जहां मूक-बधिर परोसते हैं खाना

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मुंबई के जाने-माने इलाक़े पवई में मौजूद है 'मिर्ची एंड माइम' रेस्तरां जहां क़ुदरत की कमी को ताक़त में बदला जाता है.

बाहर से एक आम रेस्तरां की तरह दिखने वाले इस रेस्तरां की ख़ासियत है कि यहां काम करने वाला स्टाफ़ सुन और बोल नहीं सकता.

मिर्ची एंड माइम को बीबीसी के टीवी शो 'आज की रात है ज़िंदगी' पर भी दिखाया गया था और इस शो के एंकर अमिताभ बच्चन ने इस कॉन्सेप्ट की काफ़ी तारीफ़ भी की थी.

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इस कॉन्सेप्ट के बारे में रेस्तरां के मालिक प्रशांत इस्सर और अनुज शाह बताते हैं, "हमने इस तरह के एक रेस्तरां के बारे में इंटरनेट पर देखा जो कनाडा में मौजूद था. यह एक अनूठी बात थी और फिर हमने सोचा कि क्यों न भारत में ऐसी ही एक कोशिश की जाए."

इस कॉन्सेप्ट को दिमाग़ में रखते हुए प्रशांत और अनुज ने क़रीब 350 मूक और बधिर लोगों और उनके परिवारवालों से बातचीत की.

प्रशांत बताते हैं, "सबसे बड़ी परेशानी थी ऐसे लोगों के परिजनों को मनाना, क्योंकि अक्सर ऐसे लोगों के परिजन अपने बच्चों को लेकर रक्षात्मक होते हैं."

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वो आगे बताते हैं, "परिवार वालों को एक बार मना भी लें लेकिन मूक और बधिर लोगों को अपनी बात कैसे समझाते? इसके लिए हमने ख़ुद साइन लैंग्वेज सीखी."

कंपनी के सह-मालिक अनुज ने बताया कि ऐसे लोगों को ख़ासतौर पर चुना गया जो भले ही बोल या सुन सकने में असमर्थ थे, लेकिन उनके चेहरों पर हमेशा मुस्कुराहट रहती थी, वो काम को लेकर केंद्रित थे और सजग भी थे.

8 हफ़्ते की ट्रेनिंग और 3 हफ़्तों के ट्रायल रन के बाद अब मिर्ची एंड माइम पूरी तरह सक्रिय है.

फ़िलहाल यहां 25 मूक बधिर लोगों का स्टाफ़ है जिसमें से 20 लड़के हैं और 5 लडकियां हैं. इनमें से ज़्यादातर ग्रेजुएट हैं और इस रेस्तरां में फ़्रंट डेस्क, रिसेप्शन, बार टेंडिंग, कैशियर अथवा सर्विस का काम बख़ूबी निभाते हैं.

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रेस्तरां में मौजूद इन लोगों की स्टाफ़ ड्रेस पर अंग्रेज़ी में लिखा गया है - "मेरी ताक़त है साइन लैंग्वेज का ज्ञान, आपकी ताक़त क्या है?"

रेस्तरां में काम कर रही आरती, शालिनी और तारिक़ ने एक साइन लैंग्वेज एक्सपर्ट के माध्यम से बीबीसी से अपने अनुभव साझा किए.

जहां शालिनी के पिता बिजली मिस्त्री का काम करते हैं, वहीं आरती अपने घर में अकेली कमाने वाली हैं.

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तारिक़ के पिता भी कोलकाता में दर्ज़ी का काम करते थे, लेकिन अपनी असमर्थता के चलते तारिक़ उनकी ख़ास मदद नहीं कर पाते.

एक्सपर्ट के माध्यम से वो कहते हैं, "इस रेस्तरां के माध्यम से हमें एक स्वाभिमानी जीवन मिला है और हमें ख़ुद पर नया भरोसा जगा है."

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आरती कहती हैं, "मेरी मां की बीमारी के बावजूद वो काम करने को मजबूर थीं, लेकिन आज अपने घर की ज़िम्मेदारी अपने कंधो पर लेने के लिए मैं सक्षम हूं"

लेकिन क्या स्टाफ़ के मूक बधिर होने से ग्राहकों को खाना ऑर्डर करने में परेशानी नहीं होती?

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रेस्तरां में अपनी दोस्त का जन्मदिन मना रही राधिका कहती हैं, "यहाँ का माहौल, खाना और सर्विस अच्छी है. यहाँ आने पर मैनेजर आपको बताता है की साइन लैंग्वेज का इस्तेमाल कैसे करना है और सारा मेन्यू इतने अच्छे से आयोजित है की ऑर्डर करने में कोई दिक़्क़त नहीं होती."

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रेस्तरां में मौजूद स्वरुप गांगुली आईआईटी में काम करते हैं और हर महीने लगभग दो बार यहां खाना खाने आते हैं, वो कहते हैं, "यह एक सामाजिक कार्य है और मेरे विचार से ऐसी और जगहें खुलनी चाहिए."

इस रेस्तरां का एक अहम पहलू खाना भी लोगों को काफ़ी पसंद आता है और आने वाले 3 सालों में मिर्ची एंड माइम की टीम का देश विदेश में ऐसे 21 रेस्तरां और खोलने का विचार है.

10 महीने पहले खुले इस रेस्तरां में मालिकों को दोगुना फ़ायदा मिला है और अनुज बताते हैं, "लोग यहां दया दिखाने नहीं बल्कि अच्छी सर्विस लेने आ रहे हैं क्योंकि जब तक अच्छी सर्विस नहीं मिलेगी लोग बार-बार नहीं आएंगे."

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वैसे इस रेस्तरां के नाम में भी इस रेस्तरां की कहानी छिपी है "मिर्ची" क्योंकि यहाँ के व्यंजन भारतीय हैं और तीखे भी और "माइम" क्योंकि यहाँ पर इशारों में बात होती है.

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