आपका दिल जीत लेगी 'तेरे बिन लादेन'

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फ़िल्म: तेरे बिन लादेन डैड ऑर अलाइव

निर्देशक: अभिषेक शर्मा

कलाकार: प्रद्युम्न सिंह, सिकंदर खेर, मनीष पॉल

रेटिंग: ***

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आतंकवाद, हिंदी फ़िल्मों में हास्य की एक लघु विधा सी बन गई है.

यह फ़िल्म काफ़ी हद तक साल 2008 में आई हॉलीवुड कॉमेडी 'ट्रॉपिक थंडर' से प्रभावित लगती है.

सिकंदर खेर फ़िल्म में एक सनकी सीआईए एजेंट की भूमिका में हैं, जिसके गले में एक बटन लगा है, जिसे दबाते ही वो तोंद निकाले एक पंजाबी प्रोड्यूसर के रूप में आ जाते हैं. वह फ़िल्म में ज़बर्दस्त रहे हैं.

यह फ़िल्म 2010 की हिट फ़िल्म 'तेरे बिन लादेन' का सीक्वेल होनी चाहिए थी. फ़िल्म की पूरी टीम भी वही है. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया है. सच तो यह है कि फ़िल्म अपने पहले हिस्से से बेख़बर सी जान पड़ती है.

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'तेरे बिन लादेन' कराची में बेस्ड थी. उसमें एक केबल टीवी रिपोर्टर नकली ओसामा के वीडियो के ज़रिए नाम और पैसा कमाना चाहता है.

फ़िल्म के इस दूसरे हिस्से में उसके दो प्रतिद्वंद्वी गुट आ जाते हैं, जो इस नकली ओसामा में अपना हिस्सा चाहते हैं.

जैसा सब जानते हैं कि ओसामा मर चुका है लेकिन अमरीकनों के पास यह साबित करने के लिए कोई वीडियो नहीं है.

तो ऐसे में वह ओसामा को मारने का वीडियो शूट करना चाहते हैं.

दूसरी तरफ़ जिहादी ग्रुप हैं. वो यक़ीन करना चाहते हैं कि ओसामा अब भी ज़िंदा है. फ़िल्म का ये प्लॉट बड़ा मज़ेदार सा है जो आपको थिएटर तक जाने के लिए मजबूर कर सकता है.

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प्रद्युम्न सिंह ने नकली ओसामा बिन लादेन का किरदार निभाया है. फ़िल्म के पहले हिस्से का हाईलाइट थे वो.

प्रद्युम्न सिंह ने इस फ़िल्म का स्क्रीनप्ले और डायलॉग भी लिखे हैं. ख़ुशी की बात है कि बॉलीवुड ने उनके जैसा टैलेंट खोदकर बाहर निकाल लिया है.

ओसामा के अलावा फ़िल्म में ओबामा भी हैं.

ये फ़िल्म तालिबान टाइप चरमपंथियों के साथ-साथ अमरीका, उसके राष्ट्रपति और सीआईए पर भी बढ़िया कटाक्ष करती है.

मैं हैरानी से सोचने पर मजबूर हो जाता हूँ कि क्या इस तरह की व्यंग्यात्मक फ़िल्म भारत में बनानी मुमकिन है जहां हमारे प्रधानमंत्री को इसी तरह से तला-भूना जाए.

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अरे रे. मैं क्या सोच रहा हूं ये तो देशद्रोह होगा न. मैं कितना असहिष्णु हूँ जो ऐसा सोच रहा हूँ. आक थू.

आतंकवाद को हास्य की चाशनी में परोसने वाली ऐसी फ़िल्मों में कुछ तो बात होती ही है. है न. हमने इनमें से कुछ फ़िल्में देखी भी हैं जैसे वेलकम टु कराची, बंगिस्तान, शक्ल पे मत जा वगैरह.

लेकिन इनमें से कई फ़िल्में कई हास्य पैदा करने के चक्कर में ख़ुद को बड़ा हल्का बना लेती हैं.

'तेरे बिन लादेन डैड ऑर अलाइव' इस मामले में एक संतुलित फ़िल्म है. ज़्यादातर हिस्से में यह एक असरदार ब्लैक कॉमेडी है. लेकिन हां अंत के कुछ मिनटों में यह ज़रूर खींची गई लगती है.

लेकिन जब अमरीका कथित तौर पर वेपन ऑफ़ मास डेस्ट्रक्शन की थ्योरी को इतना आगे ले जा सकता है, जब चरमपंथी जन्नत में हूरों के दर्शन कराने के नाम पर युवाओं को हिंसा के लिए भड़का सकते हैं तो एक फ़िल्म थोड़ी सी अतिश्योक्तिपूर्ण क्यों नहीं हो सकती.

आज के हालात पर ये फ़िल्म एक बढ़िया कटाक्ष है.

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