'आपकी शादी की ऑस्कर लेवल फ़िल्म बना देंगे'

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शादी की तस्वीरों और वीडियो में दूल्हा-दुल्हन के चेहरे को एक दूसरे के आस पास घुमा कर 'हैप्पी मैरिज' लिखने का चलन अब पुराना हो चला है.

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अब तो आपकी शादी की तारीख़ से लेकर आपकी हल्दी, रोका, सगाई यहां तक की कपड़ों की ख़रीददारी को हाई डेफ़िनेशन में शूट कर एक फ़िल्म बनाई जाती है और इसे 'कैंडिड फ़ोटोग्राफ़ी' कहा जाता है.

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बाक़ायदा एक स्क्रिप्ट के तहत दूल्हा-दुल्हन से लेकर उनके घरवालों, दोस्तों और रिश्तेदारों को एक रोल दिया जाता है, लोकेशन तय किए जाते हैं और फिर एक फ़िल्म जैसा शूट होता है.

जनवरी 2016 में आई फ़िल्म 'वज़ीर' में बतौर फ़ोटोग्राफर काम करने वाली मोनिशा अजगांवकर इस चलन के बारे में कहती हैं,"चलन जरूर ताज़ा है, लेकिन पुराने वीड‍ियोग्राफ़रों से ही तो प्रेरणा लेकर शुरू हुआ है."

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‘फ़ोटोडायरी’ की संचालिका मोनिशा बताती हैं, “युवा अपने ख़ास पलों को और भी ख़ास बनाना चाहते हैं और ऐसे में अब शादी से पहले प्री वेडिंग, वर वधू के मिलने की शूटिंग और फिर शादी के दौरान एक प्लान के तहत शूटिंग की जाती है.”

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अब लोग डेस्ट‍िनेशन या थीम वेडिंग भी करने लगे हैं ऐसे में वीडियो और फ़ोटोशूट करने वाले लोगों को बाकायदा इस शूट के लिए शादी वाले घर में एक निर्देशक, एक एडिटर और दो कैमरामैन की टीम लगानी पड़ती है.

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दिल्ली के ‘नॉट जस्ट पिक्चर्स’ के संचालक और फोटोग्राफ़र मनमीत सिंह गुंबेर कहते हैं, "कैंडिड फ़ोटोग्राफ़ी का चलन पांच साल पहले से शुरू हुआ है और अब ये जबर्दस्त मांग में है."

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मनमीत ने बताया,"ये ट्रेंडी होने का ज़माना है और लोग अब साधारण वीड‍ियो की जगह कुछ ट्विस्ट के साथ अपनी शादी की वीडियो और अल्बम देखना चाहते हैं. ज़ाहिर है इससे बजट बढ़ता भी है."

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बजट पर और रोशनी डालते हुए मनमीत बताते हैं कि इस तरह के शूट में लाखों के लैंस और महंगे कैमरे इस्तेमाल होते हैं और हज़ारों में हो जाने वाली सामान्य फ़ोटोग्राफ़ी के मुक़ाबले ऐसे वीड‍ियो अल्बम बनाने में डेढ़ लाख से पच्चीस लाख रुपए तक का खर्च आता है.

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सुनने में यह क़ीमत ज़्यादा लग सकती लेकिन फ़ैशन फोटोग्राफ़र प्रतीक मोहन जाम्भले का कहना है कि लोगों को अपने ख़ास अवसरों को कुछ अलग दिखाने की चाहत के आगे यह क़ीमत बड़ी नहीं लगती.

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इन वीडियो के बारे में मनमीत कहते हैं कि हम चुनिंदा शॉट और परिवार के इंटरव्यू को मिलाकर तीस से चालीस मिनट का वीडियो तैयार करते हैं, जो टीवी सीरियल या शॉर्ट फ़‍िल्म की तरह होता है. इसके अलावा हम तीन मिनट का ट्रेलर भी बनाते हैं.

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ये चलन धीरे-धीरे लोकप्रिय हो रहा है लेकिन अब भी ज़्यादातर लोग सामान्य वीड‍ियोग्राफ़ी को ही तवज्जो दे रहे हैं.

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