिया कलाईयां' हैं और वो उसे सूनकर झूमती है."

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हिंदी फ़िल्मों की जितने दीवाने आपको हिंदुस्तान में मिलेंगे उतने ही पाकिस्तान में. 1960 के दशक में पाकिस्तान में भारतीय फ़िल्मों पर बैन लगा हुआ था..

लाहौर के पत्रकार आरिफ़ वक़ार बताते हैं, "पाकिस्तान में दिलीप कुमार उर्फ़ यूसुफ़ ख़ान बहुत मशहूर थे. मुग़ल-ए-आज़म फ़िल्म यहां नहीं रिलीज़ हुई थी. चूंकि उस वक़्त भारत जाना मुश्किल था, लेकिन काबुल जाने में कोई दिक़्क़त नहीं होती थी. पेशावर से एक लाल पास मिलता था जिसे लेकर लोग वहां आराम से जा सकते थे. तो लोग यहां से ट्रकों में भरकर काबुल जाते थे केवल मुग़ल-ए-आज़म देखने."

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हिंदी फ़िल्मों को अगर केवल मनोरंजन के चश्मे से बाहर निकालकर देखें तो इसे कूटनीति के लिए भी इस्तेमाल किया जाता रहा है.

आपको याद होगा कि बीते साल जर्मन दूतावास ने करण जौहर की फ़िल्म 'कल हो न हो' के एक गाने पर वीडियो निकाला था.

कैथरीन जर्मनी में रहती हैं और अपनी जर्मन-नुमा हिंदी में बताती हैं, "मैं बॉलीवुड की बहुत बड़ी फैन हूं. मेरी सबसे पसंदीदा फिल्मों में से एक 'जब तक है जान' और 'कभी ख़ुशी कभी ग़म' है. लेकिन मैं अकेली नहीं हूं, जर्मनी में बहुत लोग बॉलीवुड फिल्में देखते हैं और शाहरुख़ ख़ान के जर्मनी में बहुत फैन्स हैं. मेरा पसंदीदा डायलॉग है, 'सेनोरीटा, बड़े-बड़े शहरों में ऐसी छोटी-छोटी बातें होती रहती हैं."

दुनिया के सबसे ताकतवर नेताओं में से एक बराक ओबामा जब 2015 में भारत आए थे तो उन्होंने भी अपनी दिल की बात करने के लिए फ़िल्म दिल वाले दुल्हनिया ले जाएँगे के डायलॉग का ही सहारा लिया था कि 'बड़े बड़े शहरों में छोटी छोटी बातें होती रहती हैं सेनोरिटा'.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया अफ़ग़ानिस्तान दौरे को ही ले लीजिए. अफ़ग़ान संसद में मोदी के भाषण के जिस हिस्से पर शायद सबसे ज़्यादा तालियाँ मिली वो था जब उन्होंने जंज़ीर के प्राण वाले पठान के रोल का ज़िक्र किया था.

शायद यही है सिनेमा का जादू- पवन के झोकें की तरह ये न सरहद देखता है, न देश, न मज़हब.

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