एक प्रोफ़ेसर का अकेलापन…और मौत

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मौत से ठीक पहले एक पत्रकार से हुई आख़िरी बातचीत में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में मराठी के प्रोफ़ेसर श्रीनिवास रामचंद्र सीरस ने अमरीका जाकर बसने की इच्छा ज़ाहिर की थी.

सोमवार, 5 अप्रैल 2010 की रात इंडियन एक्सप्रेस के रिपोर्टर दीपू सैबेस्टियन से फ़ोन पर प्रोफ़ेसर सीरस ने कहा, “मैं अमरीका जाना चाहता हूँ. अमरीका ही एक ऐसी जगह है जहाँ मैं एक समलैंगिक की तरह आज़ादी से रह सकता हूँ”. उसी दिन अदालत ने यूनिवर्सिटी प्रशासन को उनकी बहाली का आदेश दिया था.

दो ही दिन बाद यानी बुधवार, 7 अप्रैल को पुलिस ने उनके किराए के घर का ताला तोड़कर उनकी लाश बरामद की.

ये बरसों से एक अजनबी शहर में अजनबी की तरह रह रहे एक प्रोफ़ेसर की अकाल मृत्यु थी. पुलिस ने कहा कि प्रोफ़ेसर सीरस ने ख़ुदकुशी की थी.

वो समलैंगिक यानी ‘गे’ थे और समाज ने उनके भीतर कभी इतना भरोसा नहीं जगाया कि वो अपनी यौन इच्छाओं के साथ खुलकर जी सकें.

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प्रोफ़ेसर सीरस सबकी नज़रों से बचते, छिपते एक दोहरा जीवन जीने को मजबूर थे — एक उनका प्रकट जीवन जिसमें उन्हें मराठी भाषा के कवि, साहित्य में डॉक्टरेट और महाराष्ट्र साहित्य परिषद के पुरस्कार प्राप्त लेखक के तौर पर जाना जाता था.

और दूसरा उनका निजी जीवन, जिसे वो अँधेरे कोनों में छिपाकर रखते थे. इन अँधेरे कोनों में उनका साथी था शहर का एक रिक्शेवाला जिसे एक स्टिंग ऑपरेशन के दौरान उनके साथ उनके बेडरूम में पकड़ा गया था.

आठ फ़रवरी 2010 को अलीगढ़ शहर में ख़ुद को पत्रकार कहने वाले दो लोग कैमरा लेकर रात को स्टिंग ऑपरेशन करने के लिए जब प्रोफ़ेसर सीरस के फ़्लैट में जबरन घुसे तब उनके भीतर क्या ‘जज़्बा’ रहा होगा?

क्या वो स्टिंग ऑपरेशन के ज़रिए ‘नैतिक रूप से भ्रष्ट’ एक प्रोफ़ेसर के अंतरंग जीवन का ‘सच’ समाज के सामने लाना चाहते थे ताकि समाज अपने बीच छिपकर रह रहे ‘पतित’ लोगों से सतर्क रह सके?

क्या उनका मक़सद प्रोफ़ेसर सीरस को इतना शर्मसार कर देना रहा होगा कि वो अपनी शर्म सहित ज़मीन में गड़ जाएँ और समाज को फिर कभी उनका मुँह न देखना पड़े?

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यूनिवर्सिटी के जिन अधिकारियों ने समलैंगिक यौन संबंध बनाने के ‘जुर्म’ में सीरस को सस्पेंड किया उनकी क्या चिंताएँ रही होंगी? क्या मुअत्तली की चिट्ठी पर दस्तख़त करते हुए अपार गर्व से उनका सीना फूला होगा कि उन्होंने शिक्षा और समाज को एक ‘कुकर्मी प्रोफ़ेसर’ के प्रकोप से बचा लिया?

तब के अख़बारों पर नज़र डालें तो इनमें से किसी सवाल का जवाब नहीं मिलता. सिर्फ़ ये पता चलता है कि प्रोफ़ेसर सीरस की मौत के बाद पुलिस ने यूनिवर्सिटी के कुछ अधिकारियों के ख़िलाफ़ रिपोर्ट दर्ज की थी, लेकिन सबूत के अभाव में केस बंद कर दिया गया.

कुछ ख़बरों से पता चलता है कि स्टिंग ऑपरेशन में सीरस के साथ उनके फ़्लैट में पाए गए रिक्शेवाले को पुलिस ने बाद में पूछताछ के लिए इतनी बार बुलाया कि तंग आकर उसने आत्मदाह की कोशिश की.

ये तमाम सवाल उस वक़्त भी मौजूद रहे होंगे जब ‘गे’ होने के कारण प्रोफ़ेसर सीरस के लिए एक एक पल जीना दिनों दिन मुश्किल होता जा रहा था. तब भी अख़बारों में उनके बारे में ख़बर छपी थी और तब भी कम से कम एक रिपोर्टर (इंडियन एक्सप्रेस के दीपू सैबेस्टियन) ने इस अकेले इंसान के दर्द को पहचाना.

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लेकिन फिर भी प्रोफ़ेसर सीरस की मौत बस एक ख़बर से ज़्यादा कुछ नहीं बन पाई. शायद तब इन सवालों ने उस तीखेपन के साथ बहुत कम लोगों को मथा. प्रोफ़ेसर सीरस अपनी चरदीवारी के भीतर अपने अकेलेपन से जूझ रहे थे और ऐसा नहीं है कि उनकी मौत ने समाज की आत्मा को झकझोर दिया हो और बहुत कुछ बदल गया हो.

लेकिन इस इस घटना के लगभग छह बरस बाद अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में मराठी भाषा के प्रोफ़ेसर श्रीनिवास रामचंद्र सीरस के जीवन, अकेलेपन और मौत के बारे में क्यों बात हो रही है?

ये बात इसलिए ज़रूरी है क्योंकि प्रोफ़ेसर सीरस हमारे समाज में डरते-डरते पूरा जीवन काट देने वाले उन हज़ारों हज़ार अनजाने चेहरों में से एक थे जिनकी असमंजस, बेचैनी, अकेलापन और हताशा हमें कभी दिखाई ही नहीं देती.

अब इतने बरस बाद फ़िल्म निर्देशक हंसल मेहता ने लीक तोड़कर चलने वाले एक्टर मनोज बाजपेयी के ज़रिए प्रोफ़ेसर सीरस की अकेलेपन और अवसाद भरी दुनिया की एक खिड़की हमारी ओर खोली है.

फ़िल्म ‘अलीगढ़’ में हंसल मेहता का कैमरा प्रोफ़ेसर सीरस की इसी निजी और अनजानी दुनिया में हमें दाख़िला देता है.

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ये एक मटमैली, बासी, पस्त और अस्तित्व के कगार पर किसी तरह टिकी हुई दुनिया है जिसके नीम अँधेरे में व्हिस्की के सुरूर में डूबता उतराता एक अकेला प्रोफ़ेसर है जो अपने टेप रिकार्डर पर लता मंगेशकर के दर्द भरे नग़में सुनता हुआ रात को सुबह में बदल रहा होता है.

मनोज बाजपेयी ने फ़िल्म में इस अधेड़ प्रोफ़ेसर की भूमिका निभाई है. उन्होंने कभी ख़ुद को किसी इमेज की सीमारेखा में कभी नहीं बँधने दिया और इस बार भी उन्होंने ख़ुद को प्रोफ़ेसर सीरस के व्यक्तित्व में विलीन सा कर दिया है.

मनोज कहते हैं कि जब हंसल मेहता इस फ़िल्म का प्रस्ताव लेकर उनके पास आए तो एक समलैंगिक प्रोफ़ेसर की भूमिका स्वीकार करते हुए उन्हें एक बार भी कोई हिचक नहीं हुई.

समलैंगिक होने के कारण प्रोफ़ेसर सीरस को बेइज़्ज़त किया गया, जबरन उनके घर में घुसकर एक रिक्शा चलाने वाले के साथ उनके सेक्स का वीडियो बनाया, इसी आधार पर उन्हें यूनिवर्सिटी प्रशासन ने नौकरी से सस्पेंड किया और विश्वविद्यालय की ओर से दिए गए घर से निकाल बाहर किया, वो शहर में वो अपना सामान उठाए एक मकान से दूसरे मकान की तलाश में भटकते रहे.

और आख़िर में मर गए.

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महाराष्ट्र के नागपुर शहर में उनकी शुरुआती शिक्षा हुई और बाद में उन्होंने मराठी के प्रोफ़ेसर के तौर पर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में काम शुरू किया. वो मराठी में कविताएँ लिखते थे और महाराष्ट्र साहित्य परिषद से उन्हें साहित्य का पुरस्कार दिया गया.

पूरे दो दशक तक अलीगढ़ में रहे प्रोफ़ेसर सीरस ने न कभी अपने मानवाधिकार हनन की शिकायत की, न भीड़ के बीच अपने अकेलेपन पर सार्वजनिक अफ़सोस किया और न ही कभी सतरंगा झंडा लिए हुए किसी गे प्राइड परेड में शामिल हुए.

यूनिवर्सिटी के उनके सहकर्मियों ने बाद में अख़बार और टीवी वालों को बताया कि प्रोफ़ेसर सीरस का कोई दोस्त नहीं था. वो विश्वविद्यालय कैम्पस में और अलीगढ़ के बाज़ारों में अक्सर अकेले देखे जाते थे. वो किसी की निगाह में नहीं आना चाहते थे, किसी का ध्यान अपनी ओर नहीं खींचना चाहते थे. वो बस चुपचाप अपनी तरह से जीना चाहते थे. पर उन्हें इतना भी मयस्सर नहीं हुआ. आख़िर क्यों?

हंसल मेहता की फ़िल्म ‘अलीगढ़’ देखने के बाद इस सवाल के बोझ को एक भारी पत्थर की तरह आप अपने सीने पर भी महसूस करेंगे.

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