तो ऐसे जवान बूढ़ा और बूढ़ा जवान दिखता है..

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एक ज़माने में एक ही फ़िल्म में कलाकार को डबल रोल देने के लिए उसे नकली मूँछें लगा दी जाती थीं और गंजा दिखाने के लिए बालों पर त्वचा के रंग का पैच लगा दिया जाता था.

वक़्त बदला तो फ़िल्मों में मेकअप की तकनीक भी बदली और मेकअप आज काफ़ी आगे निकल गया है.

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चाहे फ़िल्म 'पा' में अमिताभ बच्चन को एक बीमार बच्चे ऑरो के किरदार में दिखाना हो या 'फ़ैन' में अपने डुप्लीकेट गौरव का किरदार निभाने वाले शाहरुख़ का लुक तैयार करना हो, बॉलीवुड में आजकल समय है 'प्रॉस्थेटिक मेकअप' का.

दरअसल प्रॉस्थेटिक मेकअप चर्चा में तब आया, जब जल्द ही रिलीज़ होने वाली फ़िल्म ‘कपूर एंड संस’ में ‘दादू’ बने ऋष‍ि कपूर और ‘फ़ैन’ में ‘गौरव’ बने शाहरुख खान का लुक रिलीज़ हुआ.

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लुक को क‍िरदार में ढालने के लिए प्रॉस्थेट‍िक मेकअप का इस्तेमाल क‍िया गया है.

इस बारे में बॉलीवुड के मशहूर मेकअप आर्टि‍स्ट दीपक सावंत कहते हैं, “यह एक ख़ास क़ि‍स्म की मेकअप तकनीक है, जिसमें पहले कलाकार के चेहरे या शरीर के ज‍िस हिस्से पर मेकअप करना है, हूबहू वैसी ही प्रति प्लास्टर ऑफ़ पेर‍िस से बनाते हैं और फ‍िर उस 'डमी' की बाहरी और भीतरी सतह सिलिकॉन से तैयार करते हैं.”

दीपक बताते हैं, "इसके बाद एक ख़ास म‍िश्रण को दोनों सतहों के बीच भरते हैं, जिससे यह मास्क जैसा हो जाता है और कलाकार के चेहरे से चिपक जाता है."

कभी जुड़वां भाइयों में अंतर द‍िखाने के लिए एक मूँछ या त‍िल से फ़र्क द‍िखाने वाले मेकअप आर्टिस्ट अब कलाकार को क‍िरदार बनाने के लिए पूरे चेहरे का मेकअप ही अलग ढंग से डिज़ाइन करते हैं.

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फ़िल्म ‘मैं और चार्ली’ का लुक ड‍िज़ाइन करने वाले मेकअप आर्टि‍स्‍ट पेरी पटेल कहते हैं, "दर्शकों को फ‍़िल्मों या धारावाहिकों में वास्तव‍िकता देखने की चाहत बढ़ गई है. इसके अलावा अब नई–नई तकनीकें आने लगी हैं, ज‍िसे यह बहुत आसान भी हो गया है."

पेरी कहते हैं, “पहले कलाकार मुँह में रंग भरकर घूंसा खाकर, खून बहने की एक्ट‍िंग कर लेते थे. अब दर्शकों को वास्तविकता ही परदे पर देखनी है. ऐसे में प्रॉस्थेटिक तकनीक बहुत कारगर है.”

हालांक‍ि सभी मेकअप आर्टि‍स्टों की राय है कि मेकअप के अलावा कलाकार को क‍िरदार के लिए वज़न बढ़ाना या घटाना भी पड़ता है.

उदाहरण के लिए फ‍िल्म ‘बधाई हो बधाई’ के लिए अन‍िल कपूर ने वजन बढ़ाया था और बाक़ी कमी प्रॉस्थेटिक मेकअप ने पूरी कर दी थी.

आगामी फ‍़िल्म ‘सरबजीत’ के लिए रणदीप हुड्डा ने भी वज़न काफ़ी कम क‍िया और ‘धूम’ के लिए ऋत‍ि‍क रोशन ने भी वज़न कम क‍िया था.

वैसे मेकअप का नाम आते ही लगता है क‍ि स‍िर्फ़ ल‍िपस्ट‍िक या फाउंडेशन की बात की जाती रही है, लेकिन दीपक सावंत के मुताबिक़ मेकअप कलाकार के चेहरे को बचाने का भी काम करता है.

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दीपक कहते हैं, "कैमरे की लाइटें बहुत तीखी होती हैं जिससे चेहरा जलने का ख़तरा रहता है. चेहरे को इनसे बचाने के लिए पहले मेकअप क‍िया जाता था और हर चार घंटे बाद फ्रेश मेकअप क‍िया जाता है."

दीपक बताते हैं कि पहले भी फ‍़िल्मों में कलाकारों को बुज़ुर्ग द‍िखाया जाता था पर उसके ल‍िए अलग तकनीक का इस्तेमाल होता था. इसमें पहले ट‍िश्यू पेपर और गोंद की मदद से चेहरे पर झुर्रि‍यां द‍िखाई जाती थीं.

हालांकि यह तकनीक़ पर्दे पर पकड़ में आ जाती थी लेक‍िन प्रॉस्थेट‍िक मेकअप 70 एमएम पर मेकअप को सच के क़रीब ले जाता है और यही कारण है कि बीते दो दशकों में इसका इस्तेमाल काफ़ी बढ़ गया है.

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